मुझको डुबोया मेरे होने ने।
वृक्ष की उन टहनियों पर लटककर, फेफड़ों में उच्छवास घना करते हुए - मैं तालाब की गहराई और चौड़ाई की कल्पना कर सिहर जाता हूं। इस भय को समाप्त करने हेतु, मैं तीव्रता से तालाब में कूद पड़ता हूं और तैरने लगता हूं और बीच जल की गहराई में, मैं डूबने का प्रयास करता हूं लेकिन तैरने की आदत इतनी परिपक्व हो गई है कि स्वयं को तालाब के दूसरे छोर पर पाता हूं। 6 दिन पहले ही तो, मैंने उन्हें हंसते और भांति भांति प्रकार के व्यंजन तैयार करते हुए देखा और 6 दिन बाद, मैं उनके शरीर को चिता पर जलते हुए देख रहा था। शरीर के जलने की गंध, मेरी आंखों से गुजरकर - जीवन का अंतिम सत्य देखने को मजबूर कर रही थीं। मेरे होने और मेरे ना होने में - कुछ दिनों की भावनात्मक तीव्रता ही है जो मस्तिष्क को जकड़ लेगी और तदुपरांत जीवन उससे अधिक विस्तृत रूप में निखरेगा। कभी कभी, मैं कल्पनाओं की अनन्त सागर में डूबता हूं और विचार मुझे बहाकर कीचड़ से भरे दलदल में छोड़ देते हैं अर्थात मुझे कोई परिणाम दिखता नजर नहीं आता है। जीवन एक है- जीने के लिए भी और प्रयोग करने के लिए भी। मैं हजारों प्रयोग कर सकता हूं परन्तु एक भय मस्तिष्क को जकड़ लेती ह...