मानव की जय यात्रा
मानव की जय यात्रा हमने आपने सबने जब जन्म लिया था तब आज जैसे नही थे।आदिमानव भी वैसे न थे जैसे कि आज वे है, यह उसकी युगो युगो की जय यात्रा के सुफल है। क्या आपने देवदारू के दीर्घकाय वृक्ष को देखा है? वह जड शक्ति के दुर्वार आकर्षण - महाकर्षण को पराभूत करते हुए निरन्तर उर्ध्वगामी बनकर उन्मुक्त व्योममंडल मे विहार करता है और पाषाण की कठोर छाती भेदकर अज्ञात पाताल से अपना रस खीचता रहता है। विशिष्टता यह है कि वह अपने स्थान पर दृढता से खडा रहता है। वास्तविक मनुष्य वही है जो पशु धरातल से पाशविक गुणो से ऊपर उठा हो। मनुष्य व पशु मे आदिम सहजात अनेक प्रवृत्तियां प्रबल है - आहार, निद्रा, भय, मैथुन आदि लेकिन मनुष्य फिर भी मनुष्य है। क्योंकि वह दूसरो के लिए अपना सर्वस्व उत्सर्ग कर सकता है उसमे त्याग है, संयम है, दया है, धैर्य है, श्रद्धा है और सबसे बडी गुण है- विवेकशक्ति बुद्धि और संकल्पशक्ति। विलियम जेम्स लिखते है कि "विवेकहीनता के क्षणो मे जब मनुष्य का पशुत्व प्रबल हो जाता है तब वह पशु से भी बुरा होता है और ऐसा भयानक जन्तु बन जाता है जो व्यवस्थित ढंग से अपने ही जाति के जन्तुओ का शिकार करता है।...