प्रीति, रति और श्रृंगार ।

रति की निष्पति अधिक लगाव अथवा स्वयं की भावना से शून्य हो जाने से होता है। श्रृंगार का अर्थ है कि जब नायक और नायिका का मिलन होता है। मिलन का अर्थ - आंखों से, यादों से, विचारों से, शरीर के मिलन से या किसी भी प्रकार के सम्प्रेषण से हो सकता है। और ऐसा होते ही रति जो एक स्थायी भाव है तुरंत उभरकर सामने आ जाएगी। इस क्रीड़ा को हम प्रेम का नाम दे सकते हैं। प्रेम में जो भी पड़ेगा उसे अहम या मैं की भावना से शून्य हो जाना होगा और वह देने की भावना से भर जाता है और प्रेम को अंतिम तृप्ति तब मिलती है जब वह अपने प्रेमी पर सबकुछ न्यौछावर कर देता है। यह प्रेम भाई बहन, माता पुत्र, प्रेमी-प्रेमिका आदि में हो सकता है। आप आमतौर पर उसी रास्ते से निकल जाते हैं, उस मकान के सामने से निकल जाते हैं जिसे कुछ दिन पहले आपको परवाह तक नहीं थी लेकिन आज वही रास्ता और वही मकान सृष्टि का सबसे महत्वपूर्ण पदार्थ बन बैठा है जिसके बिना आपको चैन तक नहीं पड़ती है।

प्रेम का पूर्ण विकास तभी होता है जब दो ह्रदय एक दूसरे की ओर क्रमशः खिंचते हुए मिल जाते हैं। इसलिए जब प्रेमी अपने प्रिय को अपने प्रेम की सूचना देता है तो वह उसके मन को अपने मन से मिला लेना चाहता है। और प्रेम का इजहार करने के बाद प्रेमी प्रिय के मन में अपने लिए कुछ अच्छे भावों की प्रतिष्ठा कर देना चाहता है। वह यह चाहता है कि जिस प्रकार प्रिय मुझे अच्छा लगता है उसी प्रकार मैं भी उसे अच्छा लगूं। इसलिए जैसे ही कोई नवयुवक का चित्त किसी युवती की ओर आकर्षित होता है तो ऐसे जगहों पर जाते समय जहां उसके दिखने की सम्भावना ज्यादा है, उसका ध्यान कपड़ों की साफ सफाई और शरीर की सजावट की ओर अधिक हो जाता है। जरुरत पड़ने पर मन की कोमलता, सुशीलता, वीरता इत्यादि भी दिखाई देता है। प्रेमी को जिस पल यह पता चलता है कि प्रिय के मन में भी उसके लिए चाह है उसी पल वह प्रेम के आनन्द लोक में मग्न हो जाता हैं। एक दूसरे की ओर आकर्षित दो ह्रदयों में एक नया रस उत्पन्न हो जाता है जो उसे आनन्द की अवस्था में ले जाता है। प्रेम में पड़कर संसार की तुच्छ वस्तुओं में भी उसे सुख की प्राप्ति होती है और प्रिय के साथ रहकर उन्हीं वस्तुओं का सुख दोगुना हो जाता है। लेकिन प्रिय के अभाव में वही वस्तुएं जैसे काटने को दौड़ती हैं और दुख भी पैदा होता है। और एक स्थिति आती है जब प्रेमी के लिए उसके प्रिय से बढ़कर कोई आनन्द नहीं रह जाता है और प्रेम का यह एक रहस्यपूर्ण महत्व है। (आचार्य रा. शुक्ल)

मनुष्य का प्रेम देखने और दिखा देने पर आमादा होता है। प्रेमी अपने प्रेमिका को सबकुछ करते हुए देखना चाहता है - उसके भोजन करने का तरीका, बात करना, पसंद नापसंद, सब पर सौन्दर्य स्थापित करना चाहता है। मनुष्य का प्रेम वाक् सौन्दर्य, कर्म सौन्दर्य, भाव सौन्दर्य, वस्तु सौन्दर्य पर स्थित होता है - सबकुछ आदर्श होता दिखा देना चाहता है। चांद तारे तोड़ लाने की कपोली कल्पनाएं यहां प्रेम को और गाढ़ा करती है। मनुष्य के ह्रदय की दो कोमल वृत्तियां है - दया और करूणा। दया का क्षेत्र विस्तृत है और दया यह नहीं देखती कि सामने कौन है ? यह तत्क्षण अविलम्ब सेवा करने को तैयार रहती है। अपने प्रेमी के ह्रदय में प्रेम को पैदा करने के लिए लोग दया पैदा करने का प्रयास करते हैं जिससे प्रेम और गहराई में उतर सकें। इसलिए अक्सर प्रेमी अपने प्रिय को अपना कुछ नुकसान कर लेने की धमकी देता नजर आता है। आप उस 4 साल के बच्चे की कल्पना करिए जो अपने मां से जिद्द करके कुछ मांगता है और मां उसकी जिद्द पूरी नहीं कर होती है ( क्योंकि प्रेम देता है) तो वह अत्यधिक रोकर स्वंय को दुख देता है और यह दुख उसके मां में दया को जन्म देता है और वही दया प्रेम को फिर पैदा कर देती है तथा वह बच्चा अपनी जिद्द पूरी करा लेता है। लेकिन यह गहराई पन आगे चलकर स्वाभिमान को खोज निकालता है और स्वाभिमान ईर्ष्या को जन्म देता है। और प्रेम समाप्ति की ओर आगे बढ़ता हैं।

हमारा पूरा जीवन भावनाओं से संचालित होता है। दया, करूणा, प्रेम, स्वाभिमान, क्रोध, नफरत, घृणा, वैर, ममता, ईर्ष्या सब दुख और सुख को पैदा करते हैं। जीवन के अधिकांश निर्णय हम भावनाओं में बहकर लेते हैं और पाश्चाताप होता है। इनका प्रबंधन अत्यधिक जरूरी है जो बेहद कठिन नजर आता है। लेकिन यह गहराई में उतरकर करने से अच्छा परिणाम देता है।

अरविंद कुमार

Comments

Popular posts from this blog

आत्म जागरूकता का तार्किक पक्ष।

आत्मा से सत्य की ओर ।

बड़े होने का अर्थ।