मन, तू क्यों रोता है !
नजरें उठतीं हैं देखती हैं सबकुछ इक सवाल पूछतीं हैं क्या हुआ तुम्हारे उस वादे का जो एक समय तूमने खुद से किया था - कुछ करने का कुछ बड़ा करने का, जब सब बच्चे खेल रहें थें तब तुम यह सोचकर कि यह अच्छे बच्चे नहीं करतें - तुम लगे रहे अपने किताबों में। निगाहें देखतीं हैं मुझे उन पथराई घासों की - जो कभी नरम थीं, मुलायम थीं और, इक सवाल पूछतीं हैं; तुम्हारे उत्साह को क्या हुआ? तुम क्या बनते जा रहे हो? तुम ऐसे तो ना थे! सच्चाई आंखों को नंगा करती जाती है - और लोग छूटते जातें हैं; पीछे मुड़कर देखूं तो, गोबी मरुस्थल में उड़े रेतीले बालू की आंधी नजर आती है: जो अच्छाई का प्रपंच पढ़ाया गया, वह मिथक था या झूठ; मन आराम नहीं पाता, मन, तू क्यूं बीमार होता है! यह संग्राम नहीं, महासंग्राम हैं। जीवन की व्यथा - इसकी सच्चाईयां हैं सोचता हूं - किससे कहूं? मां की चूड़ी रोती है, पापा का कंधा झुका जाता है इस उम्मीद में की, शायद सबकुछ एक दिन ठीक होगा। यह रातों की थकान दि...