प्रेम की अवधारणात्मक समझ।
प्रेम में संयोग और वियोग के दो पल आते हैं जब प्रेमी एक-दूसरे के सबसे नजदीक रहकर उपजे हुए आनन्द से भाव विभोर होते हैं तो दूसरी स्थिति में वेदनाएं सहते हैं। यह दोनों स्थितियां जब अपने चरम सत्ता को प्राप्त करती हैं तो विनाशकारी हो जाती हैं। प्रेम एक ऐसी भाव है जिसकी व्यंजना हॅंसकर भी की जाती है और रोकर भी; जिसके व्यंजक दीर्घ नि:श्वास और अश्रु भी होते हैं तथा हर्षपुलक और उछल-कूद भी। इसके विस्तृत शासन के भीतर आनन्दात्मक और दुखात्मक दोनों प्रकार के मनोविकार आ जाते हैं। कोई और ऐसा भाव नहीं है जो आलम्बन के रहने पर तो एक प्रकार की मनोवृत्तियां और चेष्टाएं उत्पन्न करें और ना रहने पर बिल्कुल दूसरे प्रकार की। जीवन की स्थिति समय में है और समय प्रवाह है। प्रवाह में साधु-असाधु, प्रिय-अप्रिय सभी कुछ आता है। प्रवाह का यह क्रम ही सृष्टि और प्रकृति की नित्यता है। जीवन के प्रवाह में एक समय असाधु, अप्रिय अनुभव आया इसलिए उस प्रवाह से विरक्त होकर जीवन की तृषा को तृप्त ना करना केवल हठ है। समस्या किसी मनुष्य के साथ होने में नहीं है; समस्या किसी भी मनुष्य के साथ होने में है। मनुष्यों से लगाव दुख पैदा करता है और...