चारों तरफ सन्नाटा है...
अक्सर, सुनसान सड़कों पर अकेले चलते हुए, रौशनी से जगमगाती हुई ईंट व पत्थरों से बने हुए मकानों को निहारते हुए; लोगों को अपने लोगों के साथ, अपने परिवार के साथ आते जाते देखकर - इस बात का ध्यान आता है कि हम सब अंदर से बहुत अकेले हैं। हम जीवन में वह कंधा नहीं पाते हैं जिसपर सिर रखकर रो सकें और खुलकर दिल की बात कर सकें।
मैं अपनी इन फीकी आंखों से अंधेरे और उजाले को नहीं, फर्श पर पड़े अपने-आपको देखता हूं। सब अलग जा पड़ा है, अपने कन्धों से जुड़ी अपनी बांहों को देखता हूं। तन मन को सहलाते हुए, मैं उस एक रात को याद करता हूं - जब उसके उजले और गोरे गालों को चूमते हुए; मैंने एक बात कही थी कि ह्रदय के हर कोने में तुम्हारे प्यार का प्रकाश फैला हुआ है। वह इधर-उधर देखने लगी थी, जैसे मेरी असलियत को उसने भांप लिया था। तुम्हें खोजने लगता हूं, तुम जो इस कड़ी जमीन की चुभन से पलभर को मुझे उठाकर एक खुबसूरत और झिलमिलाते लोक में खींच ले जाती हो...फिर मैं बचपन का वह दिन याद करता हूं - जब नीम के पेड़ तले, पूर्णिमा की अर्धरात्रि में चंद्रमा के प्रकाश को उन पत्तों के झरोखों से देखा करता था। उन पत्तों को देखने में, मैं पूरा उसी में खो जाता था - विचार संकेंद्रित होकर उसी एक विषय पर अटक जाता था और आज विचारों की अनन्त श्रृंखलाएं मेरे हृदय, मन व मस्तिष्क को छेद कर डालती हैं।
मैं उठता हूं - ठंडे मस्तक को अधरों से छुकर, यह सोचते-सोचते उठता हूं कि जो प्यार तन में जगता है, तन से उपजता है, वहीं देह पाकर दुनिया में जी भी जाता है। ज्ञान का अधिक होना, व्यक्ति को आत्मनिर्वासन और स्वआत्मीकरण की दिशा में ले जाती है। एक समय तक जो चीजे सुख देती है, दूसरे ही पलों में वही चीजें ह्रदय को वेदना से भर देती है। मेरी निगाह दूर आसमान पर अटक जाती है, जहां पंक्षिया कलरव करते हुए अपने घोंसलों को लौट रही हैं - बंदर की शक्ल में कटे बादल दूर दूर भागते नजर आते हैं; वे कुछ पल मेरे साथ ठहरते नहीं हैं। इवनिंग वाक करते हुए, मैं देखता हूं - तन्हा खड़े पेड़ों और उनके नीचे सिमटते अंधेरे में अजीब-सा खालीपन है। झाड़ियों की सूखी टहनियों में आइसक्रीम की खाली कागज और चिप्स की पन्नियां उलझी हुई है जैसे मेरा चित्त मुझे डुबोता जा रहा है।
मैं कुछ निर्णय लेता हूं और उससे चिपके रहने का प्रयास करता हूं तथा कुछ ही देर बाद मुझे उसमें बहुत सी खामियां नजर आने लगती है लेकिन कोई भी निर्णय ना ही पूरी तरीके से सही हो सकता है और ना ही गलत। कभी-कभी मुझे ऐसा लगता है, जैसे मैं किसी भीड़ में खड़ा हूं और असह्य ध्वनियां मेरे कानों के परदों को छेदने लगती है। मैं भागकर अपने कमरे में घुस जाता हूं लेकिन अर्धरात्रि में आंसुओ में डुबी हुई उसकी बड़ी-बड़ी आंखें... मुझे आजकल कोई भी बात सुख नहीं देती है क्योंकि उसमें एक साथ कई खामियां मुझे नजर आती है और वे बाद में सत्य हो जाती है। मुझे खुद को झूठा ठहराना होता है लेकिन हर बार... फिर मैं याद करता हूं उसका सिर पर वो गुलाबी दुपट्टा डालकर सामने आना; गुलाबी रंग में सना हुआ उसका चेहरा - ह्रदय में एक साथ प्रसन्नता और नफ़रत भर देती थी- क्योंकि मैं उसे खोने वाला था और आज खो दिया हूं। ह्रदय में एक अशांत ज्वर है, जो अपरिपक्व प्रसव की पीड़ा से पीड़ित है...ज्ञान जीवन को नीरस बना देती है और समझदारी यौवन को छीन लेता है।
अरविंद कुमार।
Comments
Post a Comment