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स्वीकारोक्ति की साहस।

कला का पहला क्षण है जीवन का उत्कट तीव्र अनुभव-क्षण। दूसरा क्षण है इस अनुभव का अपने कसकते दुखते हुए मूलों से पृथक हो जाना और एक ऐसी फैंटेसी का रूप धारण कर लेना, मानो वह फैंटेसी अपनी आँखों के सामने ही खड़ी हो। तीसरा और अंतिम क्षण है, इस फैंटेसी के शब्दबद्ध होने की प्रक्रिया का आरंभ और उस प्रक्रिया की परिपूर्णावस्था तक की गतिमानता।  हम स्वयं के सबसे बड़े शत्रु हैं, वे हम ही हैं जो अपने आंखों को ढककर, चिल्लाते हैं कि - आह!‌ कितना अंधेरा है।‌ हम अंधेरा भी प्रकाश से समाप्त करना चाहता हैं जबकि अंधेरा स्वयं में मौलिक है, उसकी स्वयं की अपनी सकारात्मकता और नकारात्मकता है। मनुष्य को चाहिए कि वह अपने भीतर व्याप्त कमियों को स्वीकार करें जैसे उसने अच्छाईयों को स्वीकार कर लिया है। स्वीकार करते ही हम द्वंद्व करने से बचते हैं और बदलाव की शुरुआत - स्वीकारोक्ति की साहस से आती है। निंदा और आलोचना वे कड़वी दवाएं हैं, जो मनुष्य के भीतर से उन काले धब्बों को समाप्त कर सकती है जिनपर सामान्यतः उसका ध्यान नहीं जाता है।‌हमारा मन इन्द्रियों के माध्यम से बाहरी दुनिया के सुखों का उपभोग करना जानता है। संसार का समस...