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Showing posts from September, 2024

दुनिया किसी के प्यार में।

उसकी पलकें जब जब मेरी तरफ उठती, मेरे ह्रदय में एकसाथ हजारों गुलाब खिल जाते। उसकी आंखों की खुबसूरती, उसमें समाया अपनापन, कमल से सुर्ख लाल उसके ओंठ - मुझे अपनी तरफ किसी तीव्र चुम्बकीय क्षेत्र धारण करने वाले चुम्बक की तरह अपनी ओर आकर्षित करतीं। आकांक्षा यही होती कि, जीवन कुछ पल के लिए ठहर जायें, कुछ पल के लिए मैं उसका हो जाऊं और कुछ पल में जीवन उसकी बांहों में उमड़कर, घुमड़कर समाप्त हो जाएं। प्रेम की पुनरावृत्ति इतनी तीव्र शक्ति के साथ मुझ पर होगी इसका मुझे कोई अंदाजा नहीं था - उससे मिलकर ऐसा लगा मानो जैसे वह अपने भीतर प्रेम को महासागर की तरह विशाल और आकाश की अनन्त श्रृंखलाओं में भरकर, मुझे उसमें डुबो दें रही थी। उससे मिलने की तड़प, उसे देखने की लालसा, उसे सुनने और उसके साथ कुछ पल बिताने की इच्छाएं मेरे भीतर बहुत तीव्रता से उठतीं, तड़पती और सागर की लहरों की तरह असफल प्रयासों के बाद मचलकर, घूंट के आंसू पीकर अशांत हो जातीं। मेरी नजरें उसे इतनी तड़प के साथ यहां वहां खोजती कि जैसे मरूस्थल में कोई प्यासा पथिक जल की तलाश में उन मरीचिकाओं का पीछा करते हुए थक और हारकर बैठ जाता है क्योंकि वहा जल ह...

चारों तरफ सन्नाटा है...

अक्सर, सुनसान सड़कों पर अकेले चलते हुए, रौशनी से जगमगाती हुई ईंट व पत्थरों से बने हुए मकानों को निहारते हुए; लोगों को अपने लोगों के साथ, अपने परिवार के साथ आते जाते देखकर - इस बात का ध्यान आता है कि हम सब अंदर से बहुत अकेले हैं। हम जीवन में वह कंधा नहीं पाते हैं जिसपर सिर रखकर रो सकें और खुलकर दिल की बात कर सकें। मैं अपनी इन फीकी आंखों से अंधेरे और उजाले को नहीं, फर्श पर पड़े अपने-आपको देखता हूं। सब अलग जा पड़ा है, अपने कन्धों से जुड़ी अपनी बांहों को देखता हूं। तन मन को सहलाते हुए, मैं उस एक रात को याद करता हूं - जब उसके उजले और गोरे गालों को चूमते हुए; मैंने एक बात कही थी कि ह्रदय के हर कोने में तुम्हारे प्यार का प्रकाश फैला हुआ है। वह इधर-उधर देखने लगी थी, जैसे मेरी असलियत को उसने भांप लिया था। तुम्हें खोजने लगता हूं, तुम जो इस कड़ी जमीन की चुभन से पलभर को मुझे उठाकर एक खुबसूरत और झिलमिलाते लोक में खींच ले जाती हो...फिर मैं बचपन का वह दिन याद करता हूं - जब नीम के पेड़ तले, पूर्णिमा की अर्धरात्रि में चंद्रमा के प्रकाश को उन पत्तों के झरोखों से देखा करता था। उन पत्तों को देखने में, मैं...

शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति मानसिक दुःखों को जन्म देते हैं।

खाली पेट और खाली जेब दुनिया की बेहतरीन पाठ पढ़ाते हैं। इन दोनों स्थितियों को धारण करके, यदि हम बाजार का एक चक्कर लगायें तो हमें इस बात का ज्ञान होगा कि हम क्या हैं? हमारी वास्तविकता क्या है? और आवश्यकताएं हमें कितना कमजोर बनाती हैं।  मनुष्य की चार मूलभूत आवश्यकताएं हैं - भूख, प्यास, नींद और सेक्स, इनके बगैर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। आदिम अवस्था में हमारे पूर्वजों की सबसे बड़ी आवश्यकताएं यही चार थी। निवास का स्थान उतना बड़ी जरूरत नहीं थी क्योंकि कहीं भी कंदराओं व गुफाओं में वे रह लेते थे। स्थूल शरीर की मूलभूत आवश्यकताएं जब तक पूरी नहीं हो जाती है; मनुष्य की जीवन इसी परिधि पर चक्कर लगाता रहता है। पुरापाषाणकाल से लेकर प्राचीन विकसित सभ्यताओं के उदय तक उदरपूर्ति एक प्रमुख विषय रहा और आज भी यही एक प्रमुख विषय है। ध्यातव्य है कि, पशु की भी यही चार मूलभूत आवश्यकताएं हैं। जानवर और मनुष्य में अंतर यही है कि हम इन शारीरिक आवश्यकताओं का उपभोग करते हुए विचार कर सकते हैं जबकि जानवर नहीं। हम यह विचार कर सकते हैं कि क्या खाएं? कितना खाएं और कब कब खाएं - शरीर पर भोजन का क्या प्रभाव होता ह...

विकासात्मक नैतिक सिद्धांत : हर्बर्ट स्पेंसर

हम उन कर्मों को शुभ कहते है जो हमारे अपने तथा दूसरों के जीवन में सहायक होते है और हम उन कर्मों को अशुभ कहते है जो प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से एक व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह को मृत्यु की ओर ले जाता है।  हर्बर्ट स्पेंसर ने मनुष्य के दीर्घ जीवन को शुभ आचरण का लक्ष्य माना है। वे कम विकसित आचरण की अपेक्षा अधिक विकसित आचरण को उत्कृष्टतर मानते हैं, क्योंकि ऐसा आचरण मनुष्य के दीर्घ जीवन में अधिक सहायक होता है। मानव अपने कर्मों का फल शुभ अथवा अशुभ के रूप में पाता है। यदि किसी ने पहले अनैतिक कार्य किया तो उसे उसका फल अनैतिक मिलेगा। जो आचरण मनुष्य के विकास की प्रारंभिक अवस्था मे पाया जाता है वह कम विकसित और जो आचरण उसके विकास की परवर्ती अवस्था में उपलब्ध होता है वह अधिक विकसित आचरण है। विकासवादी मानदंड के अनुसार शुभ कर्म वातावरण के साथ मनुष्य के समायोजन में सहायता देते हैं और अशुभ कर्म उसके इस समायोजन में बाधा डालते है। विकास के प्रक्रम के फलस्वरूप धीरे धीरे आचरण के वे रूप समाप्त हो जाते है जो मनुष्य के समायोजन मे सहायक होते है जो मनुष्य के समायोजन मे बाधक होते है और वे रूप ही शेष रह जाते ...

जीवन को खंडित रूप में देखना।

सारा जीवन इसी पाश्चाताप में व्यतीत हो जाता है कि बात को बढ़ने से जब रोका जा सकता था तब हम रोकते नहीं और जब बात आगे बढ़ चुकी होती है तो हम उसके संत्रास व पीड़ा से ग्रसित हो उठते हैं। जीवन में समस्त दुःखों के कारण, हम स्वयं होते हैं। हम ऐसे मित्र बनाते हैं, जो हमारे पतन के लिए ज़िम्मेदार होते हैं। दोहरा जीवन - कभी कभार तो इसलिए भी हम जीते हैं क्योंकि हमें दूसरों को प्रसन्न करना होता है। जब स्वयं में आत्मविश्वास की कमी होती है और जीवन की व्यक्तिगत कठिनाइयों से लड़ पाने में हम खुद को सक्षम नहीं समझते तो हमारा क्षुकाव और निर्भरता दूसरे व्यक्ति की तरफ होने लगता है। इन निर्भरताओं में सबसे अधिक पीड़ादायक भावनात्मक निर्भरता है। जब हम दूसरे की खुशी से खुश और दुःखों से दुखी होने लगते हैं। हम जीवन के उन महान सत्यों और दुःखों को अपनाने से भागते हैं, जिनका होना सतप्रतिशत तय है। उदाहरणार्थ - मृत्यु। मौत एक अटल सत्य है लेकिन इसका गहरा दुख जो सगे सम्बन्धीयों को होता है; वे इसी दुख से भागते है और इसे अंगीकार नहीं करना चाहतें। जैसे - माता-पिता अपने बच्चों से परछाई की चिपके रहना चाहते हैं और उनके जीवन पर ...