स्वयं में समाधान की तलाश।

हम स्वयं के सबसे बड़े शत्रु है। वे हम ही हैं जो अपने आंखों को दोनों हाथों से ढक लेते हैं और फिर चिल्लाते हैं कि कितना अंधेरा है। हम बाहरी दुनिया के उन ऊहापोहों में मग्न रहते हैं जिनसे वास्तविक रूप में कोई विशेष फल की प्राप्ति नहीं होती है। जो युद्ध स्वयं के विरूद्ध होती है; वह अपने आप में बहुत ज्यादा भयानक और तनाव पैदा करने वाला होता है। स्वयं से युद्ध लड़ने की प्रक्रिया में, स्वयं के भीतर झांकना पड़ता है - अपने भीतर हो रहीं उठा-पटक पर गौर करना होता है। जिंदगी के सभी दुखों और परेशानियों का हल, बाहर नहीं भीतर हैं। इनका अन्त किसी व्यक्ति के द्वारा, वस्तुओं की प्राप्ति अथवा नये नये जगहों पर जाने से बिल्कुल नहीं होगा। इसका हल बहुत आसान है, केवल अकेले में स्वयं के साथ बैठना है और अपनी आत्मा से बातें करनी हैं। लेकिन हम स्वयं से भागते है और उन कृत्यों को करते हैं जिन्हें करने की आत्मा तनिक भी गवाही नहीं देती है और कभी इन विषयों पर हमारा आत्मा से साक्षात्कार ना हों - हम दूर भागते हैं। लेकिन यह भागना और उन विषयों पर बैठकर कुछ पल चर्चा ना करने की प्रक्रिया - बस कुछ ही समय के लिए है। एक दिन, अंतर्विरोध का स्तर अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचता है जो दुर्निवार होता है तो अंतरात्मा हमें हराकर हमारे सीने पर तांडव करती नजर आती है।

संसार में सबकुछ अस्थाई है, अर्थात हमारे सुख और दुख कुछ ही पल के लिए होते हैं। जीवन में प्रत्येक स्थिति, मन पसंद व्यक्तियों और वस्तुओं का साथ, प्रकृति में उपस्थित प्रत्येक सजीवों और निर्जीवों का साथ कुछ ही पल का होता है। और जब हम इन पलों में होते हैं तो इनके साथ एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव और आसक्ति भाव पैदा हो जाता है। हम इन पलों में जी रहे होते हैं, और इस भ्रम में पड़ जाते हैं कि यह हमेशा हमारे पास रहे; हमारा ऐसा सोचना हमारे अज्ञानता का प्रतीक है। कुछ विचारक कहते हैं कि, संसार में रहते हुए और संसार के सुखों को भोगते हुए सांसारिक मत हो जाइए–बल्कि किसी भी व्यक्ति या वस्तु से जुड़ने से पहले मस्तिष्क में यह बात हमेशा चलनी चाहिए की यह स्थिति कुछ ही समय के लिए होने वाली है; ऐसा करके हम खुद को दुख के भयानक गर्त में जाने से रोक पाएंगे। किसी भी व्यक्ति या वस्तु से अधिक लगाव अनिवार्य उम्मीदों को जन्म देता है, और जब उम्मीदें पूरी नही होतीं तब दुखों की एक नई श्रृंखला हमारे सामने प्रकट हो जाती है। ये दुख शारीरिक कम, मानसिक ज्यादा होते है–जिसमे हेडेक,एनझांइटी, माइग्रेन और अन्य मानसिक बीमारियां मस्तिष्क को जकड़ लेती है। प्रश्न यह उठता है की क्या हम उम्मीदें रखना/करना छोड़ देनी चाहिए? नही, यहां ऐसा बिल्कुल करने को नही कहा जा रहा है बल्कि उम्मीदें रखते हुए–उम्मीदें पूरी होने और ना पूरी होने,  दोनों का एकसमान भाव दिमाग में रखना चाहिए। तथा स्वयं को दोनों स्थितियों के लिए तैयार रखना चाहिए; ऐसा करके हम स्वयं को उन भनायक दुखो से बचा पाएंगे जो जीवन को अधिक पथरीली और कांटो का एक बिस्तर बना देती है; ऐसा लगता है जैसे जीवन ठहर–सा गया है। 

अरस्तू का कथन है की–मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। जिसका अर्थ यह है की मनुष्य का अस्तित्व तभी है जब वह समाज के प्रत्येक व्यक्ति से जुड़ कर रहता है। क्योंकि उसकी जरूरतें और मांग यही से पूरी होती है। समाज से कट कर मानव, मनुष्य नहीं रह जाता–वह फिर से आदिम अवस्था की तरफ लौटने लगता है। मनुष्य की जरुरतों को विशेषतः पाँच भागो में बांंटा जा सकता है जिसमे क्रमशः शारीरिक आवश्यकता (भोजन,वस्त्र,आवास,नींद,प्यास), सुरक्षा आवश्यकताएं (संपत्ति,परिवार,स्वास्थ), प्रेम और संबंधों की आवश्यकताएं (मित्रता,परिवार,सेक्स), स्वाभिमान की आवश्यकता(विश्वास,सम्मान,अलग बनना), स्वआत्मीकरण(नैतिक आदर्श) की आवश्यकता होती हैं –अब्राहम मैशलो। मनुष्य की जैसे ही शारीरिक आवश्यकताएं पूरी होती है वह तुरंत दूसरी आवश्यकताओं को पाने के लिए दौड़ता है इसमें से कुछ पूरी होती है कुछ नहीं - जिसके कारण निराशा, हताशा व तनाव का एक दौर शुरु हो जाता है क्योंकि आवश्यकताओं का पूरा हो जाना भी नई इच्छाओं को जन्म देता है हम क्या करें और क्या न करें–इस पर निर्भर होना चाहिए की उनको करने से हमारी शारीरिक और मानसिक उन्नति हो रही हैं अथवा नहीं।

स्वयं के साथ कुछ पल बैठने से, अपने भीतर उठ रही भावनाओं के ज्वर को मुक्त भाव से समझने का प्रयास किया जा सकता है। अपने इच्छाओं को पूरा करने के लिए किसी भी दूसरे मनुष्य पर दबाव नही डालनी चाहिए, अधिपत्य नही करनी चाहिए–उसे स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए। प्रेम का वास्तविक अर्थ–निःस्वार्थ भाव से 'देना' होना चाहिए। बाकी सब ईश्वर के हाथ में है।

अरविंद कुमार 

Comments

Popular posts from this blog

आत्म जागरूकता का तार्किक पक्ष।

आत्मा से सत्य की ओर ।

बड़े होने का अर्थ।