भावनात्मक बुद्धिमता - 1
मनुष्य भावनाओं का दास है। जीवन दो प्रमुख मिश्रणों से चलायमान होता है - आदर्शवादी विसंगतियों और यथार्थवादी संगतियों से। जिस प्रकार से अलंकार शरीर के सौंदर्य में अभिवृद्धि करता है; उसी प्रकार से मनोभाव मस्तिष्क को शीतलता, सौंदर्य और पीड़ा का अहसास कराते हैं। हमारे निर्णय इनसे प्रभावित होते हैं। मनोभाव या भावनाएं मनुष्य की चित्तवृत्तियों में प्रवेश कर सुख और दुख का आभास कराती हैं, जो क्रमशः सकारात्मक और नकारात्मक चित्तवृत्तियों के उद्वेलित होने से होता है। ईर्ष्या, घृणा, नफ़रत, द्वेष, क्रोध, लालच, मोह, लोभ इत्यादि नकारात्मक मनोभावों को तथा प्रेम, करूणा, दया, ममता, करूणा, परोपकार इत्यादि सकारात्मक मनोभाव हैं। मस्तिष्क एक जटिल अवस्था है - ज्यादातर मनुष्य इसके पृष्ठ पर ही हिचकोले खाते रहते हैं। भावनाओं का 360 डिग्री अवलोकन आवश्यक है जिसमें बुद्धिमत्ता का प्रयोग करके इसको समझा जा सकता है। आइए, इस जटिलता को सरलता में परिवर्तित करें ।
जीवन में एक समय पर एक ही विकल्प पर जाया जा सकता है। संकल्प की स्वतंत्रता - हमें बताती है कि मनुष्य अपने कार्यों के लिए स्वयं जिम्मेदार है तथा सम्पूर्ण नैतिक व्यवस्था इसी पर आधारित है। हमारे सामने प्रतिदिन विकल्प उपलब्ध होते हैं और उनमें से कोई एक हम स्वतंत्रतापूर्वक चुनते हैं तथा उसके गुण और दोषों के लिए स्वयं जिम्मेदार पाते हैं। दूसरा विकल्प कितना ही आकर्षक हो- मन में उसके छूटने का डर पैदा हो जाता है। आखिर, मनुष्य भयभीत क्यों होता है? मृत्यु जीवन का वास्तविक सत्य है तो मनुष्य इसे स्वीकार कर भयमुक्त क्यों नहीं हो जाता? वह परिवार, समाज, धर्म, राज्य आदि के नियमों और कानूनों से भयभीत क्यों होता है? मनुष्य का भय से भर जाना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि समाज की व्यवस्था को बनाए रखने तथा उसे स्वयं नैतिक बनाए रखने के लिए उसके भीतर डर का होना आवश्यक है। भय एक भावनात्मक संवेग पैदा करता है जो मनुष्य को मानसिक स्तर पर पीड़ा पहुंचाती है और यह पीड़ा उसे खतरनाक स्थितियों से बचा लेती है। भावनाएं एक तरफ जहां जीवन को खुबसूरत रंग देती हैं, रोमांचक अहसास पैदा करती हैं तथा संसार को देखने का एक नजरिया पैदा करती हैं दूसरी तरफ यही भावनाएं जब मस्तिष्क को जकड़ती हैं तो यह समझनें में हम असफल रहते हैं कि वह एक विशेष प्रकार की भावना क्यों आईं है?, कैसे आई है? और किस प्रकार से हमें सकारात्मक और नकारात्मक रूप में प्रभावित कर सकती है। इन सभी सवालों पर विचार करके हम मस्तिष्क की इस जटिल अवस्था को समझ सकते हैं। खुबसूरत गुलाब हमें अपनी ओर आकर्षित करता है और तत्काल परिस्थिति में हम उसके सौन्दर्य को देखकर उसकी तरफ चल दें तो कांटों का एक समूह हमारे हाथों से रक्तस्राव करने में सक्षम हो जाएगा। आकर्षित होते समय इस प्रश्न पर विचार कर लेना कि उस खुबसूरती में कांटे भी लगे है तो सुख और दुख की तीव्रता में कमी आती है - यही बुद्धिमत्ता है।
जब प्रेम हमारे मस्तिष्क को जकड़ता है और नथूनों में गुलाबी मादकता पैदा कर देता है तथा ह्रदय में अनन्त आकांक्षाओं को जगा देता है तो इसके कुछ ही दिन बाद दुखों का एक सम्मुचय अपने परिष्कृत और सारगर्भित रूप में मस्तिष्क में नकारात्मक मनोभावों को पैदा करती है; इनको समझना तथा प्रबंधन करना भावनात्मक बुद्धिमता के तहत आता है। मनुष्य अपने सम्पूर्ण जीवन में 50-60 प्रकार के अलग अलग-अलग अनुभूतियों का अहसास करता है जिसमें उत्प्रेरक के रूप में कोई घटना या व्यक्ति होता है। उदाहरण के लिए - किसी भूखे गरीब और लाचार व्यक्ति को देखकर हम दया से भर जाते हैं लेकिन इस पर यह सोचना कि जो दृश्य मैं देख रहा हूं क्या सच में वह वास्तविक है। दया एक स्थायी भाव है जो परिस्थितियों के अनुसार हम पर असर छोड़ती है। बुद्धिमत्ता का सम्बन्ध हमारे ज्ञान और कौशल को व्यवहार में लागू करने से है। सोरेन कीर्केगार्द प्रमुख अस्तित्ववादी विचारक हुआ; उनका कहना था कि मनुष्य की पहचान उसकी भावनाओं से होनी चाहिए ना कि बुद्धि से। बुद्धि एक सैद्धांतिक पक्ष है जो किसी भावनात्मक तीव्रता को अधिक शक्तिशाली रूप में नियंत्रित नहीं कर पाती है। ज्ञान के भंडारण से सभी जानकारियां इकट्ठा कर लेने के बाद भी उसकी तीव्रता से बिना प्रभावित हुए नहीं रहा जा सकता है। सिग्मंड फ्रायड, कार्ल जुंग और एडलर ने मनोविश्लेषणवाद पर कार्य किया जो मस्तिष्क की अधिक गहराई पर समझने का कार्य करती है लेकिन यह मनोवैज्ञानिक भी उसी तरह से प्रभावित होते हैं जैसे कि एक सामान्य मनुष्य परंतु उसकी तीव्रता में अंतर होता है। 1985 में, वेन पेन ने भावनात्मक बुद्धिमता शब्द का प्रयोग किया लेकिन इसके पहले ही हावर्ड गार्डनर ने भावनात्मक बुद्धिमता को अंतर्वैयक्तिक और अंत: वैयक्तिक में विभाजित किया। जब व्यक्ति दूसरों के इरादें, मनःस्थिति, अनुभूतियों, स्वभाव, इच्छाओं और प्रेरणाओं को समझने का प्रयास करता है तो यह अंतर्वैयक्तिक बुद्धिमता है और इसके विपरीत जब वह स्वयं के इच्छाओं, क्षमताओं, इरादें, मन की स्थिति और प्रेरणाओं को समझने का प्रयास करता है तो यह अंत: वैयक्तिक बुद्धिमता है।
जब एक मनोभाव या भावना मस्तिष्क में उभरती है तो वह मन को कुछ समय के लिए एक विशेष प्रकार की स्थिति में रख देती है जिससे मन सुख और दुख का अहसास करता है। उदाहरण के लिए- किसी व्यक्ति या वस्तु से नफ़रत होने पर हम उससे दूर भागते हैं, मन उसके प्रति घृणा से भर जाता है और उसके बारे में विचार भी नहीं करना चाहता है। इसके विपरीत, विनम्रता वस्तु या व्यक्ति के प्रति मन में सम्मान का भाव पैदा करती है जिससे अनुग्रह और कृतज्ञता जन्मता है। जीवन उनके लिए एक कामेडी है जो सोचने और विचारने का कार्य करते हैं तथा उनके लिए एक त्रासदी है जो जीवन को महसूस करते हैं। एक ही व्यक्ति दोनों मार्गों से गुजर सकता है। क्रोध में पड़कर मनुष्य के शरीर में अजीब किस्म का रासायनिक परिवर्तन होता है और सब कुछ नाश कर देने की इच्छा होती है तथा सामने जो कुछ भी दिखता है लोग उसपर क्रोध का प्रयोग करते नजर आते हैं जो कभी कभी अधिक नकारात्मक और घातक हो जाता है; यही त्रासदी है। जो व्यक्ति यह विचार करता है कि क्रोध एक नकारात्मक मनोभाव है और हमेशा ही दुखों का संचार करता है तो ऐसा व्यक्ति क्रोध की अवस्था में शांत बैठता है और कोई प्रतिक्रिया देने से बचता है - क्रोध को इस रुप में देखना कामेडी है। भावनात्मक बुद्धिमता के अनुप्रयोग के लिए तथा इसे जीवन में उतारने के लिए दो माडल - सेलोवी और मेयर माडल, 1990 तथा डैनियल गोलमैन माडल, 1995 विश्वप्रसिद्ध हुए। जिन्हें एक एक करके हम समझेंगे।
1. सेलोवी और मेयर माडल, 1990
1990 में आया यह माडल व्यक्ति को अपनी भावनाओं को पहचानने और उनमें अन्तर करने की सीख देता है। जिसमें चार चरण है। (1.) पहले चरण में, स्वयं तथा दूसरों के भावनाओं को देखने और अवलोकन करने का प्रयास करना है। इसमें व्यक्ति दूसरे के शारीरिक अभिव्यक्ति, ध्वनियों, आवाज और प्रतिक्रिया को देखकर यह अनुमान लगाता है कि इसकी मन: स्थिति कैसी है? जैसे यदि कोई शारीरिक या मानसिक बीमारी है तो चेहरे के अभिव्यक्ति से समझ जाना चाहिए कि सामने वाला व्यक्ति अच्छी स्थिति में नहीं है। इस योग्यता का प्रयोग तब करना ज्यादा कारगर होता है जब सामने वाला व्यक्ति अपने हाव-भाव छिपा रहा हो। जैसे किसी हंसते हुए व्यक्ति को देखकर यह अनुमान लगाना कि यह व्यक्ति अन्दर से खुश नहीं है। इस क्षमता का प्रयोग केवल दूसरों के बारे में ही नहीं स्वयं के बारे में भी है। अपनी मनःस्थिति, भावना, अभिव्यक्ति को समझना भी आवश्यक है ताकि अंदर से स्वयं आप कैसा महसूस कर रहे हैं। और स्वयं को उसी अनुसार सम्हाल सकते हैं। इसका निजी तथा सार्वजनिक - प्रशासनिक जीवन में प्रयोग किया जाता है। (2.) पहले चरण की तुलना में यह दूसरा चरण अत्यधिक परिपक्वता की मांग करता है। यह चरण है- भावनाओं को चिंतन से जोड़कर देखने की योग्यता। कोई भावना जब मस्तिष्क में आती है तो उसके पीछे एक कारण होता है और कारण को समझना आवश्यक होता है। आमतौर पर, हम किसी व्यक्ति के भावनात्मक प्रतिक्रिया को देखकर हम भी तत्काल प्रतिक्रिया कर देते हैं लेकिन यही ठहरकर, उस व्यक्ति के प्रतिक्रिया के पीछे के कारण को समझना है ताकि अच्छे से संचार हो सकें। उदाहरण के लिए - यदि आपका मित्र आपसे नाराज़ है तो अब आपके पास दो विकल्प हैं। पहला, आप तत्काल रूप से भावनात्मक प्रतिक्रिया दे दें और चिल्लाना, झुंझलाना करें जिससे सम्बन्ध बिगड़ते हैं और दूसरा, आप समझने का प्रयास करें कि यह क्यों नाराज़ है? क्या मेरी किन्हीं बातों से इसे दुख पहुंचा है? उसका ऐसा विश्लेषण करें।
(3.) तीसरे चरण में, भावनाओं को सूक्ष्मता के स्तर पर पहचाना जाता है। व्यक्ति जैसे जैसे बड़ा होता है उसमें विभिन्न भावनाओं का संयोजन विकसित होने लगता है। प्रतिक्रिया देने से पहले हमें अत्यधिक विचार करना होता है। उदाहरण के लिए- यदि दो व्यक्ति किसी पर क्रोधित हो रहे हैं तो हो सकता हो कि एक व्यक्ति के क्रोध में क्रोध और घृणा का संयोजन हो तथा दूसरे व्यक्ति में क्रोध और चिंता का संयोजन हो। क्रोध के पीछे के कारण को जानना आवश्यक होता है, फिर कोई प्रतिक्रिया देनी चाहिए। मां के क्रोध में चिंता और करूणा हो सकता है जबकि शत्रु के क्रोध में घृणा। (4.) चौथा चरण भावनाओं का प्रबन्धन है जो कि सबसे जटिल अवस्था है। यह दो प्रकार से होता है - 1. भावनाओं को अभिव्यक्त करने से पहले ही प्रबन्धित करना और 2. भावनाओं की अभिव्यक्ति को प्रबन्धित करना। पहले में, व्यक्ति को भावनाओं का मूल्यांकन करना चाहिए और उसकी तीव्रता यदि अनुचित और हानिकारक है तो अभिव्यक्ति के बिंदु तक पहुंचने से पहले ही रोक देना। जैसे- किसी मित्र पर तीव्र क्रोध आने पर यह समझ जाना कि उसके सम्पूर्ण योगदान को देखकर यह क्रोध ठीक नहीं है और इसे अभिव्यक्त होने से रोक देना। और दूसरा, भावनाओं को अभिव्यक्त होते समय प्रबन्धित करना। जैसे- यदि कोई पुत्र अपने पिता पर क्रोधित है और पीढ़ी संघर्ष के मूल्यों से परेशान है तो भी उसे अपने क्रोध को प्रकट करते समय उसमें विनम्रता और विवेक का सामंजस्य होना चाहिए ताकि उस व्यक्ति के आत्मसम्मान को ठेस ना पहुंचे। ऐसा संचार के लिए पत्र का प्रयोग करना चाहिए। रिश्ता या दोस्ती समाप्त होने पर सम्मान की भावना को बनाए रखना आवश्यक होता है।
[ दूसरे भाग में- हम दूसरा डैनियल गोलमैन माडल और इसका निजी तथा सार्वजनिक जीवन में अनुप्रयोगों को समझेंगे। कमेंट बाक्स में अपने तर्क वितर्क करें ]
✍️ अरविंद कुमार।
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