जीवन का ऊहापोह
हम सपने देखते हैं, आह कितना मनोहर और आह्लादित दृश्य होता है और आंख खुलते ही, हमारा भ्रम टूट जाता है कि यह एक स्वप्न था। और उस सपने में जो कुछ भी हम खुबसूरत और भयानक चीजें देखते हैं - अगले ही पल वह समाप्त हो जाता है और उनके समाप्त होने का हमें कोई दुख नहीं होता है। संसार एक भ्रम है, एक ऐसा भ्रम जो हमें सत्य प्रतीत होता हुआ नजर आता है। लेकिन ऐसा नहीं है, प्रकाश की किरणें किसी वस्तु पर आपतित होकर हमारी आंखों तक परावर्तित होती है और तब कोई वस्तु हमें नजर आती है। अंधेरे में आपका वहीं कमरा आपको अच्छा नहीं लगता है और प्रकाश में खुबसूरत और बेहतर। यह है - अच्छे और बूरे का संगमरूपी परिदृश्य और उसमें समाया वह भ्रम जो हमें नजर नहीं आता है। क्या इस बात की सम्भावना नजर नहीं आती है कि यह सम्पूर्ण जीवन ही हमारे लिए सपना हो, एक लम्बा सपना हो जो हम कहीं सोकर देख रहे हो और जब दशकों बाद हमारी आंखें खुले तो हम एक अलग संसार में, अपनी आंखें खोलें। पूरा जीवन हम उन तितलियों को पकड़ने के लिए दौड़ लगाते हैं जो हम कभी नहीं पकड़ पाते हैं। इस भ्रम को गाढ़ा करने में भावनाएं एक अहम हिस्सा निभाती है - जो जीवन को इतना ...