विचारों की श्रृंखला में हम।

हमारा सम्पूर्ण जीवन विचारों से संचालित होता है और जैसा आप सोचते हैं वैसे ही बन जाते हैं और आपका सोचना ही विचारों को पैदा करता है। किसी भी प्रकार के विचार आप पर थोपे नहीं जा सकते हैं अथवा बलपूर्वक आपपर आरोपित नहीं किया जा सकता है। आपका संज्ञान उसे सोच समझकर स्वयं में आत्मार्पित करता है। आपका संज्ञान वह मानक स्तर है जिसका निर्माण लगभग प्रत्येक क्षण होता रहता है और इसी के आधार पर आप अच्छे और बूरे विचारों का चुनाव करते है और उसे स्वयं को प्रभावित करने देते हैं। परन्तु आपके संज्ञान की भी एक सीमा है ; संज्ञान का निर्माण आपके अबतक प्राप्त शिक्षा, संस्कार, सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों तथा सभी प्रकार के आगत और निर्गत सूचनाओं से होता है। तो अगली बार कोई आपसे यह कहता हुआ मिले कि मैं शाकाहारी हूं और सभी लोगों को शाकाहारी हो जाना चाहिए अथवा मैं अपने धर्म को पसंद करता हूं और दूसरे धर्मों को नहीं तो दरअसल वह अपनी सीमा को आपसे बता रहा होता है। उसके संज्ञान की सीमा वहीं हैं, उसके सामाजिक परिवेश में यही सीख उसे दी गई है और उसमें कुछ भी मौलिक विचार नहीं है। कोई भी विचार बूरा नहीं होता है, वह अच्छा और अधिक अच्छा होता है। जैसे ही हमारे पास कोई नया विचार आता है तो दूसरे ही पल जिन विचारों पर हम अबतक चल रहे थे उसे बूरा सिद्ध कर देते हैं जबकि हमें उस विचार की तुलना में एक अच्छा विचार मिल गया है।

इमैनुअल कांट ने लिखा है कि - संसार में ईश्वर/भगवान है, इसे सिद्ध नहीं किया जा सकता है और संसार में ईश्वर नहीं है - इसे भी सिद्ध नहीं किया जा सकता है। और जिस विचार को सिद्ध नहीं किया जा सकता है वह व्यक्तिगत चुनाव का विषय हो जाता है। अर्थात यह आप पर निर्भर करता है; आप चाहें तो ईश्वर को मानकर ईश्वरवादी कहलाएं या ईश्वर को ना मानकर - निरीश्वरवादी कहलाएं। विचारों के इस संसार में कुछ विचार बहुत ही शक्तिशाली नजर आते हैं जिनका खंडन सामूहिक स्तर पर करना बहुत मुश्किल जान पड़ता है लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर इसका खंडन हो सकता है और उस स्थिति को अपनाया जा सकता है जो व्यक्तिगत स्तर पर अधिक सुखदायक और संतोषजनक हो। जिसमें तर्कों का सहारा लेकर उसे तोडा जाता है और संज्ञान सीमा में वृद्धि की जा सकती है। हम क्या करेंगें और हम क्या कर रहे हैं और हमनें क्या किया था - यह विचारों से संचालित होता है। यदि किसी ने आपसे कहा कि प्रतिदिन आंख बंद करके, हाथों को जोड़कर प्रार्थना करो अथवा बहुत सारे सामाजिक नियम आप पर थोपे गये और आपने उन नियमों को वैसे ही स्वीकार कर लिया, बिना उनकी सत्यता जाने या उसपर विचार किये बिना कि इससे क्या लाभ है और क्या वास्तविक रूप में, मैं इसे चाहता हूं?, तो सही मायनों में आपने अपने एक पीढ़ी के नियमों को केवल दोहराया है। आप यहां पर मौलिक या ओरिजनल नहीं है। ध्यान देने वाली बात है कि जिन विचारों को आप अपना रहे हैं उसे भी एक मनुष्य ने ही रचा था और आप भी एक मनुष्य है उससे अधिक अच्छे विचारों की रचना आप स्वयं कर सकते हैं।

सम्पूर्ण संसार विचारों से ही संचालित हो रहा है - फिर चाहे राज्य, पृथ्वी, ब्राहांड की उत्पत्ति का विचार हो; धर्मों, जातियों और समानता असमानता का विचार हो और सभी प्रकार के विषय। इन सब विचारों से यहीं उम्मीद की जाती है कि उनसे मनुष्य जाति का कल्याण हो और उसका जीवन सुखदायक हो। सभी विचारों के केंद्र में मनुष्य होना चाहिए। हम अक्सर इस मुद्दे पर विचार करते हैं कि धर्म के लिए मनुष्य है अथवा मनुष्य के लिए धर्म। धार्मिक ग्रंथों का लेखन किसी मनुष्य ने ही किया होगा जिससे मनुष्य जाति का कल्याण हो और समयानुसार उसमें बदलाव की भी जरूरत होती है। यदि मनुष्य के लिए धर्म है तो वह मनुष्य अपनी सुविधानुसार उसमें परिवर्तन क्यों नहीं कर सकता। धर्मों के बहुत से विचार इतने कट्टर हो गये है कि उनसे हिंसा, नफ़रत, ईर्ष्या जैसे भाव पैदा हो रहे हैं जो मनुष्य को मनुष्य का शत्रु बना रही है और फिर उसी पाषाणकाल में जाना चाहती है जहां प्रत्येक मनुष्य प्रत्येक दूसरे मनुष्य का दुश्मन था। ईसाई में प्रोटेस्टेंट, जैन में श्वेताम्बर, इस्लाम में सिया, हिंदुओं में शैव परिवर्तन के गवाह हैं जो इसका समर्थन करते हैं। प्रत्येक क्षण परिवर्तित हो रहा है जो कोशिकाएं आपके शरीर में कुछ देर पहले थीं, वह अब नहीं है उनका परिवर्तन हो चुका है। और यह कैसे सम्भव है कि संसार में जो बात 100 साल पहले उस पीढ़ी के लिए प्रासंगिक थी, वह आज भी प्रासंगिक हो और काम लायक हो। हां , कुछ बातों का समुच्चय सही होता है लेकिन परिवर्तन अपरिवर्तनीय है। ब्रह्मांड में सबकुछ अस्थाई है और केवल परिवर्तन ही स्थायी है। महात्मा बुद्ध ने कहा है कि" एक ही नदी में आप दुबारा नहीं नहा सकते हैं।" जिसे उसी समय हेराक्लाइटस ने भी दुहराया। अर्थात वह जल जिसमें आपने डुबकी लगाई वह बह चुका है और बदलाव हो चुका है। परिवर्तन ही सृष्टि है, जीवन है। स्थिर होना मृत्यु है, निश्चेष्ट शांति मरण है। प्रकृति क्रियाशील है। 

विचारों की इस श्रृंखला में, कैसे आप तय करेंगे कि कौन सा विचार आपके लिए उचित है अथवा कौन सा अनुचित। सबसे पहले, आपको उन विचारों की सत्यता का पड़ताल करना चाहिए और अंतरात्मा में उसके प्रति सच्चा और समर्पित भाव पैदा करिए। यदि आपको ईश्वर को मानना है, प्रार्थना करना है या नास्तिक होना है, किसी दूसरे धर्म को अपनाना है तो इसके जड़ तक जाकर सत्य का पता लगाइए। सतही और अधूरा ज्ञान दोधारी तलवार के समान है जो प्रत्येक क्षण हमारा गला काट रहा होता है। जब सत्य को जानिए, जांचिए, परखिए तभी उसे स्वीकार कीजिए और आप मनुष्य होने के नाते अद्वितीय है। 

अरविंद कुमार।
( View and opinions are Personal)

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