अपनी आत्मा से भागकर जीना ।
कभी कभी विचार करता हूं कि कितना अच्छा होता यदि हम अपनी आत्मा को गले लगा सकते और उसके कंधे पर सिर रखकर रो सकते; ऐसा इसलिए भी क्योंकि उससे ज्यादा महान शुभचिंतक और दूसरा कोई नजर नहीं आता है।
मनुष्य के शरीर में मन और आत्मा दो चेतन अवस्थाएं होती है - यह शब्द श्रीकृष्ण द्वारा दिए गये। फ्रायड ने मन को इड तो आत्मा को सुपर ईगो शब्दों से अलंकृत किया जबकि हीगल ने आत्मा के लिए विवेक शब्द का प्रयोग किया। हाब्स ने अपनी पुस्तक 'सोशल कांट्रैक्ट' में लेवियाथन शब्द का प्रयोग किया जो मनुष्य के भीतर रहने वाला वह भयानक राक्षस है जो व्यक्ति के नैतिक और सर्वस्व पतन के लिए ज़िम्मेदार है। मन मनुष्य को उन मूल्यों, संस्कारों के विरूद्ध ले जाता है और मनुष्य का हर प्रकार से नकारात्मक पतन करता है - यह नफ़रत, क्रोध आदि का सहारा लेता है - मनुष्य के शरीर में यह ज्यादा शक्तिशाली है। मन का शक्तिशाली रूप ही लेवियाथन है, यह एक सिर कटा राक्षस है जो सही और ग़लत का निर्धारण नहीं कर पाता परंतु यह जाता हमेशा पतन की ही तरफ है । आत्मा व्यक्ति के उन्नति और नैतिक ऊर्ध्वाधर उन्नति के लिए ज़िम्मेदार है - जो मनुष्य को हमेशा अच्छी राह दिखाने और उस पर ले जाने का प्रयास करता है।
हम प्रसन्न हैं अथवा नहीं - इस तथ्य का निर्धारण दो आधारों पर किया जा सकता है- बहिर्जगत और अंतर्जगत की गतिविधियों के साथ समन्वय। पहली बात कि हम लोगों को दिखाएं - हम कितने प्रसन्न हैं? इसके लिए हम अपने चेहरे पर मुस्कान धारण करें, महंगी वस्तुओं और विशेष व्यक्तियों के साहचर्य पाने का ढोंग रचे जिससे लोग यह जान पाए कि हम कितने प्रसन्न हैं। दरअसल, यह बहिर्जगत की प्रसन्नताएं है और ऐन्दरिक सुखों पर आधारित क्षणिक प्रसन्नता है - मन ऐसे सुखों की तरफ ले जाने वाला मुखिया होता है। तथा हमारा ध्यान उन विषयों की तरफ से हटा देना चाहता है जो सही मायनों में जीवन के लिए आवश्यक है और अंत में, इन्हीं परिस्थितियों का सामना करते हुए- हमारा जीवन अत्यंत दुष्कर और कठिन हो जाता है, मौत की हम कामना करते हैं लेकिन कुछ भी नहीं किया जा सकता। अंतर्जगत की प्रसन्नता आत्मा के आदेशों का पालन करने से होता है। आत्मा शरीर में विद्यमान मनुष्य का सबसे बड़ा और पवित्र पथ प्रदर्शक है जो हमेशा और हमारे प्रत्येक निर्णय पर हमें उचित और सही सलाह मुहैया कराता है। मनुष्य अपने मन के नियंत्रण में आकर चाहे कितना भी बड़ा पाप या ग़लत या गैरकानूनी काम करें - उसकी आत्मा उसकी साथ वहां भी नहीं छोड़ती और सर्वदा उसकी शुभचिंतक बनकर उसका साथ देती है। समाज में निकलते ही, हमारे प्रत्येक कार्य कैसे होंगें? हम किन लोगों का साथ चुनेंगे और किस दिशा में पलायन करेंगे, हम अपना निर्माण करना चाहते हैं या पतन - यह सब निर्धारण इस बात से होता है कि हमारा स्थूल शरीर मन के नियंत्रण में है या आत्मा के। आत्मा इन सब स्थितियों में उचित सलाह देगी और यदि हमने स्वयं को उसके नियंत्रण में डाल दिया है तो हमारी नैतिक उन्नति करता हुआ ऊपर लेता जाएगा और मन के नियंत्रण में रहकर इन्हीं परिस्थितियों में हम सबसे खराब और पतन कर देने वाले विषयों का साथ चुनते हैं जिससे कुछ समय के लिए चुनौतियों से बचा सके और जीवन को ऐन्दरिक सुखों में बह जाने दिया जाय। आत्मा यहां भी साथ नहीं छोड़ती और वह शक्तिशाली बनने का प्रयास करती है।
सवाल यह खड़ा होता है कि स्वयं को आत्मा के नियंत्रण में कैसे डाला जाए? क्योंकि मन के नियंत्रण में तो यह शरीर सर्वदा से नजर आती है, हमारी पाशविक इच्छाएं - इस बात का प्रमाण है कि हम मन के नियंत्रण में है। स्वयं को आत्मा के नियंत्रण में डालना ही हमारी उन्नति के लिए श्रेयस्कर सिद्ध होगा। ऐसा करने लिए सबसे ज्यादा आवश्यक है- मस्तिष्क की उन्नति। दरअसल, मस्तिष्क ही वह स्रोत है, जहां से मन व आत्मा दोनों अपने उदरपूर्ति हेतु आहार प्राप्त करते हैं। मस्तिष्क में अच्छी और बूरी बातों, आदतों या वस्तुओं का भंडार जमा होता है और मन व आत्मा अपने अपने स्वभाव के अनुसार चीजों का उपभोग करते हैं। मस्तिष्क की उन्नति के लिए आवश्यक है कि हम उन महान आदर्शों, समाज व राष्ट्र के चिंतकों, महान महात्माओं, यथार्थवादी सत्यों, महान पुस्तकों की श्रृंखलाएं, महापुरुषों इत्यादि का सेवन करें जिससे आत्मा शक्तिशाली हो और वह प्रत्येक स्थिति में शरीर को अच्छाई की तरफ ले जा सकें। जब वह अकेली भी पड़ जाए तो भी अकेले ही सत्य के साथ खड़ी हो सकें और साहस से चुनौतियों का सामना कर सकें। इसके उल्ट, मस्तिष्क की उन्नति ना करना- शरीर मन के नियंत्रण में जाएगा और हमारा पलायन गर्त में होगा, हम स्वंय के जन्म पर एक धब्बा लगा लेंगे। सही और ग़लत का फैसला, कर लेना चाहिए और आत्मा या स्वयं के अंदर से आने वाली आवाज जो सच में सत्य होती है - उसका अनुसरण करना, व्यक्ति के लिए हितकारी है। भले ही कोई, मन के नियंत्रण में कुछ साल गुजार लें लेकिन आत्मा एक दिन सामने आकर मन का गर्दन पकड़कर मरोड़ देगी और शरीर को असहाय अवस्था में छोड़ देगी। हमारे पास पाश्चाताप के अलावा और दूसरा कोई रास्ता नहीं रहता है।
आत्मा की सर्वोत्कृष्ट अवस्था परमात्मा है। आत्मा की आवाज को महसूस कर पाना अंतरात्मा है।
( कमेंट बाक्स में, अपने तर्क वितर्क करें )
अरविंद कुमार।
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