आत्म जागरूकता का तार्किक पक्ष।

उपवन में खिला खुबसूरत गुलाब अपनी आकर्षण और खुशबू के सहयोग से हमें अपनी ओर आकर्षित करता है, हम उसकी तरफ प्रस्थान करते हैं; हमारा उसकी तरफ जाना सत्य को केवल एक चौथाई रूप में जानना है। क्योंकि जिन तत्वों के लिए, हमारा प्रस्थान सुनिश्चित हुआ है- जल्द ही मस्तिष्क उसकी अधिकता से भर जाएगा और दूसरे ही पल, हमारे उंगलियों से रक्त का धार प्रवाहित होगा और उसके अगले चरण में - हम पुष्प को मसलकर फेंक देंगें।

पश्चिमी जगत के दर्शन और पूर्वी जगत के दर्शन में सबसे बड़ा अंतर यह है कि वहां व्यक्ति को ब्रम्हांड से अलग स्वतंत्र चेतना बताया गया, स्वर्ग और नरक की कल्पनाएं की गई जबकि पूर्व में कोई अंतर नहीं किया गया- यहां ध्यान, शांति को अधिक महत्व दिया गया। पश्चिम में, सोरेन कीर्केगार्द महत्वपूर्ण अस्तित्ववादी विचारक हुआ- जिसने मानव अस्तित्व, व्यक्तिपरकता, व्यक्तिगत पसंद और प्रतिबद्धता पर जोर दिया। आधुनिक दर्शन में ऐसा पहली बार हुआ- जब मनुष्य को अधिक निकटता में अवलोकन और विश्लेषित किया गया।‌ हमारे मस्तिष्क में कई खड्डे होते हैं जिनका भराव अचानक से नहीं होता और इनके भराव के लिए, व्यक्ति सैकड़ों प्रकार की यात्राएं करता है जिसमें संताप, पीड़ा हिस्सें में आती है। जैसे यदि कोई पुरुष कामनाओं से आतुर, किसी स्त्री के अधिक सुंदरता पर मोहित हुआ है तो एक बार गहरी परिचय हो जाने के बाद- स्त्री की वहीं सुंदरता उसके लिए बोझिल तथा नीरस हो जाता है। एक खड्ड था जो भर गया और अनेकों प्रकार के खड्ड हम मस्तिष्क में रखकर विचरण कर रहे हैं। जिस व्यक्ति को अंधेरा दिखाई देता है उसके पास आंखें हैं जिससे वह प्रकाश देख सकता है। अंधेरे को देखकर यदि व्यक्ति कहने लगे कि अंधेरा ही सबकुछ है तो वह नास्तिक है और अंधेरे को देखकर जो प्रकाश की तलाश में निकल पड़े, वह आस्तिक। विपरीत सदैव साथ मौजूद होते हैं, जहां दुख है- वहां सुख होगा; जहां जन्म है वहां मृत्यु होगी। अगर आपने जीवन में क्रोध का अनुभव कर लिया तो करूणा भी कहीं छिपी होगी, यदि आपने नफ़रत को पहचान लिया तो प्रेम भी कहीं है जिसे खोजने की जरूरत है। सार्त्र कहता है कि अंधेरा ही सबकुछ है, दुख ही सबकुछ है, विशाद सबकुछ है, नरक ही नरक है कोई स्वर्ग नहीं है। बुद्ध और सार्त्र दोनों यहां तक एक ही बात करते हैं लेकिन बुद्ध ने सोचा कि अगर दुख है तो क्यों है? वह मनुष्य पर आधिपत्य करता है, उसे समाप्त करने की विधियां क्या-क्या है? दुख निरोध कैसे होगा? सार्त्र अंधकार को ही स्वीकार करके जीने लगा। यदि हम भी ऐसे जीने लगे तो जीवन नीरसता से भर जाएगा, हम पुष्प को स्वीकार नहीं करेंगे। हम तड़पेंगे और कोई हमें सहारा नहीं देगा। यदि हमारी पीड़ा हमें उत्साहित नहीं कर रही है कि सुख तलाशें तो एक ही बिंदु पर हम टिके रहना चाहते हैं। जिससे खड्ड और गहरी होती जाती है।

देकार्त ने द्वैतवाद, संदेहवाद का सिद्धांत दिया और इस बात पर जोर दिया कि संसार की प्रत्येक वस्तु व परिवर्तन पर संदेह किया जा सकता है। "मैं सोचता हूं इसलिए मैं हूं ( Cogito, ergo sum)" उनका प्रसिद्ध वाक्य है। जो यह बताता है कि किसी भी चीज पर संदेह करने के बावजूद, यह निश्चित है कि संदेह करने वाला व्यक्ति मौजूद हैं और यही उसका मन है। मन और शरीर दो अलग अलग सत्ताएं है- जो निरंतर एक दूसरे से बात करती रहती हैं; दोनों की स्वायत्त इच्छाएं तथा जरूरतें हैं। कोई भी बदलाव, जो हम आज अपने चारों तरफ देख रहे हैं - वह संदेह का परिणाम है, सोचकर उसका निरीक्षण करके परिणाम निकाला गया है। हर व्यक्ति स्वतंत्र है, उसके लिए सत्य का यथार्थ अलग हो सकता है- वह नहीं जिसने उसे बिना संदेह के अपना लिया है। हमारा मन ही वह आवश्यक तत्व है जो हम हैं। हमारे मन में हमारी चेतना, हमारी समझ और हमारी भावनाएँ समाहित हैं। स्वयं के प्रति हमारी जागरूकता और विचार करने की हमारी क्षमता हमारे अस्तित्व और आत्मा के निर्माण का एक महत्वपूर्ण घटक है। संसार में हमारी भौतिक उपस्थिति और इसी संसार में परमात्मा का होना, जिनकी भौतिक उपस्थिति हम दर्ज नहीं कर पाते हैं - दोनों की सत्यता पर संदेह किया जा सकता है लेकिन इसे बड़े स्तर पर स्वीकार किया जाता है। मन बिल्कुल हवा की तरह है जो भले ना दिखे लेकिन शरीर में उपस्थित होकर अपना प्रभाव छोड़ता है और एक स्वतंत्र चेतना के रूप में कार्य करता है। जब रोमांटिकवाद का उदय 19 वीं सदी के प्रारंभ में यूरोप में हुआ जो कि एक सांस्कृतिक आंदोलन था- इसने व्यक्ति के भावना और कल्पना का अधिक महत्व और इस पर विद्यमान कई रचनाएं तथा शोध प्रकाशित हुए। इसने व्यक्तिवाद की परम्परागत परिभाषा को चुनौती दी जिसमें स्वतंत्रता को अधिक महत्व दिया गया, भले ही यह नकारात्मक प्रभाव छोड़ता है।‌ यहां व्यक्तिवाद व्यक्ति की रचनात्मकता और अद्वितीयता पर जोर देता है- भावनाओं को व्यक्त करने पर जोर देता है। विलियम वर्ड्सवर्थ, सैमुअल टालर कालरिज, लुडविग वैन बीथोवेन, फ्रांज शुबर्ट जैसे कई महान साहित्यकार तथा संगीतकार हुए। यह एक संयोगवश संक्रमणकाल था - व्यक्ति की महत्ता को पहले से ज्यादा महत्व दिया।

जार्ज बर्कले ने भौतिक उपस्थिति को पूर्ण रूप से नकार दिया, उन्हें आभासीवाद का जनक माना जाता है और इनके विचारों ने आधुनिक दर्शन को गहराई से प्रभावित किया। केवल मन और विचार ही वास्तविक है और भौतिक वस्तुओं की उपस्थिति मन पर निर्भर करता है‌। अनुभव से हम वस्तुओं का मानवीकरण करते हैं। डेविड ह्यूम ने अपने संशयवाद में इसी से मिलता जुलता सिद्धांत दिया- सभी ज्ञान अनुभव से आता है और अनुभव हमेशा सही नहीं होता। कार्य-कारण में एक प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता है लेकिन बहुत बार दोनों एक दूसरे से स्वतंत्र हो जाते हैं। हमें हमेशा संदेह करने के लिए तैयार रहना चाहिए क्योंकि सत्य का यथार्थ इसी से सुनिश्चित होगा। विज्ञान और तर्क पर हम इसी से भरोसा कर सकते हैं। संसार में हमेशा नये विचार पैदा होते रहेंगे, अच्छी व्यवस्थाओं से भी ज्यादा अच्छी व्यवस्थाएं हैं जिनका अन्वेषण व्यक्ति तर्क और संदेह के आधार पर करेगा। आधुनिक मानव सबसे ज्यादा अच्छे समय में, अधिक सुविधाजनक जीवन व्यतीत कर रहा है और भविष्य की पीढ़ीयां इससे भी ज्यादा आरामदायक स्थिति में रहेंगी क्योंकि प्रत्येक आने वाली पीढ़ी अपने अतीत से ज्यादा बुद्धिमान और तार्किक होंगी। जब फूल खिलता है तो कली गायब हो जाती है, और हम कह सकते हैं कि कली द्वारा कली का खंडन किया जाता है; इसी प्रकार जब फल लगते हैं, तो फूल को पौधे के अस्तित्व का एक मिथ्या रूप समझा जा सकता है, क्योंकि फूल के स्थान पर फल अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट होता है। उनकी अपनी अंतर्निहित प्रकृति की निरंतर क्रियाशीलता इन अवस्थाओं को एक जैविक एकता के क्षण बनाती है, जहाँ वे न केवल एक-दूसरे का खंडन नहीं करते, बल्कि जहाँ एक उतना ही आवश्यक है जितना दूसरा; और इस प्रकार समग्र जीवन का निर्माण करते हैं। 

अरविंद कुमार।

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