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Showing posts from March, 2026

मन, तू क्यों रोता है !

नजरें उठतीं हैं  देखती हैं सबकुछ  इक सवाल पूछतीं हैं  क्या हुआ तुम्हारे उस वादे का जो एक समय तूमने खुद  से किया था -  कुछ करने का  कुछ बड़ा करने का,  जब सब बच्चे खेल रहें थें  तब तुम यह सोचकर कि यह  अच्छे बच्चे नहीं करतें - तुम लगे रहे अपने किताबों में। निगाहें देखतीं हैं मुझे  उन पथराई घासों की - जो  कभी नरम थीं, मुलायम थीं  और,  इक सवाल पूछतीं हैं;  तुम्हारे उत्साह को क्या हुआ?  तुम क्या बनते जा रहे हो?  तुम ऐसे तो ना थे!  सच्चाई आंखों को नंगा करती  जाती है - और लोग छूटते जातें हैं;  पीछे मुड़कर देखूं तो, गोबी मरुस्थल में उड़े रेतीले  बालू की आंधी नजर आती है: जो अच्छाई का प्रपंच पढ़ाया गया, वह मिथक था या झूठ; मन आराम नहीं पाता, मन, तू क्यूं बीमार होता है! यह संग्राम नहीं,  महासंग्राम हैं। जीवन की व्यथा -  इसकी सच्चाईयां हैं  सोचता हूं - किससे कहूं? मां की चूड़ी रोती है, पापा का कंधा झुका जाता है इस उम्मीद में की, शायद सबकुछ एक दिन ठीक  होगा।  यह रातों की थकान दि...

अपूर्णता में आनन्द ।

जीवन जीने के सम्पूर्ण प्रक्रिया में, हमें जो सिखाया जाता रहा है - उसमें असत्य और नाममात्र की सच्चाई प्रतिबिम्बित होती दिखाई देती है। सोशल मीडिया एक भ्रम पैदा करता है और सिक्के का एक पहलू हमारे सामने प्रस्तुत करता है - जहां हंसते हुए चेहरे और भौतिकता ही सबकुछ है, ऐसा प्रतीत होता है। जीवन में कुछ भी पूर्ण नहीं है, केवल प्रसन्नता ही प्रसन्नता और केवल सुख ही सुख हासिल नहीं किया जा सकता है। किसी भी वृक्ष में एक जड़ होता है, जो भूमि की गहराइयों में समाकर एक अस्तित्व का निर्माण करता है, वह जड़ अति कीचड़ भरी, धूल-मिट्टी जैसे इलाकों में अपना नाम दर्ज कराता है जबकि वहीं इसकी शाखाओं पर लगे खुबसूरत फूल और फल - सौंदर्य की अद्भुत कलाकृति प्रदर्शित करते हैं परन्तु जड़ के बिना इनका अस्तित्व शून्य है। केवल फूल और फल के सौन्दर्य को देखकर इसे ही सत्य मान लेना; यह बहुत बड़ी नादानी और स्वयं के पैरों पर खुद कुल्हाड़ी चला लेने के समान होगा। संसार में सत्य और असत्य, पाप और पुण्य, अच्छा और बूरा, खुबसूरत और बदसूरत, नैतिक और अनैतिक - इसकी कोई सामान्य परिभाषा नहीं है; यह आपकी व्यक्तिगत दृष्टिकोण और नजरिए पर निर्भ...