अपूर्णता में आनन्द ।
जीवन जीने के सम्पूर्ण प्रक्रिया में, हमें जो सिखाया जाता रहा है - उसमें असत्य और नाममात्र की सच्चाई प्रतिबिम्बित होती दिखाई देती है। सोशल मीडिया एक भ्रम पैदा करता है और सिक्के का एक पहलू हमारे सामने प्रस्तुत करता है - जहां हंसते हुए चेहरे और भौतिकता ही सबकुछ है, ऐसा प्रतीत होता है। जीवन में कुछ भी पूर्ण नहीं है, केवल प्रसन्नता ही प्रसन्नता और केवल सुख ही सुख हासिल नहीं किया जा सकता है। किसी भी वृक्ष में एक जड़ होता है, जो भूमि की गहराइयों में समाकर एक अस्तित्व का निर्माण करता है, वह जड़ अति कीचड़ भरी, धूल-मिट्टी जैसे इलाकों में अपना नाम दर्ज कराता है जबकि वहीं इसकी शाखाओं पर लगे खुबसूरत फूल और फल - सौंदर्य की अद्भुत कलाकृति प्रदर्शित करते हैं परन्तु जड़ के बिना इनका अस्तित्व शून्य है। केवल फूल और फल के सौन्दर्य को देखकर इसे ही सत्य मान लेना; यह बहुत बड़ी नादानी और स्वयं के पैरों पर खुद कुल्हाड़ी चला लेने के समान होगा।
संसार में सत्य और असत्य, पाप और पुण्य, अच्छा और बूरा, खुबसूरत और बदसूरत, नैतिक और अनैतिक - इसकी कोई सामान्य परिभाषा नहीं है; यह आपकी व्यक्तिगत दृष्टिकोण और नजरिए पर निर्भर करता है। कुछ समाजों ने इनका सामान्यीकरण किया है और यह तभी सम्भव हो पाया जब उस समाज में रह रहे लोगों ने इसकी स्वीकृति दे दी तथा आने वाली पीढ़ियां इसे आंख बंद करके स्वीकार करती जाती हैं। क्योंकि सोचना बहुत ही दुष्कर कार्य है और समाज का एक समूह सोचने से बचता है, वह बनी बनाई व्यवस्थाएं चाहता है जिस पर वह चल सकें लेकिन सभी व्यवस्थाएं मनुष्यों द्वारा बनाई गई हैं और समय के साथ उनमें अनुपयोगिताएं आ सकती हैं। व्यवहारवादी व्यवस्था सिद्धांत के जनक डेविड ईस्टन ने राज्य को समाज का एक अंग मात्र माना और समाज से ही राज्य पैदा हुआ है - ऐसा उनका कहना था। परंतु राज्य ने अपनी उन्नति के क्रम में स्वयं सबसे ज्यादा शक्तिशाली बना लिया और आज समाज के ऊपर चढ़कर बैठ गया है; इसने धर्म और चर्च की सत्ता को भी ललकारा है तथा विजय प्राप्त की। समाज के लोग भले ही गृहयुद्ध कर दें लेकिन राज्य की सत्ता हमेशा बरकरार रहेगी। समाज में रीति रिवाज, परमपराएं, संस्कार तभी तक जीवित हैं जबतक समाज के लोग उसे स्वीकार किए हुए हैं और यदि कोई अकेला इसे तोड़ना चाहे तो समाज का भय उसे ऐसा करने नहीं देगा। उदाहरण के लिए- यदि कोई व्यक्ति ऐसा मानता है कि प्रत्येक मनुष्य मनुष्य है और जाति, धर्म, नृजातीय, लिंग, रंग सब मनुष्यों द्वारा बनाया गया पुरातन निरर्थक परमपराएं हैं तो उसका यह मानना निश्चय ही आधुनिक और नैतिक होने का प्रमाण हो सकता है लेकिन पूरा समाज उस विचार के साथ समन्वय स्थापित नहीं कर सकेगा और वह व्यक्ति यदि अन्तरधार्मिक या अन्तरजातीय विवाह करना चाहें तो यही समाज उसके लिए सबसे बड़ा भय होगा।
जैसे पाप कुछ भी नहीं है, वह केवल मनुष्य के दृष्टिकोण की विषमता का दूसरा नाम है। प्रत्येक व्यक्ति एक विशेष प्रकार की मन:प्रवृत्ति लेकर उत्पन्न होता है–प्रत्येक व्यक्ति इस संसार के रंगमंच पर एक अभिनय करने आता है। अपनी मन:प्रवृत्ति से प्रेरित होकर अपने पाठ को वह दुहराता है–यही मनुष्य का जीवन है। जो कुछ मनुष्य करता है, वह उसके स्वभाव के अनुकूल होता है और स्वभाव प्राकृतिक है। मनुष्य अपना स्वामी नहीं है, वह परिस्थितियों का दास है–विवश है। कर्त्ता नहीं है, वह केवल साधन है। फिर पुण्य और पाप कैसा? “मनुष्य में ममत्व प्रधान है। प्रत्येक मनुष्य सुख चाहता है। केवल व्यक्तियों के सुख के केन्द्र भिन्न होते हैं। कुछ सुख को धन में देखते हैं, कुछ सुख को मदिरा में देखते हैं, कुछ सुख को व्यभिचार में देखते हैं, कुछ त्याग में देखते हैं–पर सुख प्रत्येक व्यक्ति चाहता है; कोई भी व्यक्ति संसार में अपनी इच्छानुसार वह काम न करेगा, जिसमें दुख मिले–यही मनुष्य की मन:प्रवृत्ति है और उसके दृष्टिकोण की विषमता है। “संसार में इसीलिए पाप की परिभाषा नहीं हो सकी–और न हो सकती है। हम न पाप करते हैं और न पुण्य करते हैं, हम केवल वह करते हैं, जो हमें करना पड़ता है। पूर्णता एक मिथक है और मनुष्य का जीवन अपूर्णता का द्योतक है। कोई भी आकर्षण इसलिए आकर्षण है क्योंकि आप उससे अनभिज्ञ हैं और एक दूरी है; कोई पद, व्यक्ति या वस्तु इसलिए आकर्षित कर रही होती है क्योंकि आप उससे अनजान हैं। धन में सुख अमीरों को नहीं है, यह निर्धनों को महसूस होता है और उससे सुख वहीं ले सकते हैं। जैसे - भगवती चरण वर्मा ने लिखा है कि प्रकृति अपूर्ण है। प्रकृति के अपूर्ण होने के कारण ही मनुष्य ने कृत्रिमता की शरण ली है। दूर्वादल कोमल है, सुन्दर है, पर उसमें नमी है, उसमें कीड़-मकोड़े मिलेंगे। इसीलिए मनुष्य ने मखमल के गद्दे बनवाए हैं जिनमें न नमी है, और न कीड़े-मकोड़े हैं, साथ ही जो दूर्वादल से कहीं अधिक कोमल हैं। जाड़े के दिनों में प्रकृति के इन सुन्दर स्थानों की कुरूपता देखो, जहाँ कुहरा छाया रहता है, जब इतनी शीतल वायु चलती है कि शरीर काँपने लगता है। गरमी के दिनों में दोपहर के समय इतनी कड़ी लू चलती है कि शरीर झुलस जाता है। प्रकृति की इन असुविधाओं से बचने के लिए ही तो मनुष्य ने भवनों का निर्माण किया है। उन भवनों में मनुष्य उत्तरी हवा को रोककर जाड़ों में अँगीठी से इतना ताप उत्पन्न कर सकता है कि उसे जाड़ा न लगे। उन भवनों में जवासे तथा खस की टट्टियों को लगाकर मनुष्य गरमी में इतनी शीतलता उत्पन्न कर सकता है कि उसे मधुमास का-सा सुख मिले। प्रकृति मनुष्य की सुविधा नहीं देखती, इसलिए वह अपूर्ण है।
दरअसल, किसी भी सजीव अथवा निर्जीव वस्तु का पूर्ण होना; बिल्कुल उसी प्रकार होगा जैसे प्रत्येक व्यक्ति अमृत पीकर अमर हो चुका हो अथवा सभी को स्वर्ग की प्राप्ति हो चुकी हो, स्वर्ग के सुखों से भी एक समय बाद नफ़रत हो जाएगी। ठहरा हुआ जल जल्दी गंदा हो जाता है जबकि चलता हुआ जल स्वयं का रास्ता स्वयं बनाता है। अपूर्णता चलता हुआ जल है- जो हमेशा नयापन बनाए रखता है। जैसे प्रेम जीवन के तीखेपन में मिठास भरता है, स्वयं को यह अहसास दिलाता है कि मैं भी कुछ हूं - मेरे होने में भी सार है। जब प्रेमी अपने प्रिय को अपने प्रेम की सूचना देता है तो वह उसके मन को अपने मन से मिला लेना चाहता है। और प्रेम का इजहार करने के बाद प्रेमी प्रिय के मन में अपने लिए कुछ अच्छे भावों की प्रतिष्ठा कर देना चाहता है। वह यह चाहता है कि जिस प्रकार प्रिय मुझे अच्छा लगता है उसी प्रकार मैं भी उसे अच्छा लगूं। इसलिए जैसे ही कोई नवयुवक का चित्त किसी युवती की ओर आकर्षित होता है तो ऐसे जगहों पर जाते समय जहां उसके दिखने की सम्भावना ज्यादा है, उसका ध्यान कपड़ों की साफ सफाई और शरीर की सजावट की ओर अधिक हो जाता है। जरुरत पड़ने पर मन की कोमलता, सुशीलता, वीरता इत्यादि भी दिखाई देता है। प्रेमी को जिस पल यह पता चलता है कि प्रिय के मन में भी उसके लिए चाह है उसी पल वह प्रेम के आनन्द लोक में मग्न हो जाता हैं। लेकिन यह केवल सिक्के का एक पहलू है। कुछ समय बाद अहंकार सहित तमाम नकारात्मक चित्तवृत्तियां पैदा होती हैं जो प्रेम को नरक के समान अनुभूति कराती है। जीन पाल सार्त्र ने लिखा है कि दूसरा नर्क है क्योंकि प्रत्येक मनुष्य अच्छाईयों और बूराइयों का संगम होता है - किसी से प्रेम या उसके नजदीक जाने की प्रक्रिया में - दोनों पहलूओं को स्वीकार कीजिए। क्योंकि अपूर्णता ही सत्य है।
मनुष्य का कर्तव्य है कमजोरियों पर विजय पाना।
अरविंद कुमार।
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