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Showing posts from February, 2025

प्रेम की अवधारणात्मक समझ।

प्रेम में संयोग और वियोग के दो पल आते हैं जब प्रेमी एक-दूसरे के सबसे नजदीक रहकर उपजे हुए आनन्द से भाव विभोर होते हैं तो दूसरी स्थिति में वेदनाएं सहते हैं। यह दोनों स्थितियां जब अपने चरम सत्ता को प्राप्त करती हैं तो विनाशकारी हो जाती हैं। प्रेम एक ऐसी भाव है जिसकी व्यंजना हॅंसकर भी की जाती है और रोकर भी; जिसके व्यंजक दीर्घ नि:श्वास और अश्रु भी होते हैं तथा हर्षपुलक और उछल-कूद भी। इसके विस्तृत शासन के भीतर आनन्दात्मक और दुखात्मक दोनों प्रकार के मनोविकार आ जाते हैं। कोई और ऐसा भाव नहीं है जो आलम्बन के रहने पर तो एक प्रकार की मनोवृत्तियां और चेष्टाएं उत्पन्न करें और ना रहने पर बिल्कुल दूसरे प्रकार की। जीवन की स्थिति समय में है और समय प्रवाह है। प्रवाह में साधु-असाधु, प्रिय-अप्रिय सभी कुछ आता है। प्रवाह का यह क्रम ही सृष्टि और प्रकृति की नित्यता है। जीवन के प्रवाह में एक समय असाधु, अप्रिय अनुभव आया इसलिए उस प्रवाह से विरक्त होकर जीवन की तृषा को तृप्त ना करना केवल हठ है। समस्या किसी मनुष्य के साथ होने में नहीं है; समस्या किसी भी मनुष्य के साथ होने में है। मनुष्यों से लगाव दुख पैदा करता है और...

खुरदरापन -2

जीवन की सम्पदा कठिन है। मैं उन गर्तों का अन्वेषण करता हूं जहां कंटीली झाड़ियों के अलावा कुछ नहीं मिलता है। प्रेम पुष्पित पल्लवित होता है - स्वतंत्रता और मुक्ति के आकाश में। जीवन का युद्ध स्वयं में एक महायुद्ध है और इस रण से भागे हुए भगौड़ो को समाज साधु या सन्त कहकर सम्बोधित करता है। सोचता हूं और विचार करता हूं कि जो तन प्यार में उपजता हैं, प्यार में पलता है, वहीं तन प्यार पाकर खिल भी जाता है। मैं बिस्तर में पड़कर, सुबह-शाम की लालिमा प्रकाश नहीं - दोपहर की सफेद बादलों को देखता हूं और मोजे के आकार में कटे उन असंख्य मेघदूतों को देखता हूं; जो जीवन को बदबू से भर दे रहे हैं। मैं समतल दर्पण में अपना चेहरा देखता हूं और माथे पर उभरे लकीरों को देखता हूं - जो मेरे जीवन में आये उन तूफानों के प्रतीक हैं जिनसे जीवन एक धूलकण की भांति पवनों की गोद में अपने अस्तित्व के लिए भीख मांगता नजर आया। घर छोड़ते समय मां ने आंखों में आंसू भरकर और अपने ऊपर बीते उन सैकड़ों दुःखों के निचोड़ को जैसे आंसुओं में पिरो दिया हो और मुझसे मां ने कहा था कि, बेटा सम्हाल लेना। मैंने उस समय इन तीन शब्दों की गहराई को नहीं समझा थ...