मन, तू क्यों रोता है !
नजरें उठतीं हैं
देखती हैं सबकुछ
इक सवाल पूछतीं हैं
क्या हुआ तुम्हारे उस वादे का
जो एक समय तूमने खुद
से किया था -
कुछ करने का
कुछ बड़ा करने का,
जब सब बच्चे खेल रहें थें
तब तुम यह सोचकर कि यह
अच्छे बच्चे नहीं करतें - तुम लगे रहे अपने किताबों में।
निगाहें देखतीं हैं मुझे
उन पथराई घासों की - जो
कभी नरम थीं, मुलायम थीं
और,
इक सवाल पूछतीं हैं;
तुम्हारे उत्साह को क्या हुआ?
तुम क्या बनते जा रहे हो?
तुम ऐसे तो ना थे!
सच्चाई आंखों को नंगा करती
जाती है - और लोग छूटते जातें हैं;
पीछे मुड़कर देखूं तो,
गोबी मरुस्थल में उड़े रेतीले
बालू की आंधी नजर आती है:
जो अच्छाई का प्रपंच पढ़ाया गया, वह मिथक था या झूठ;
मन आराम नहीं पाता,
मन, तू क्यूं बीमार होता है!
यह संग्राम नहीं,
महासंग्राम हैं।
जीवन की व्यथा -
इसकी सच्चाईयां हैं
सोचता हूं - किससे कहूं?
मां की चूड़ी रोती है,
पापा का कंधा झुका जाता है
इस उम्मीद में की,
शायद सबकुछ एक दिन ठीक
होगा।
यह रातों की थकान
दिन की मटियामेट शरीर,
त्यागों के नाम पर क्या?
जहाज का पक्षी कहां जाएं
उड़कर - कहीं कोई ठहराव नहीं,
कहीं कोई आम का बौर नहीं
है तो साइबेरिया का सिकुड़न
और गलन,
मां के हाथों की गरमाई नहीं -
लेकिन कोई तपकर ही
बना है - चमकता तलवार,
मन, आखिर तू क्यों रोता है?
अरविंद कुमार।
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