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Showing posts from March, 2025

मुझको डुबोया मेरे होने ने।

वृक्ष की उन टहनियों पर लटककर, फेफड़ों में उच्छवास घना करते हुए - मैं तालाब की गहराई और चौड़ाई की कल्पना कर सिहर जाता हूं। इस भय को समाप्त करने हेतु, मैं तीव्रता से तालाब में कूद पड़ता हूं और तैरने लगता हूं और बीच जल की गहराई में, मैं डूबने का प्रयास करता हूं लेकिन तैरने की आदत इतनी परिपक्व हो गई है कि स्वयं को तालाब के दूसरे छोर पर पाता हूं। 6 दिन पहले ही तो, मैंने उन्हें हंसते और भांति भांति प्रकार के व्यंजन तैयार करते हुए देखा और 6 दिन बाद, मैं उनके शरीर को चिता पर जलते हुए देख रहा था। शरीर के जलने की गंध, मेरी आंखों से गुजरकर - जीवन का अंतिम सत्य देखने को मजबूर कर रही थीं। मेरे होने और मेरे ना होने में - कुछ दिनों की भावनात्मक तीव्रता ही है जो मस्तिष्क को जकड़ लेगी और तदुपरांत जीवन उससे अधिक विस्तृत रूप में निखरेगा। कभी कभी, मैं कल्पनाओं की अनन्त सागर में डूबता हूं और विचार मुझे बहाकर कीचड़ से भरे दलदल में छोड़ देते हैं अर्थात मुझे कोई परिणाम दिखता नजर नहीं आता है। जीवन एक है- जीने के लिए भी और प्रयोग करने के लिए भी। मैं हजारों प्रयोग कर सकता हूं परन्तु एक भय मस्तिष्क को जकड़ लेती ह...

चित्तवृत्तियों का निरीक्षण।

परिस्थितियों को देखने का, किसी भी स्थिति, संकट और परिवर्तन के बारे में विचार करने के लिए- हमारा एक दृष्टिकोण, एक नजरिया होता है। सत्य गहराई में कई परतों में जाके छिपा होता है। कभी कभी आंखों से देखकर भी, उसे सत्य नही ठहराया जा सकता हैं - सुबूतों की तरफ अनुसरण भी उन परतों को पूरी तरह से नहीं उघाड़ता है। दृष्टिकोण अंतर्ज्ञान का प्रतिफल है- कोई भी निर्णय तटस्थता और निष्पक्षता की मांग करता है। जो वृक्ष के पत्ते पर ही रहेगा, वह वृक्ष को नहीं समझ पाएगा। मनुष्य के मन के तीन स्तर है- चेतन, अवचेतन और अचेतन मन। चेतन मन पर थोड़ी सी रोशनी पड़ती है, इसके नीचे अवचेतन मन तथा जिस पर तनिक भी रोशनी नहीं पड़ती- जो बिल्कुल अंधेरे में है; वह अचेतन मन है। मनुष्य का जो चेतन मन है, उसमें ही हम में से बहुत लोग जीकर समाप्त हो जाते हैं। इसलिए जीवन को नहीं जान पाते - जीवन की जड़ें अचेतन मन में छिपी हैं, वह अदृश्य है, वह भूमि के नीचे है। इन जड़ों का सम्बन्ध जीवन से है। वहीं से हमारा सम्बन्ध परमात्मा से, सत्य से व जीवन से है तथा इनका खोज यहीं से सम्भव है। यह जो चेतन मन है, समाज द्वारा, शिक्षा द्वारा और संस्कार द्वार...