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स्नातक तक का सफर

आषाढ़ का महीना था, बाहर जोरों की वर्षा हो रही थी। बादल ऐसे गरज रहे थे जैसे अभी फट जाएंगे और सारा पानी धरती पर आ गिरेगा जिससे तबाही मच जायेगी। बरसात की बड़ी बड़ी बूंदें जमीन में से होकर भूमिगत जल के रूप मे तब्दील हो रही थी। बरसात के साथ तेज हवाएं, पानी के छींटे लाकर हमारे ऊपर बौछार कर जाती। मानो पानी और हवा ने यह तय कर लिया हो कि आज हम अपना विभित्स रूप धारण करेंगें। बरसात भी इतना भयानक हो सकता है इसका अनुभव इससे पहले मैंने नही किया। इस वातावरण के बीच, हम लगभग बीस विधार्थी अपनी कक्षा में बैठकर हिंदी की किताब खोलकर, बाहर गिरने वाली बरसात की बूंदे को देखे जा रहे थे। एकाएक, अध्यापक जी का पदार्पण कक्षा मे हुआ ; वे पूरी तरह भीग चुके थे। हमनें उन्हें कुर्सी पर बैठाया और उनसे प्रार्थना की, आपको इतनी तीव्र बारिश में भीगते हुए नही आना चाहिए था। उनका जवाब था, आप लोग आ सकते है तो फिर हम क्यों नही। यदि विधार्थी शिक्षा के लिए आतुर है तो हम शिक्षकों का कर्तव्य है कि अपना सौ फीसदी दें। यह कक्षा 11वीं की थी और वर्ष 2072, विक्रम संवत था। अध्यापक महोदय ने हम विधार्थी को बताया कि आज हमारी कक्षा एक अद्भुत व...