स्वीकारोक्ति की साहस।

कला का पहला क्षण है जीवन का उत्कट तीव्र अनुभव-क्षण। दूसरा क्षण है इस अनुभव का अपने कसकते दुखते हुए मूलों से पृथक हो जाना और एक ऐसी फैंटेसी का रूप धारण कर लेना, मानो वह फैंटेसी अपनी आँखों के सामने ही खड़ी हो। तीसरा और अंतिम क्षण है, इस फैंटेसी के शब्दबद्ध होने की प्रक्रिया का आरंभ और उस प्रक्रिया की परिपूर्णावस्था तक की गतिमानता। 

हम स्वयं के सबसे बड़े शत्रु हैं, वे हम ही हैं जो अपने आंखों को ढककर, चिल्लाते हैं कि - आह!‌ कितना अंधेरा है।‌ हम अंधेरा भी प्रकाश से समाप्त करना चाहता हैं जबकि अंधेरा स्वयं में मौलिक है, उसकी स्वयं की अपनी सकारात्मकता और नकारात्मकता है। मनुष्य को चाहिए कि वह अपने भीतर व्याप्त कमियों को स्वीकार करें जैसे उसने अच्छाईयों को स्वीकार कर लिया है। स्वीकार करते ही हम द्वंद्व करने से बचते हैं और बदलाव की शुरुआत - स्वीकारोक्ति की साहस से आती है। निंदा और आलोचना वे कड़वी दवाएं हैं, जो मनुष्य के भीतर से उन काले धब्बों को समाप्त कर सकती है जिनपर सामान्यतः उसका ध्यान नहीं जाता है।‌हमारा मन इन्द्रियों के माध्यम से बाहरी दुनिया के सुखों का उपभोग करना जानता है। संसार का समस्त सुख यह जान लेने में है कि सुख स्थायी रूप से कहीं विद्यमान नहीं है। कुछ क्षण के लिए, सुख आती हुई प्रतीत होती है; सुख और प्रसन्नता मनुष्य के मन की स्थितियां हैं जो कुछ नये परिवर्तन को अंगीकार कर तीव्रता से ऊर्ध्वाधर ग्राफ ऊपर ले जाती है और फिर क्षैतिज पर ही हिचकोले खाती रहती है। हम किसी भी प्रकार के सुख की चाह, दरअसल एक अजनबी गली में जाने के समान है, जिस गली में कुछ भी नहीं है लेकिन भले ही यदि हमें गली में जाने से पहले पता हो कि गली में कुछ नहीं है लेकिन हम गली में जाकर एक अनुभव प्राप्त करके ही संतुष्ट होते हैं कि गली में कुछ नहीं था लेकिन यात्रा यहीं समाप्त नहीं होती है- यह चक्रीय रूप धारण कर अनवरत पहेली हम सुलझाते रहते हैं, शुरूआत में ही परिणाम जानकर भी। 

मन की यह भी एक शक्ति है कि ज़रा से भी साम्य के सहारे वह सहज ही सम्पूर्ण लयकारी सम्बन्ध जोड़ लेता है। जीवन दुख है और दुख का कारण हमारी इच्छाएं हैं - जो नूतन रूप धारण कर हमें विषयों की तरफ अनुसरण कराती हैं। हमारा मन उन विषयों पर ध्यान नहीं देता है जो हमारे पास है बल्कि उनपर ध्यान देता है जो हमारे पास नहीं है। हो जाने का अर्थ- मिट्टी है और ना होने का अर्थ - सोना है। मन को किसी एक सुख से गुजार दीजिए, वह उसका अभ्यस्त हो जाता है और अनासक्ति भाव से भरकर दूसरे विषयों में आसक्ति दिखाता है। गरीब गरीब होने में सुखी नहीं है, अमीर अमीर होने में सुखी नहीं है। विवाहित अविवाहित होने में सुख देखता है और अविवाहित विवाहित होने में। मस्तिष्क में हमेशा एक खालीपन, एक अधूरापन निर्मित होता रहेगा और हमारा जीवन भर प्रयास इस खालीपन को भरने की होती है जो एक असम्भव टास्क है। जैसे बूढ़ों के लिए अतीत के सुखों और वर्तमान के दुःखों और भविष्य के सर्वनाश से ज्यादा मनोरंजक और कोई प्रसंग नहीं होता। वैवाहिक जीवन के प्रभात में लालसा अपनी गुलाबी मादकता के साथ उदय होती है और हृदय के सारे आकाश को अपने माधुर्य की सुनहरी किरणों से रंजित कर देती है। फिर मध्याहन का प्रखर ताप आता है, क्षण-क्षण पर बगूले उठते हैं, और पृथ्वी काँपने लगती है। लालसा का सुनहरा आवरण हट जाता है और वास्तविकता अपने नग्न रूप में सामने आ खड़ी है। उसके बाद विश्राममय सन्ध्या आती है, शीतल और शान्त, जब हम थके हुए पथिकों की भाँति दिन-भर की यात्रा का वृत्तान्त कहते और सुनते हैं तटस्थ भाव से, मानो हम किसी ऊँचे शिखर पर जा बैठे हैं जहाँ नीचे का जनरूरव हम तक नहीं पहुँचता।

व्यक्ति का अहंकार उसे जैसा वह है वैसा होने की तरफ धकेलता है; वह बदलाव को या परिवर्तन को स्वीकार नहीं होने देता। आलोचनाएं या निंदा की कड़वी ग्रास अहंकार ही अपने गले के नीचे नहीं उतरने देता और विद्रूपताओं को जन्म देता है। हमारा स्वयं को स्वीकार करना, इसी अहंकार को आइना दिखाना होता है और अपनी कमियों पर काम करना अतीत के प्रति नफ़रत से भर देता है। इस तरह अहंकार बाहरी दुनिया से खुद को अलग कर लेता है। यह कहना ज़्यादा सही होगा: मूल रूप से अहंकार में सब कुछ शामिल होता है, बाद में यह बाहरी दुनिया से खुद को अलग कर लेता है। इस प्रकार हम जिस अहंकार-भावना से अब परिचित हैं, वह एक बहुत व्यापक भावना का सिकुड़ा हुआ अवशेष मात्र है - एक ऐसी भावना जिसने ब्रह्मांड को अपने में समाहित कर लिया और बाहरी दुनिया के साथ अहंकार के अविभाज्य संबंध को व्यक्त किया। अज्ञानता दुःखों का कारण है लेकिन अधिक ज्ञान नीरसता पैदा करती है। अज्ञान की भाँति ज्ञान भी सरल, निष्कपट और सुनहले स्वप्न देखनेवाला होता है। मानवता में उसका विश्वास इतना दृढ़, इतना सजीव होता है कि वह इसके विरुद्ध व्यवहार को अमानुषीय समझने लगता है। यह वह भूल जाता है कि भेड़ियों ने भेड़ों की निरीहता का जवाब सदैव पंजे और दाँतों से दिया है। वह अपना एक आदर्श-संसार बनाकर उसको आदर्श मानवता से आबाद करता है और उसी में मग्न रहता है। 

जैसे शरीर के किसी भाग में यदि फोड़ा हो जाय तो हमें उसे अपना मानकर स्वीकार करना होता है और तत्पश्चात उसके इलाज सम्बन्धी हम अलग अलग उपाय करते हैं। विनम्रता व्यक्ति में दूसरे व्यक्तियों को स्वीकार करने की साहस देता है और यह जान लेना चाहिए कि हमारा अस्तित्व शून्य है, हम दो हाथ जोड़कर करोड़ों लोगों के ह्रदय में स्थान बना सकते हैं। मनुष्य और कुछ नहीं बल्कि वही है जो वह स्वयं बनाता है।

अरविंद कुमार।

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