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आत्मा से सत्य की ओर ।

संसार वैसा नहीं है जैसा कि हम देखते हैं। हम सबने अपनी आंखों पर रंगीन चश्मा चढ़ा रखा है। किसी ने लाल तो किसी ने हरा, किसी ने नारंगी तो किसी ने काला और जिस रंग का चश्मा चढ़ाकर हम संसार को देखते हैं उसी रंग का संसार नजर आता है। लाल वाले को लाल तो हरे वाले को हरा दिखाई देता है। और लाल वाला यदि इसका विरोध करें कि नहीं - संसार हरा नहीं लाल है तो जिसको हरा दिख रहा है वह इस तथ्य को कभी स्वीकार नहीं करेगा। परंतु वास्तविकता में संसार उन रंगों के चश्मों जैसा नहीं है। फ्रेडरिक हीगल ने निरपेक्ष प्रत्यय शब्द का प्रयोग किया है जिसका तात्पर्य है- कोई एक शक्तिशाली शक्ति है जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को क्रियान्वित कर रही है। हमारा सम्पूर्ण जीवन महज विचार मात्र है - विचारों से शुरू होता जीवन विचारों पर समाप्त होता है। जैसे जब आप एक भयानक स्वप्न देखते हैं और उसमें स्वयं को लड़ते झगड़ते पाते हैं और एक संघर्ष में खुद को महसूस करते हैं लेकिन जैसे ही स्वप्न टूटता है तो आप स्वयं को उससे मुक्त पाते हैं। यह एक विचार था - जिससे आप बाहर हो गये। संसार हमारा ही प्रतिबिम्ब है - हम अपना ही चेहरा लोगों में देखते हैं। लोगो...