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Showing posts from November, 2024

बेघास की उजली जमीन ।

कभी कभी मैं बहती धारा के विलोम में चलने का प्रयास करता हूं। उन धाराओं को अपनी बांहों में जकड़कर, मैं उन्हें पूरा तोड़ देना चाहता हूं। मैं स्वयं को भी तोड़ता हूं - एक सीमा से ज्यादा तोड़ता हूं और मैं उस राक्षस को असहाय अवस्था में देखना चाहता हूं।  मैं अक्सर उन लोगों से बचने का प्रयास करता हूं, उनकी बातों पर यकीन करने से बचता हूं - जो जीवन को ऊपरी तौर पर जीना जानते हैं। जीवन को गहराई में जीना और महसूस करना किसी त्रासदी से कम नहीं है। उसके वायदों, उसके कसमों पर मुझे कभी भरोसा नहीं हुआ और शुरू में अंत जानते हुए - मैंने अंत किसी दूसरी दिशा में करने का प्रयास किया लेकिन अंत वैसा ही हुआ जैसा मैंने सोचा था, जैसा मुझे आरम्भ में पता था। मैं उसे देखता हूं - उसकी झुठी हंसी और मुस्कुराहटों में सिमटा हुआ दर्द; मैं महसूस करता हूं। उसका मुझे यूं दिखाना कि मैं तुम्हारे बगैर भी खुश हूं - इस बात का परिचायक है कि कितने दुःखों से वह छटपटा रही है। जी चाहता है, उस थकी हारी, पारजिता को - बांहों में भरकर, उसके माथे को चूम कर - यह कह दूं कि नहीं तुम अकेली नहीं हो, मैं हूं तुम्हारे साथ। मुझे पता है, उसने अपन...

ज्ञान मार्ग - अद्वैतवाद।

ब्रह्म और आत्मा एक है, यह दो नहीं है। ब्रह्म को हम देख नहीं सकते हैं लेकिन जिस ईश्वर की कल्पना हम करते हैं - असल में वह ईश्वर ब्रह्म का ही सगुण रूप है। आत्मा ब्रह्म का प्रतिबिम्ब है जो शरीर पा जाने के कारण अपने मूल स्वरुप को भूल गया है। और जगत ब्रह्म का आभास मात्र है! यही शंकराचार्य का अद्वैतवाद है जो केवल निर्गुण ब्रह्म को स्वीकार्य करता है।  यह जगत मिथ्या है- मिथ्या का अर्थ ना तो सत्य है और ना असत्य। सत्य वह होता है जिसका कभी खंडन ना किया जा सकें जैसे पारमार्थिक रूप से ब्रह्म या आत्मा है- आत्मा की उपस्थिति को हम सब महसूस कर सकते हैं। और असत्य वह होता है - जिसका कभी ज्ञान न हो, जैसे कोई त्रिभुजाकार वृत्त। मिथ्या एक अलग अवस्था है, जिसका कभी ज्ञान हो और कभी खंडन भी किया जा सकें। जैसे - रात के अंधेरे में अकस्मात आपने सांप देख लिया और आपका शरीर भय से कांपने लग गया लेकिन इतने में किसी ने पीछे से प्रकाश की लौ जलाई और आपने देखा कि वह सांप नहीं, एक रस्सी है। अब आप इसे क्या कहेंगे - यह ना तो सत्य है और ना ही असत्य। वैसे ही यह जगत है, जो व्यवहारिक रूप में दिखाई देता है लेकिन हम आभासिक रूप स...

दुखों का विरेचन (Catharsis) - 01

दुख के पलों में हम भागना चाहते हैं - कोई असहनीय पीड़ा जब आन पड़ती है तब हम लोगों से कटकर कमरा बंद करके अकेले होना चाहते हैं और इन्ही पलों में दुखी व्यक्ति आत्मघात भी कर लेता है। आनन्द, जो सुख और दुख से ऊपर की अवस्था है; उसमें हम प्रफुल्लित होकर प्रसन्नता को बांटना चाहते हैं। हमारी प्रसन्नता हमसे अकेले सम्हाली नहीं जाती है - उसे दो लोगों के साथ हमें बांटकर जो प्रसन्नता प्राप्त होती है; वह पिछली मिली प्रसन्नता की तुलना में चार गुना ज्यादा होता है। हम देते है वहीं है जो हमारे पास होता है।‌ दुखों को सुखों की प्राप्ति हेतु या उन्हीं दुःखों पर और गहरे दुःखों की उपस्थिति करा देना ही दुःखों का विरेचन है। संसार में दो प्रेमियों से ज्यादा दुखी कोई नजर नहीं आता है। रति मनुष्य का वह स्थायी भाव है जो अपने से ज्यादा किसी दूसरे व्यक्ति में सुख, प्रसन्नता और आनन्द का आभास कराता है; जहा एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को पाने की इच्छाएं करने लगता है। दो लोगों में पनपा नया प्रेम कुछ नकारात्मक मनोविकारों को जन्म देता है। प्रेमी एक दूसरे पर आधिपत्य कर लेना चाहते हैं, एक दूसरे को बांध लेना चाहते हैं; यही से ईर्ष्...