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Showing posts from August, 2024

संकल्प की शक्ति - Solemn Vow

अक्सर बागीचे में टहलते हुए - यह देखकर हैरानी होती है कि अलग अलग पौधों में अलग अलग रंगों के फूल व फल आये हैं। सारा आकाश, सूर्य, ब्राह्मड की अनन्त तरंगों, हवाओं, जल का वाष्पीकृत रूप आदि छोड़कर उस छोटे से बीज की संकल्प शक्ति इतनी ज्यादा है कि वह अपने इच्छानुसार धरती से अपने पसंद का रंग व स्वभाव चुन लेता है। हर बीज की अपनी इच्छा हैं - गुलाब गुलाब बन जाता है और चमेली चमेली बन जाता है; एक ही मिट्टी में से दोनों अपनी ऊर्जा व पोषण प्राप्त करते हैं।  जिंदगी में अनन्त सम्भावनाएं हैं और उन सम्भावनाओं में से हम वहीं चुन लेते हैं जो हम चुनना चाहते हैं। हमारे आस पास अनन्त विचारों का प्रवाह है और हम उन्हीं विचारों को अपने पास ले आते हैं जो हम लाना चाहते हैं। इसी दुनिया में कोई जीसस, कोई बुद्ध तो कोई कृष्ण बन जाता है और हम कुछ भी नहीं बन पाते हैं और कुछ ना बनकर ही मिट जाते हैं। और जिस दुनिया से ऊर्जाएं खींची जाती है - वह आसमान, तारे, सूर्य, हवाएं सब एक हैं फिर इसी दुनिया में लोग अलग अलग क्यों हो जाते हैं? आखिर आदमी के व्यक्तित्व अलग अलग क्यों हो जाते हैं? मनुष्य के शरीर में सात केंद्र है और इसी के...

स्वयं में समाधान की तलाश।

हम स्वयं के सबसे बड़े शत्रु है। वे हम ही हैं जो अपने आंखों को दोनों हाथों से ढक लेते हैं और फिर चिल्लाते हैं कि कितना अंधेरा है। हम बाहरी दुनिया के उन ऊहापोहों में मग्न रहते हैं जिनसे वास्तविक रूप में कोई विशेष फल की प्राप्ति नहीं होती है। जो युद्ध स्वयं के विरूद्ध होती है; वह अपने आप में बहुत ज्यादा भयानक और तनाव पैदा करने वाला होता है। स्वयं से युद्ध लड़ने की प्रक्रिया में, स्वयं के भीतर झांकना पड़ता है - अपने भीतर हो रहीं उठा-पटक पर गौर करना होता है। जिंदगी के सभी दुखों और परेशानियों का हल, बाहर नहीं भीतर हैं। इनका अन्त किसी व्यक्ति के द्वारा, वस्तुओं की प्राप्ति अथवा नये नये जगहों पर जाने से बिल्कुल नहीं होगा। इसका हल बहुत आसान है, केवल अकेले में स्वयं के साथ बैठना है और अपनी आत्मा से बातें करनी हैं। लेकिन हम स्वयं से भागते है और उन कृत्यों को करते हैं जिन्हें करने की आत्मा तनिक भी गवाही नहीं देती है और कभी इन विषयों पर हमारा आत्मा से साक्षात्कार ना हों - हम दूर भागते हैं। लेकिन यह भागना और उन विषयों पर बैठकर कुछ पल चर्चा ना करने की प्रक्रिया - बस कुछ ही समय के लिए है। एक दिन, अंतर...

मनुष्य की मूल चेतना में क्या है ?

जीवन के रंगमंच पर खेल खेलते हुए, हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि जीवन के नियंत्रण की जो अदृश्य डोर है; वह हमारे हाथों से नहीं बल्कि, किसी दूसरे शक्तिशाली हाथों में बंधी है। हम और आप कठपुतलियां हैं - जिसे उस डोर से बांध दिया गया है तथा इन कठपुतलियों का मालिक अपनी इच्छा पर हमारा प्रयोग कर रहा होता है। जिंदगी को जितना ज्यादा आप अनुभव करते जायेंगे, इसके ठोकरों से दो चार करते जायेंगे; उतना ही इस बात का आभास होगा कि हमारे नियंत्रण में कुछ भी नहीं है। हम जो सांसें ले रहे हैं - वह गिन गिन कर प्राप्त हो रही है, जिसका हमें मूल्य चुकाना पड़ता है। मनुष्य का शरीर एक सीढ़ी के समान है, यह सीढ़ी एक तरफ जहां मनुष्य को ऊपर ले जाती है तो दूसरी तरफ नीचे भी ले जाती है। महात्मा बुद्ध, महावीर स्वामी ने अपने इसी शरीर रुपी सीढ़ी का प्रयोग करके ऊपर की तरफ चलते चले गये। ध्यातव्य है कि नीचे जाने में कोई विशेष प्रयत्न नहीं करना पड़ता है; आप अधिक गति से, आसानी से नीचे की तरफ चलते चले आते हो। शरीर में इंद्रियां जुड़ी हुई है जो इसे विषयों की तरफ आसक्ति भाव से ले जाती है और इसपर यदि ज्ञान का अंकुश ना हो तो बहुत बार यह जान...

आइए कैलोरी को समझें - शरीर में कैलोरी।

हम जो कुछ भी खाते और पीते हैं - उससे शरीर को ऊर्जा प्राप्त होती है और इस ऊर्जा को हम कैलोरीज़ में नापते और उच्चारण करते हैं। एक स्वस्थ शरीर पाने के लिए, यह ध्यातव्य होना चाहिए कि कैलोरी किन स्रोतों से प्राप्त हो रही है। एक सामान्य मनुष्य कि रोज की ऊर्जा ज़रूरत 2000 कैलोरीज़ होती है और यदि आपको वजन बढ़ाना है तो इस सीमा से अधिक कैलोरीज़ खायें और घटाना है तो कैलोरी की इस सीमा से कम खाएं। एक किलोग्राम वजन 7700 कैलोरीज़ के बराबर होती है और शरीर का एक किलो वजन गिराने के लिए 7700 कैलोरीज़ शरीर से बर्न करना होगा। हमारे द्वारा उपभोग की गई खाद्य पदार्थों में तीन मुख्य घटक - कार्बोहाइड्रेट, वसा और प्रोटीन होते हैं। जो सामान्यतः अनाज, डेयरी प्रोडक्ट्स, मांस और कुछ अलग प्रकार की सब्जियों व फलों को खाने से प्राप्त होती है। कार्बोहाइड्रेट हमारे ऊर्जा का मुख्य स्रोत होता है और इसमें शर्करा, यीस्ट और स्टार्च तीन अवयव जुड़े होते हैं। शर्करा - फ्रक्टोस, सुक्रोज आदि रूप में हम अलग अलग स्रोतों से प्राप्त करते हैं। यह कार्बोहाइड्रेट भी दो प्रकार का होता है, पहला - सिम्पल कार्बोहाइड्रेट (जिसका पाचन शरीर में ...

मेरा दुश्मन - ll

आज एक बार फिर, उसने मुझे हरा दिया। मैं अगर थोड़ा सा भी कमजोर पड़ता हूं तो वह मुझे गिराकर मेरे सीने पर तांडव करने लग जाता है। मैं लगातार इससे संघर्ष कर रहा हूं। सात दिन के लम्बे संघर्ष के बाद, आज जैसे अहसान करके उसने मुझे हराया या उसने मुझपर दया करके हार मान ली - मैं इस बारे में कुछ नहीं कह सकता। सौभाग्य की बात यह है कि उसका मुझे हराना मेरे हित में ही है लेकिन मैं उसे अभी भी पास में बैठा देख रहा हूं, वह तनिक भी कमजोर नहीं लग रहा है बल्कि घायल शेर की तरह मुझे घूर रहा है और मानो दुबारा इस ताक में हैं कि कब मौका मिले और वह दुबारा कब मुझे परास्त कर दें। मैं अक्सर सोचता हूं कि जब वह सो रहा हो तो उसकी गर्दन पकड़कर मरोड़ दूं और हमेशा के लिए उसे मार डालूं लेकिन मेरे ऐसा ख्याल करने मात्र से ही, वह सबकुछ जान जाता है और मुझ पर अटठाहस करता है - हर वक्त मुझे चुनौती देता है। वह पिछले सात दिनों से एक बड़ी ग़लती कर रहा था और मैंने बार बार उसे समझाया कि ऐसा मत करो लेकिन जैसे किसी पागल हाथी की तरह वह मेरी पवित्र भावनाओं को, मेरे शरीर को खिंचता हुआ, रगड़ता हुआ ले के चला जाता है। और मैं असहाय होकर, अपने सि...

अकेलेपन का दंश।

अब्राहम मैस्लो के आवश्यकता सोपान क्रम पर, यदि आप निगाह डालेंगे तो सबसे ऊपर आत्म - साक्षात्कार जैसा शब्द नजर आता है। जिसकी व्याख्या मैस्लो, कर्ट गोल्डस्टीन, कार्ल रोजर्स ने अपने अपने शब्दों में की। जिसका एक सामान्य अर्थ यह समझा जा सकता है कि अपनी क्षमता का पूर्ण प्रयोग करके (शारीरिक और मानसिक) वास्तविक बन जाना है। जीवन की यह अवस्था मानसिक रूप से व्यक्ति को इतना ऊपर पहुंचा देती है कि वह समाज और लोगों से कटता और अलग होता जाता है क्योंकि उसके मस्तिष्क के स्तर के लोगों का मिलन जल्दी नहीं हो पाता है। रूचिकर बात ये है कि, इस अवस्था पे आकर भी वह वहीं बनना चाहता है जो एक सामान्य मनुष्य समाज में नजर आता है। वस्तुत: लोगों का यह मानना होता है कि इस व्यक्ति को कोई समस्या नहीं हो सकती है जबकि समस्याओं का एक चक्रव्यूह वहां नजर आता है। यह अवस्था जो असामान्य हो जाने की है, बहुत पीड़ादायक हो जाती है। जैसे अकेलापन महसूस करने पर - घबराहट और डर का भाव मस्तिष्क को जकड़ लेता है। शहरों में अकेलेपन को महसूस करना बहुत आम बात है - लोग सुबह से शाम तक दौड़े जा रहे हैं और किसी के पास इतनी फुर्सत नहीं कि वह दो पल शा...