अतीत के चलचित्र।
जहाँ तक चलते जाने का प्रश्न है, चलते जाया जा सकता है। परंतु जहाँ ठहरने का प्रश्न आता है, वहाँ बहुत-सी अपेक्षाएँ जाग्रत हो उठती हैं और उन सबकी पूर्ति असंभव होने से, फिर चल देने की धुन समा जाती है।
पक्षियों का कलरव, सूर्यास्त की लालिमा पतली धागों का रूप रखकर उसके नेत्रों की पुतलियों में उतरती जाती थीं। पतली पगडंडीयों पर दोनों तरफ उगे घासों को वह निहारता था, पगडंडी के एक छोर पर पानी के छोटे से घेराव ने मछलियों को पनपने का अवसर दे दिया था। वह अक्सर इन्हें ललचाई आंखों से देखता और यह भी देखता कि जीवन का पुष्प कहीं भी खिल सकता है अगर सुरक्षा का तनिक भर आश्रय मिलें। बच्चे उसी पगडंडी पर नाना प्रकार के खेल खेल रहे हैं; कभी गुल्ली-डंडा तो कभी वृक्षों की शाखाओं पर लटकना - कितना आनंदात्मक सुख है। दुख तनिक भी साहस नहीं करता कि अपनी गिरफ्त में ले लें। समय सदा दिन के साथ और अगले कल का साथ देता है। गांव से दूर उस एक टीले पर अक्सर वह जाया करता और इस बाहरी पर्यावरण में हो रही उथल-पुथल को निहारता। वहीं पर एक कब्रिस्तान था - दफ़नाए गये लाशों पर वह बैठता और उस एक सवाल से लड़ता कि भूत प्रेत होते हैं और वहां जाया मत करों - वहां खतरा है। घुमड़ते बादल, हाथियों सा हुंकार भरते और उनकी गर्जना में वह अपने मन की उस रिक्तिता को पूर्ण करने का असम्भव प्रयास करता कि कुछ तो अजीब है- जो उसका पीछा करती है। बरसात का जल ताल-तलैया, तालाब, पोखर और फसल से लदे खेतों को एक कर देती थी; उनका जल आबाध रूप से एक दूसरे में परिसंचरण करता रहता। मछलियां और धान स्वयं एकसाथ होकर मिश्रित खेती का उदाहरण पेश करतें। बाबा अक्सर कहते कि सुबह पौ फटने से पहले खेतों की तरफ चले जाना जिससे ज्यादा से ज्यादा मछलियां पकड़ सकों। वह जाता और मछलियों का खुशहाल जीवन निहारता, वह आनंदित होकर जीवन की एकरसता को छोटी और बड़ी मछलियों के साथ देखता; वह प्रकृति की उस मनोहर और निर्मल बहाव में डूब जाता जहां से एक निर्माण सम्भव हो सकता था और बाबा आते - बोलते कि तुमसे कुछ ना होगा, दूसरे लोग बहुत सी मछलियां लेकर चले जा रहे हैं। आखिर मछलियां पेड़ पर कैसे चढ़ सकती थीं!?
गुड़ घर के अंदर मटकों में बंद रखा हो, तो कितना ही मूसलाधार पानी बरसे, कोई हानि नहीं होती; पर जिस वक़्त वह धूप में सूखने के लिए बाहर फैलाया गया हो, उस वक़्त तो पानी का एक छींटा भी उसका सर्वनाश कर देगा। निर्माण और प्रलय दोनों एक साथ जुड़े हैं, एक में सदियों का समय लगता है तो दूसरे में कुछ क्षण ही पर्याप्त है। प्रातः से सायंकाल तक मूसलाधार बारिश होती और मां का संघर्ष आग्रह बनकर ईश्वर से कुछ मांगता। छप्पर के बने घर में, वह अपने छोटी बहन को सम्हालता ताकि मां कुछ खाना पका सकें। बारिश का पानी जगह जगह से घर में प्रवेश करता और टपकता हुआ वर्षाजल शरीर में सिहरन पैदा करता। मां क्षण भर में बाहर जातीं, कोई प्लास्टिक छप्पर पर डालतीं- खासकर उन जगहों पर जहां उनका चुल्हा था- जहां से कुछ रोटी वह पका सकती थीं ताकि पूरा परिवार दर्द और वेदना को पूरी रात सह सके। गीली लकड़ियों और गीले उपलों से चुल्हा ना जलता, मां की तबीयत बिगड़ती और वह भागकर एक लकड़ी लेता तथा एकत्रित वर्षाजल पर कई प्रहार करता। दुःखी हृदय दुखती हुई आंख है, जिसमें हवा से भी पीड़ा होती है। बारिश से वह घृणा करने लग गया था; अपनी छोटी सी उम्र में वह अगर यह सोच पाता कि कृषकों, प्रकृति के लिए बरसात अति आवश्यक है तो भी उसका घृणा स्वाभाविक और उचित था। वर्षाजल वनस्पतियों के लिए जीवनदायिनी है किन्तु यहीं जल उसके भीतर विद्रोह की अग्नि भड़का देती। उसका भय घृणा में तब्दील हो गया था। मनुष्य के मन और मस्तिष्क पर भय का जितना प्रभाव होता है, उतना और किसी शक्ति का नहीं। प्रेम, चिंता, हानि यह सब मन को अवश्य दुखित करते हैं, पर यह हवा के हल्के झोंके हैं और भय प्रचंड आँधी है। एक में उसकी मौलिकता उजड़ी तो दूसरे में संवेदनशीलता। वही आग जो मोटी लकड़ी को स्पर्श भी नहीं कर सकती, फूल को जला कर भस्म कर देती है।
अक्सर वह शांत रहता, गुपचुप तरीके से यहां वहां पड़ा रहता; आस-पास की घटनाओं को ध्यान से निहारता। लोग उसका मजाक उड़ाते, उसे आम ना पाकर उसके खास होने पर किसी का ध्यान ना जाता। आगे चलकर, जब उसने अध्ययन और कला के क्षेत्र में कुछ उपलब्धियां हासिल कीं, तो लोगों को समझ में ना आता कि यह कैसे कर सकता है? वह सोचता कि लोग हँसेंगे; लेकिन जो लोग ख़ाली हँसते हैं, और कोई मदद नहीं करते, उनकी हँसी की वह क्यों परवा करे। प्रेम निर्भय करता है - वह कुछ अलग बनने में सुख पाता। जिन प्रेमियों को साथ रोना नहीं नसीब हुआ, वे मुहब्बत के मजे क्या जानें? बारिश ने तब भी जीवन में खुशहाली ही लाई थी- तनिक कठोर होकर; बारिश आज भी जीवन में खुशहाली ला रही है जब मैं अपने लग्जरी कमरे के खिड़की से उसे निहारता हूं।
नौका पर बैठे हुए जल विहार करते समय हम जिन चट्टानों को घातक समझते हैं, और चाहते हैं की कोई इन्हें खोदकर फेंक देता, उन्हीं से नौका टूट जाने पर हम उन्हीं चट्टानों से चिपक जाते हैं।
अरविंद कुमार।
(मेरी डायरी से)
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