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अनवरतें ।

मैं तुम्हें गर्तों में तलाशता हूं और तुम कहीं नहीं हो। तुम्हारा कहीं भी नहीं मिलना; हृदय में अजीब सी प्यास और उमड़न पैदा करती है और यदि तुम मिल भी गईं तो क्या मेरी आत्मा की जो प्रस्फुटन हैं, वे जुड़ पाएंगे जैसे तुम उन्हें जोड़ना चाहती हो। वास्तविकता जानते हुए भी, मैं उन भ्रमों और झूठ के पीछे दौड़ रहा हूं जो मुझे तनिक सा सुख देते हैं और मैं उन्हें सच मान लेता हूं। किसी की उम्मीदों पर खरा उतरने और परोपकार करने के अपने स्वभाव में भ्रमित हूं। ना समझे जाने का दुख और कुछ खो देने के दुख - मुझे कठोर नहीं बनने देते हैं जबकि तुम्हीं ने कहा था कि बड़े सुखों की प्राप्ति के लिए, छोटे सुखों की बलि चढ़ाई जाती है। सफलताएं कठोरता से आती हैं। आज, वह जैसे विलुप्त हो गया है जो मेरी सुपर इगो की गरिमा को बनाकर रखता था। उसके रहने से कुछ शीतलता तो रहती थी; परन्तु आज वह भी मुझे छोड़कर जा रहा है - उष्ण, छिछली और दर्द पैदा करती हुई राहों पर।  उन्हीं रेखाचित्रों को बारम्बार, ज़हन में उतारता हूं। कितना खुरदरापन है, जीवन के इन दोहरावें में। मैं उस अधिक सौंदर्य पैदा करती - रसात्मक स्थल का अन्वेषण करता हूं और पात...