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Showing posts from October, 2024

अंधकार से अंधकार की ओर।

हम सबका जीवन अंधकार में है। हम हर पल अंधेरे में और अज्ञानता में जी रहे होते हैं। हमारे ज्ञान का, हमारे सोचने, समझने और अभिव्यक्ति करने की एक सीमा होती है और इसी सीमा में बंधकर हम दूसरे लोगों से व्यवहार करते हैं - जिसका परिणाम अच्छा तो कभी कभी बहुत अच्छा बनकर सामने आता है। हमारे सीमा से ऊपर उनकी सीमा होती है जिनका ज्ञान हमसे ज्यादा होता है परन्तु जैसे ही हम ऐसे ज्ञान के प्रकाश से आलोकित होते हैं तो हमारा अहंकार आकर बीच में खड़ा हो जाता है और दुबारा से हम अंधकार में बंधकर रह जाते हैं। इन पलों में आवश्यक होता है कि हम विनम्र बनें और अपने विवेक से ऐसे सभी लोगों का सम्मान करते हुए उनके ज्ञान से अपने ज्ञान की सीमा को बढ़ाने का हर संभव प्रयास करें। किसी के अनुभवों से सीखना और उससे प्राप्त शिक्षाओं को जीवन में आत्मार्पित करना - हमें वास्तविक सुखों की अनुभूति कराएगी लेकिन यह सीखना हमें फिर अंधकार में ले जाएगी क्योंकि ज्ञान की दूसरी सीमा को तोड़ना, हमारे लिए चुनौती होगी और इस प्रक्रिया में प्रकाश के पल केवल भ्रम है।  जीवन में कभी भी वह एक सीधी रेखा नहीं आएगी जब सबकुछ सही चल रहा हो और आप उस र...

A lie and its deleterious effects.

Lying can profoundly affect one's happiness, mental well-being, relationships and peace of mind. No other vice threatens happiness as much as lying does, be it in one's professional or personal sphere. Just as a nation may suffer from its leaders' lying, a family can also suffer from the lying of its members. Often, we overlook the fact that lies, intended to enhance our happiness, can ultimately destroy it. While lying may provide temporary benefits, entertainment and pleasure upon contemplation, one may recognise that lying as their greatest enemy, has snuffed out the very happiness it aimed to cultivate. This is how lying destroys our happiness.  Lying often results in guilt, anxiety or the fear of being caught. The mental effort required to sustain a lie can be overwhelming. Lying typically causes Cognitive Dissonance - the unease felt when your actions don't align with your beliefs or Self-perception, which can wear away at your inner tranquility.  True happiness u...

अपनी आत्मा से भागकर जीना ।

कभी कभी विचार करता हूं कि कितना अच्छा होता यदि हम अपनी आत्मा को गले लगा सकते और उसके कंधे पर सिर रखकर रो सकते; ऐसा इसलिए भी क्योंकि उससे ज्यादा महान शुभचिंतक और दूसरा कोई नजर नहीं आता है।  मनुष्य के शरीर में मन और आत्मा दो चेतन अवस्थाएं होती है - यह शब्द श्रीकृष्ण द्वारा दिए गये। फ्रायड ने मन को इड तो आत्मा को सुपर ईगो शब्दों से अलंकृत किया जबकि हीगल ने आत्मा के लिए विवेक शब्द का प्रयोग किया। हाब्स ने अपनी पुस्तक 'सोशल कांट्रैक्ट' में लेवियाथन शब्द का प्रयोग किया जो मनुष्य के भीतर रहने वाला वह भयानक राक्षस है जो व्यक्ति के नैतिक और सर्वस्व पतन के लिए ज़िम्मेदार है‌। मन मनुष्य को उन मूल्यों, संस्कारों के विरूद्ध ले जाता है और मनुष्य का हर प्रकार से नकारात्मक पतन करता है - यह नफ़रत, क्रोध आदि का सहारा लेता है - मनुष्य के शरीर में यह ज्यादा शक्तिशाली है। मन का शक्तिशाली रूप ही लेवियाथन है, यह एक सिर कटा राक्षस है जो सही और ग़लत का निर्धारण नहीं कर पाता परंतु यह जाता हमेशा पतन की ही तरफ है‌‌ । आत्मा व्यक्ति के उन्नति और नैतिक ऊर्ध्वाधर उन्नति के लिए ज़िम्मेदार है - जो मनुष्य को हमे...

अस्तित्ववाद की सीमाएं।

धरती पर मनुष्य की उपस्थिति उसके स्वयं होने का प्रमाण है। अन्य मनुष्यों की उपस्थिति और भौतिक परिस्थितियां उसके स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त निर्बंधन आरोपित करते हैं। समस्त संसार के केंद्र में मनुष्य होना चाहिए या दूसरे शब्दों में, मनुष्य साध्य और सब कुछ साधन होना चाहिए। अस्तित्ववादी विचारकों में सोरेन कीर्केगार्द, जान पाल सार्त्र और कामू प्रमुख हुए जिनमें सार्त्र और कामू को साहित्य का नोबेल पुरस्कार भी मिला। आप जो कुछ भी वर्तमान में है - आप अपने निर्णयों के परिणाम है। आप महान इसलिए भी नहीं बन सके क्योंकि आपने उचित समय उचित निर्णय नहीं लिया और सभी महान लोग इसलिए प्रसिद्ध हो पाये क्योंकि उन्होंने निर्णय लिया। मनुष्य स्वतंत्र है और उसकी स्वतंत्रता का परिक्षण इस बात से किया जा सकता है कि उसके पास चयन की स्वतंत्रता होती है। हर पल, हमारे सामने विकल्प होते हैं कि कौन सा विकल्प हम चुनते हैं - उसी से हमारा निर्माण होता है। भोजन करने और ना करने का विकल्प, शिक्षित होने या ना होने का विकल्प इत्यादि। यही संकल्प की स्वतंत्रता भी है जबकि नियतिवादी इसके विरोध में आ खड़े होते हैं क्योंकि उनका मानना होता है...