अनवरतें ।
मैं तुम्हें गर्तों में तलाशता हूं और तुम कहीं नहीं हो। तुम्हारा कहीं भी नहीं मिलना; हृदय में अजीब सी प्यास और उमड़न पैदा करती है और यदि तुम मिल भी गईं तो क्या मेरी आत्मा की जो प्रस्फुटन हैं, वे जुड़ पाएंगे जैसे तुम उन्हें जोड़ना चाहती हो। वास्तविकता जानते हुए भी, मैं उन भ्रमों और झूठ के पीछे दौड़ रहा हूं जो मुझे तनिक सा सुख देते हैं और मैं उन्हें सच मान लेता हूं। किसी की उम्मीदों पर खरा उतरने और परोपकार करने के अपने स्वभाव में भ्रमित हूं। ना समझे जाने का दुख और कुछ खो देने के दुख - मुझे कठोर नहीं बनने देते हैं जबकि तुम्हीं ने कहा था कि बड़े सुखों की प्राप्ति के लिए, छोटे सुखों की बलि चढ़ाई जाती है। सफलताएं कठोरता से आती हैं। आज, वह जैसे विलुप्त हो गया है जो मेरी सुपर इगो की गरिमा को बनाकर रखता था। उसके रहने से कुछ शीतलता तो रहती थी; परन्तु आज वह भी मुझे छोड़कर जा रहा है - उष्ण, छिछली और दर्द पैदा करती हुई राहों पर।
उन्हीं रेखाचित्रों को बारम्बार, ज़हन में उतारता हूं। कितना खुरदरापन है, जीवन के इन दोहरावें में। मैं उस अधिक सौंदर्य पैदा करती - रसात्मक स्थल का अन्वेषण करता हूं और पाता हूं कि छिछली जमीन की मुरझाई हुई पत्थर ना ही पीड़ा पैदा करती है और ना ही स्थायी आनन्द पैदा करती है। मेरा स्वयं मेरा सबसे बड़ा दुश्मन है। मैं कभी कभार उसके कंधे पर सिर रख देना चाहता हूं; उसके वक्षों की उष्णता से अपने ह्रदय में उबल रही अशांत तप्त ज्वर को शीतलता दे देना चाहता हूं। उसकी मुस्कान, आंखों की नाराज़गी, अंगड़ाई लेती उसकी बांहे, जुल्फों की करिश्माई खुशबू, ओठों की रक्त जैसे लालिमा, उसका मेरे हाथों की उंगलियों के साथ खेलना - ह्रदय में एकाएक प्रसन्नता की बाढ़ ला दे रही है। मैं बाढ़ आने के बाद की विभत्स और भयानक प्रलय देखकर सहम जाता हूं और गहरी वेदना मस्तिष्क को जकड़ लेती है। एक तरफ आनन्द है और दूसरी तरफ विषाद के पल - जो एक-दूसरे के पूरक हैं। जीवन विरोधों का संगम है - सांझ और सुबह, सुख और दुख, रात और दिन, प्रेम और नफ़रत, पैदा होना और मृत्यु । ये सब साथ साथ चलते हैं। जीवन में कुल मिलाकर कुछ क्षण आते हैं - जब जीवन का सम्पूर्ण आनन्द सिमटकर कुछ सेकंडों में अवतरित हो जाता है।
अचानक से, सबकुछ निरर्थक क्यों जान पड़ता है?
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