अतीत के चलचित्र।
जहाँ तक चलते जाने का प्रश्न है, चलते जाया जा सकता है। परंतु जहाँ ठहरने का प्रश्न आता है, वहाँ बहुत-सी अपेक्षाएँ जाग्रत हो उठती हैं और उन सबकी पूर्ति असंभव होने से, फिर चल देने की धुन समा जाती है। पक्षियों का कलरव, सूर्यास्त की लालिमा पतली धागों का रूप रखकर उसके नेत्रों की पुतलियों में उतरती जाती थीं। पतली पगडंडीयों पर दोनों तरफ उगे घासों को वह निहारता था, पगडंडी के एक छोर पर पानी के छोटे से घेराव ने मछलियों को पनपने का अवसर दे दिया था। वह अक्सर इन्हें ललचाई आंखों से देखता और यह भी देखता कि जीवन का पुष्प कहीं भी खिल सकता है अगर सुरक्षा का तनिक भर आश्रय मिलें। बच्चे उसी पगडंडी पर नाना प्रकार के खेल खेल रहे हैं; कभी गुल्ली-डंडा तो कभी वृक्षों की शाखाओं पर लटकना - कितना आनंदात्मक सुख है। दुख तनिक भी साहस नहीं करता कि अपनी गिरफ्त में ले लें। समय सदा दिन के साथ और अगले कल का साथ देता है। गांव से दूर उस एक टीले पर अक्सर वह जाया करता और इस बाहरी पर्यावरण में हो रही उथल-पुथल को निहारता। वहीं पर एक कब्रिस्तान था - दफ़नाए गये लाशों पर वह बैठता और उस एक सवाल से लड़ता कि भूत प्रेत होते हैं और वहां ...