बड़े होने का अर्थ।
किसी मनुष्य के नजदीक जाते ही, जो सबसे पहला सवाल विचारणीय होता है; वह यह है कि हमारा व्यवहार उसके प्रति कैसा होना चाहिए? यदि हम बड़े है, हमारी मानसिक और आत्मिक उन्नति हुई है अथवा हो रही है तो अपने से छोटे के साथ किस प्रकार से हम विनम्र और सहज व्यवहार करें? और यदि हम छोटे है; तो कैसे सीखने का भाव पैदा करें? और अहंकार शून्यता का भाव पैदा करें!
किसी भी मनुष्य के साथ होने में पीड़ा है और मनुष्य का अकेला हो पाना असम्भव नजर आता है। हम पैदा अकेले होते हैं और मरते भी अकेले हैं लेकिन बीच की यात्रा कौतूहल और भीड़ से भरी होती है। मनुष्यता को हम किस स्तर पर ले जाएं? इहलौकिक और पारलौकिक सत्ताओं में से किसका भय ज्यादा कारगर होगा? बिटगेंस्टीन ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि मुझे पढ़ना था इसलिए मैं स्कूल नहीं गया। स्कूल जाना अथवा किसी के भी सम्पर्क में आना मौलिकता को समाप्त करना होगा। सर्वोच्च पदों पर बैठे राजनेता और अधिकारी, मन और मस्तिष्क को पढ़कर स्पष्ट निष्कर्ष निकालने वाले मनोवैज्ञानिक, विद्वानों का बहुत बड़ा समूह, इसी प्रयास में लगा हुआ है कि लोगों को कैसे सभ्य बनाया जाय। मनुष्य की पाशविक इच्छाओं से किस प्रकार उसे मुक्त किया जाय? हम मनुष्यों को कैसे समझाएं कि तनिक भर जमीन के लिए रक्तपात उचित नहीं हैं - प्राणों को खोकर भी लोग उंगली भर जमीन की रक्षा कर रहे हैं - जो कि यही रह जाना है। जब किसी व्यक्ति के पास शक्ति आती है तो यह इस बात का परिचायक है कि वह उन लोगों को समाज के मुख्यधारा में लाने का प्रयास करें; जिनका जीवन सैकड़ों प्रकार के दुःखों से जकड़ा हुआ है। शक्ति आते ही, व्यक्ति के चरित्र का भी परीक्षण होता है। एल्टन मेयो जैसे विचारकों ने लिखा कि 'शक्ति भ्रष्ट करती है और परमशक्ति परमभ्रष्ट परती है।' मेयो के इस विचार के प्रतिरोध में नौकरशाही और राजनीती में यह आंधी चल पड़ी कि हम शासन को अधिक से अधिक पारदर्शी, निष्पक्ष और ईमानदार बनाएंगे। लेकिन मेयो का यह विचार आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना कि कल था। ईमानदार अफसर वे कहे जाते हैं, जो बगैर मांगे ही धन की पेटियां जमा करते जा रहे हैं। मैक्स वेबर ने सत्ता को तीन भागों में बांटा - चमत्कारिक सत्ता, पारिवारिक सत्ता और वैधानिक तार्किक सत्ता। इन तीनों सत्ताओं का उद्देश्य - मनुष्य के भीतर व्याप्त कमियों को पहचानना और उसे दूर करना था। इसमें चमत्कारिक और पारिवारिक सत्ता कुछ हद तक सफल नजर आती है परंतु वैधानिक तार्किक सत्ता सवालों के घेरे में है।
20 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अमेरिका में डैनियल गोलमैन एक ऐसा मनौवैज्ञानिक विचारक हुआ जिसने मनुष्य की भावनाओं पर विस्तृत अध्ययन किया और उसके रिसर्च पेपर भी प्रकाशित हुए। डैनियल ने अपने पुस्तक 'इमोशनल इंटेलिजेंस' में लिखा है कि मनुष्य भावनाओं के अधीन रहता है और उसके ज्यादा से ज्यादा निर्णय किसी ना किसी भावना में बहकर लिए जाते हैं। डैनियल ने यह भी बताया कि यदि हम मनुष्य की भावनाओं पर विशेषज्ञता प्राप्त कर लें अथवा एक सामान्य ज्ञान प्राप्त कर लें तो भी योजनाओं और सेवाओं को जनता तक पहुंचाने में आसानी होगी। साथ ही, व्यक्तिगत जीवन को सम्हालने में सहूलियत महसूस होगी। भारतीय तथा पश्चिमी जगत के बहुत से विचारकों का योगदान आज की दुनिया को बेहतरीन बनाने में है। जैसे मांटेस्क्यू का "शक्ति पृथक्करण सिद्धांत और चेक एंड बैलेंस" को दुनिया के सभी देशों के संविधानों ने अपनाया। पृथ्वी और मानवता को बचाने के लिए अनगिनत लोगों ने अनगिनत प्रयास किया और यह संसार तब आज हमें ऐसा दिखाई दे रहा है। फ्रेडरिक टेलर और मैरी पार्कर फालिट ने कारखानों में उत्पादन की वृद्धि के लिए हाथर्न प्रयोग किए - जहां फालिट ने मालिकों का नौकरों के प्रति व्यवहार में परिवर्तन लाकर बड़े उत्पादन को प्रोत्साहित किया और टेलर ने मजदूरों पर ऐसा अद्वितीय प्रयोग किया, जब सब मजदूर संतुष्ट हो गये। यह तरीके मार्क्सवाद पर एक गहरी चोट थी जिसने उसके विरोध में मजदूरों को मालिक का दीवाना बना दिया। और कार्ल मार्क्स ने तो कभी भी मध्यम वर्ग की बात ही नहीं की। बहरहाल, मार्क्सवाद भी उत्पादन के संकेंद्रिकरण पर चोट करता है और गरीब, मजदूरों के पक्ष में वकालत करता है; जो इसके मनुष्य को अच्छा दिशा में ले जाने का प्रयास था।
कोई भी व्यक्ति समाज में उतना ही ज्यादा सम्मान पाएगा जितना कि वह अधिक से अधिक मानवीय मूल्यों को अपने भीतर धारण करेगा। मानवीय मूल्य - जो मानव को सभी सामान्य मनुष्यों से अलग रखेंगी। जैसे - सत्यनिष्ठा, ईमानदारी, पारदर्शिता, सहानुभूति, करूणा, सहनशीलता, वस्तुनिष्ठता, तटस्थता, लगन, निरंतरता, धैर्य, प्रतिबद्धता, समर्पण, अनुशासन, विनम्रता आदि। इनमें से किसी एक को भी जीवन में उतारने के लिए बहुत अभ्यास की आवश्यकता पड़ती है। जीवन जीते हुए, दुख सहते हुए हम परिपक्व बनते हैं और बहुत से मानवीय मूल्य स्वयं विकसित होते हैं। जैसे - एक मां अपने बच्चे का लालन-पालन जिन मानवीय मूल्यों के आधार पर करती है, वे हैं - ममता, करूणा और समानुभूति। इस में भी ममता शब्द विशद अर्थ रखता है। इन मानवीय मूल्यों को स्वयं में आत्मसात करते हुए, हम उन जगहों पर नियंत्रण स्थापित कर सकते हैं और एक बदलाव भी ला सकते हैं; जहां लाने की प्रचुरता व संभावना अधिक है। मानवीय मूल्यों और मानवीय भावनाओं में अंतर है। सहानुभूति मानवीय मूल्य है जबकि क्रोध या प्रेम भावना की श्रेणी में आएगा। उदाहरण के लिए यदि हम समानुभूति को समझें तो इसका अर्थ है - किसी व्यक्ति में अन्य व्यक्ति, किसी भी प्राणी और काल्पनिक चरित्र की मन: स्थितियों को समझने की क्षमता। अर्थात किसी व्यक्ति के प्रतिक्रिया या व्यवहार से समझ लेना कि वह दुःखों या सुखों में है और वैसा ही महसूस कर पाना। समानुभूति के भी दो प्रकार हैं - संज्ञानात्मक समानुभूति ( जानना) और भावनात्मक समानुभूति (जानना + महसूस करना) । संज्ञानात्मक समानुभूति ( Cognitive empathy) दो अर्थों में रूप ग्रहण करता है - परिप्रेक्ष्य ग्रहण ( perspective taking) और फैंटेसी - जिसमें काल्पनिक चरित्र गढ़कर मन: स्थितियों को समझा जाता है। भावनात्मक समानुभूति के भी दो भाग है- समानुभूतिक चिंता और भावनात्मक तनाव। भावनात्मक तनाव पीड़ा पैदा करता है। समानुभूतिक चिंता सबसे अच्छी प्रकार की समानुभूति है। इस मूल्य का अर्थ इतना ही है- मनुष्य की अंदर चल रही दुःखों व व्यथा को समझना।
किसी भी शक्ति का उद्देश्य, उन्नत किस्म के दृष्टिकोण का उद्देश्य, मनोविज्ञान और विज्ञान का उद्देश्य - व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने वाला होना चाहिए। बड़े होने का अर्थ रचनात्मक ( Constructive) होना चाहिए ना कि विध्वंसक ( Destructive)।
अरविंद कुमार
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