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मैं और मेरे पिताजी।

जीवन के इस उच्चावचों पर चलते हुए इस बात का अहसास होता है कि कितना आवश्यक है एक सीधी रेखा का होना, जो बिल्कुल समतल हो। कभी कभी आभास होता है कि जीवन मरूस्थल सा हो गया है जिसका प्रत्येक पल रेगिस्तान के उस हरेक गर्म रेत के कणों के समान प्रतीत होता है। इसमें दूर दूर तक हरियाली नजर नहीं आती है, नजर आती है तो मरीचिका जहां दूर दूर तक रेत का ढेर नजर आता है, एक बियाबान और बंजर सा जीवन हो जाता है। जिसमें प्रसन्नता के पुष्प नहीं खिल रहे हैं, सुख व समृद्धि की कलियां नजर नहीं आती और दुख उन नुकीले कांटों की तरह लिपटा रहता है जिसके दंश से शरीर से रूधिर नहीं बल्कि अश्रुओं की एक नदी नयनों से प्रवाहित होती है जिसमें वह सम्पूर्ण जीवन को डूबा लेना चाहती हैं। अंधकार से भरे इस जीवन में प्रकाश का अवलोकन पिता की उपस्थिति से होता है। पापा का होना रेगिस्तान को हरा भरा मैदान बना देता है जहां सुख व प्रसन्नता के पौधे लहलहाते रहते हैं। मैंने अपने पापा को कभी थका हुआ नहीं देखा और उनके भीतर वह सभी प्रकार की अच्छाइयां है जिससे मैं उनपर गर्व कर सकता हूं। उनका व्यक्तित्व मुझपर हावी रहता है और स्वयं को मैं उनके आंखों में ...