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Showing posts from December, 2024

खुरदरापन ।

कितनी शुष्कता और रूखापन था, उन घर्षण पैदा करती हुई कंक्रीट से बनी उच्श्रृंखल मार्गों पर। मैंने अनायास ही एक कंकड़ को पैरों से दे मारा था और उसी कंकड़ को अगले दिन पैरों में चुभता हुआ पाया मैंने। मैं पाषाण की तरह कठोर बनना चाहता हूं जिस पर प्रकृति की विपदाओं और मनुष्यों के तीखे भावनाओं का कोई प्रभाव ना पड़े। मैं उन्हीं रेखाचित्रों को बारम्बार, ज़हन में उतारता हूं। कितना खुरदरापन है, जीवन के इन दोहरावें में। मैं उस अधिक सौंदर्य पैदा करती - रसात्मक स्थल का अन्वेषण करता हूं और पाता हूं कि छिछली जमीन की मुरझाई हुई पत्थर ना ही पीड़ा पैदा करती है और ना ही स्थायी आनन्द पैदा करती है। मेरा स्वयं मेरा सबसे बड़ा दुश्मन है। मैं कभी कभार उसके कंधे पर सिर रख देना चाहता हूं; उसके वक्षों की उष्णता से अपने ह्रदय में उबल रही अशांत तप्त ज्वर को शीतलता दे देना चाहता हूं। उसकी मुस्कान, आंखों की नाराज़गी, अंगड़ाई लेती उसकी बांहे, जुल्फों की करिश्माई खुशबू, ओठों की रक्त जैसे लालिमा, उसका मेरे हाथों की उंगलियों के साथ खेलना - ह्रदय में एकाएक प्रसन्नता की बाढ़ ला दे रही है। मैं बाढ़ आने के बाद की विभत्स और भयानक...

बड़े होने का अर्थ।

किसी मनुष्य के नजदीक जाते ही, जो सबसे पहला सवाल विचारणीय होता है; वह यह है कि हमारा व्यवहार उसके प्रति कैसा होना चाहिए? यदि हम बड़े है, हमारी मानसिक और आत्मिक उन्नति हुई है अथवा हो रही है तो अपने से छोटे के साथ किस प्रकार से हम विनम्र और सहज व्यवहार करें? और यदि हम छोटे है; तो कैसे सीखने का भाव पैदा करें? और अहंकार शून्यता का भाव पैदा करें! किसी भी मनुष्य के साथ होने में पीड़ा है और मनुष्य का अकेला हो पाना असम्भव नजर आता है। हम पैदा अकेले होते हैं और मरते भी अकेले हैं लेकिन बीच की यात्रा कौतूहल और भीड़ से भरी होती है। मनुष्यता को हम किस स्तर पर ले जाएं? इहलौकिक और पारलौकिक सत्ताओं में से किसका भय ज्यादा कारगर होगा? बिटगेंस्टीन ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि मुझे पढ़ना था इसलिए मैं स्कूल नहीं गया। स्कूल जाना अथवा किसी के भी सम्पर्क में आना मौलिकता को समाप्त करना होगा। सर्वोच्च पदों पर बैठे राजनेता और अधिकारी, मन और मस्तिष्क को पढ़कर स्पष्ट निष्कर्ष निकालने वाले मनोवैज्ञानिक, विद्वानों का बहुत बड़ा समूह, इसी प्रयास में लगा हुआ है कि लोगों को कैसे सभ्य बनाया जाय। मनुष्य की पाशविक इच्छाओ...

जड़ता में शून्य ।

अकस्मात ही, उंगलियों पर नजर जाती है और ध्यान आता है कि नाखून बड़े हो गये है; और यह भी ध्यान आता है कि उसने एक बार कहा था,'तुम्हारी उंगलियों में बडे़ नाखून अच्छे लगते हैं।' मैं शीघ्र ही, अपने नाखून काट लेता हूं। उसका मेरे प्रति मेरी चीजों का अच्छा लगना, इस बात का द्योतक था कि मुझे अच्छा महसूस कराना था। तालाब किनारे उगी उस अनजानी घास के तिनके को, अनायास ही मैंने उखाड़ लिया था; मेरा उससे कोई प्रयोजन नहीं था। चारों तरफ फैले लोगों का समूह, कौतूहल पैदा करती भीड़ - मुझे उस घास की याद दिलाती है और मैं एक बार वहां लौट जाना चाहता हूं; उसी चित्त और यादों के साथ। लेकिन क्या करूं जैसे वापस लौटना होता ही नहीं है। मनुष्यों से भरे जगत में - मैं कैसा और किस प्रकार का मनुष्य बनूं? यह सवाल मेरे मस्तिष्क को वेदना से भर देती है - चिंताएं सर्प के विष के समान सम्पूर्ण शरीर में रूधिर के साथ मिलकर, प्राणों को नीला कर दे रही हैं। कहीं पर हमेशा के लिए रस क्यों नहीं मिल जाता है? मैं उसके खुबसूरत और मुलायम ओठों की तरफ जाना चाहता हूं! आखिर, क्यों मैं अपने कामक्रीड़ा पर नियंत्रण करूं? आजकल, वह पूरी तरह मेरे ...

दुखों का विरेचन (Catharsis) - 02

सामान्य तौर पर, हमें जिससे दुख मिल रहा होता है - हमारी पूरी कोशिश होती है; उसे बदलने की। यदि उसमें बदलाव आ जाएं तो कुछ पल के लिए प्रसन्नता आती हुई प्रतीत होती है। हमारा ध्यान इस पर नहीं जाता है कि हम स्वयं में बदलाव लायें और उन दुखो की समाप्ति से मिलने वाले खुशी की विषयवस्तु हम स्वयं को बनाएं। तो वह किसान उस दिन ईश्वर से तथा उसकी व्यवस्थाओं से बहुत नाराज़ हुआ और लगा ईश्वर को कोसनें कि हे भगवान! तुझे दुनिया चलाने नहीं आती है, तु असमय ही वर्षा कर देता है, बाढ़ और तूफान ला देता है; मेरा पूरा फसल बर्बाद हो गया है। और किसान ने कहा कि मैं चाहता हूं तुम संसार ना चलाओ, मुझे चलाने दो। ईश्वर ने बहुत समझाया कि देख, ऐसा मत कर मेरा काम मुझे करने दे। लेकिन वह किसान नहीं माना और ईश्वर ने संसार चलाने की चाभी उसको सौंप दी। उसने जब जरूरत और जितनी मात्रा में जरूरत थी- फसलों के लिए वर्षा की, उष्णता प्रदान की, ठंडी और गर्म हवाओं का समन्वय रखा तथा अन्य सभी परिस्थितियां फसलों को इस तरह मुहैया कराया जो उनके लिए सर्वाधिक सुखात्मक रूप से उपयुक्त था। फसल तैयार हुई और उसकी कटाई की गई लेकिन गेहूं की बालियों में गे...