PT 013/P2/2223
सूरज की वे किरणें, जिनमें अत्यधिक ताप था, जो जमीन पर उगे उन हजारों पेड़-पौधों को झुलसा दे रही थीं, उन किरणों का प्रभाव मुझ पर शून्य था। मैंने रात के घने अंधेरे में, उस शांत पत्ते को सुनने का प्रयास किया है जो अपने साथ बहुत सारे रहस्यों को छुपाएं है। मैं आज तक उनके दर्द को समझ नहीं पाया हूं, जैसे कोई अचानक आता है और इस शांत सरोवर के जल में एक बड़ा पत्थर उठाकर छपाक से फेंक देता है और वह एक हलचल पैदा कर देता है, वह पत्ती जो कुछ मेरे साथ सहज महसूस करने लगी थी और अपनी व्यथा सुनाने वाली थीं - पत्थर के इस चोट से मैं भी बौखला जाता हूं। मैंने सागर की लहरों को पढ़ने का असफल प्रयास किया है और मैं जितना कुछ भी जानता जाता, उतना ही ऐसा महसूस होता जैसे मैं बहुत कम जान रहा हूं। आखिर ये लहरें थकती क्यों नहीं है? क्यों सुबह-शाम, दिन-रात, सैकड़ों और करोड़ों वर्षों से ये लगातार, बिना थके उठ रही है, गिर रही हैं और सागर की गर्त में समा जा रहीं हैं! क्या इसके लिए केवल सूर्य और चंद्रमा की आकर्षण शक्तियां ही जिम्मेदार है? ऐसा तो नहीं लगता! जो युद्ध स्वयं के खिलाफ होती है, वह सबसे भयानक और विध्वंसक होती है...