प्रीति, रति और श्रृंगार ।
रति की निष्पति अधिक लगाव अथवा स्वयं की भावना से शून्य हो जाने से होता है। श्रृंगार का अर्थ है कि जब नायक और नायिका का मिलन होता है। मिलन का अर्थ - आंखों से, यादों से, विचारों से, शरीर के मिलन से या किसी भी प्रकार के सम्प्रेषण से हो सकता है। और ऐसा होते ही रति जो एक स्थायी भाव है तुरंत उभरकर सामने आ जाएगी। इस क्रीड़ा को हम प्रेम का नाम दे सकते हैं। प्रेम में जो भी पड़ेगा उसे अहम या मैं की भावना से शून्य हो जाना होगा और वह देने की भावना से भर जाता है और प्रेम को अंतिम तृप्ति तब मिलती है जब वह अपने प्रेमी पर सबकुछ न्यौछावर कर देता है। यह प्रेम भाई बहन, माता पुत्र, प्रेमी-प्रेमिका आदि में हो सकता है। आप आमतौर पर उसी रास्ते से निकल जाते हैं, उस मकान के सामने से निकल जाते हैं जिसे कुछ दिन पहले आपको परवाह तक नहीं थी लेकिन आज वही रास्ता और वही मकान सृष्टि का सबसे महत्वपूर्ण पदार्थ बन बैठा है जिसके बिना आपको चैन तक नहीं पड़ती है। प्रेम का पूर्ण विकास तभी होता है जब दो ह्रदय एक दूसरे की ओर क्रमशः खिंचते हुए मिल जाते हैं। इसलिए जब प्रेमी अपने प्रिय को अपने प्रेम की सूचना देता है तो वह उसके मन को ...