मनुष्य की मूल चेतना में क्या है ?
जीवन के रंगमंच पर खेल खेलते हुए, हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि जीवन के नियंत्रण की जो अदृश्य डोर है; वह हमारे हाथों से नहीं बल्कि, किसी दूसरे शक्तिशाली हाथों में बंधी है। हम और आप कठपुतलियां हैं - जिसे उस डोर से बांध दिया गया है तथा इन कठपुतलियों का मालिक अपनी इच्छा पर हमारा प्रयोग कर रहा होता है। जिंदगी को जितना ज्यादा आप अनुभव करते जायेंगे, इसके ठोकरों से दो चार करते जायेंगे; उतना ही इस बात का आभास होगा कि हमारे नियंत्रण में कुछ भी नहीं है। हम जो सांसें ले रहे हैं - वह गिन गिन कर प्राप्त हो रही है, जिसका हमें मूल्य चुकाना पड़ता है।
मनुष्य का शरीर एक सीढ़ी के समान है, यह सीढ़ी एक तरफ जहां मनुष्य को ऊपर ले जाती है तो दूसरी तरफ नीचे भी ले जाती है। महात्मा बुद्ध, महावीर स्वामी ने अपने इसी शरीर रुपी सीढ़ी का प्रयोग करके ऊपर की तरफ चलते चले गये। ध्यातव्य है कि नीचे जाने में कोई विशेष प्रयत्न नहीं करना पड़ता है; आप अधिक गति से, आसानी से नीचे की तरफ चलते चले आते हो। शरीर में इंद्रियां जुड़ी हुई है जो इसे विषयों की तरफ आसक्ति भाव से ले जाती है और इसपर यदि ज्ञान का अंकुश ना हो तो बहुत बार यह जानने में हम असफल रहते हैं कि हमारा ऊर्ध्वाधर पलायन हो रहा है अथवा क्षैतिज पर ही हम हिचकोले खा रहे हैं। भगवान श्री कृष्ण ने जिस नैतिक मन को आत्मा कहा तो फ्रेडरिक हीगल ने उसे ही विवेक कहा और सिग्मंड फ्रायड ने सुपर ईगो (पराहम) नाम दिया। मनुष्य की चेतना में विद्यमान सुपर ईगो अथवा आत्मा का एक ही कार्य है कि व्यक्ति को सर्वदा नैतिकता का पाठ पढ़ाते रहना और वह जब भी कुछ ऐसा करें जो उसके संस्कारों व मूल्यों से इतर है तो उस पर ठोस अंतर्विरोध करके उसके अंतरात्मा द्वारा उसे दुख पहुंचाया जाय। इससे इतर इड या मन है जो मनुष्य की चेतना में हजारों प्रकार की इच्छाएं पैदा करती है और उसे निम्न स्तर पर ले जाती है। इन इच्छाओं में इंद्रियों से मिलने वाली क्षणिक सुख होते हैं जो भौतिकवादी सुख, शारीरिक सुख में परिवर्तित होता नजर आता है। मन और आत्मा की खींचातानी से व्यक्ति की चेतना में अंतर्द्वंद्व होता है और विभिन्न प्रकार के मानसिक अवसादों से ग्रस्त हो जाता है। क्योंकि यह दोनों एक दूसरे से ज्यादा शक्तिशाली बनना चाहते हैं और दोनों का जिस बिंदु पर मिलन होता है - वह ईगो के रूप में दिखता है। सामान्य तौर पर, कोई भी इंसान जो हमारे सामने व्यवहार कर रहा होता है; वहीं उसका इगो होता है। जबकि वह क्या व्यवहार करना चाहता है - इसका वास्तविक रूप उसके दिमाग में हो रहा होता है जिसकी अभिव्यक्ति वह कदापि नहीं कर सकता है।
फ्रायड ने मनुष्य की इच्छाओं या वासनाओं को लिबिडो नाम दिया और यह सभी प्रकार के सैक्सुअल और उत्तरजीविता जैसे आवश्यकताओं को पूरा करता है। दो विपरीत लिंगियों का एक दूसरे के नजदीक आना- लिविडो से सम्भव होता है। फ्रायड ने बताया कि मनुष्य की मूल चेतना में सेक्स होता है जिससे प्रेरित होकर, मनुष्य अपने सारे कार्य करता है। इस सेक्स की इच्छा में, आधिपत्य करने, ईर्ष्या करने, परतंत्रता में रखने जैसे मनोभावों का जन्म होता है। दो समलिंगी एक दूसरे से तभी सम्बन्ध बरकरार रख पायेंगे जब वे एक दूसरे की उत्तरजीविता में सहभागी हों और स्वार्थ अधिकता में जुड़ा हो। जैसे - पिता-पुत्र का सम्बन्ध, दो बहनों या दो भाइयों का सम्बन्ध, किसी भी कार्यालय या कम्पनी में समलिंगी कर्मचारियों का सम्बन्ध आदि। इनमें हमेशा एक मानसिक दूरी देखी जाती है। जबकि वहीं भाई बहन, मां बेटा, पिता पुत्री, दो विषमलिंगी दोस्तों का व्यवहार व सम्बन्ध अधिक कारगर व स्थायी नजर आते हैं क्योंकि यहां मनुष्य का सैक्सुअल इच्छाएं हावी रहती है। फ्रायड ने लिविडो की व्याख्या करते हुए - इसे इलेक्ट्रा ग्रन्थि और ईडिपस ग्रन्थि में बाटा, जहां वह इसकी विस्तार से व्याख्या करता है। एक तरफ जहां फ्रायड ने बताया कि मनुष्य अपनी मूल में सेक्स/लिविडो को रखता है और इसी से वह विचार करता है तो दूसरी तरफ प्रसिद्ध दार्शनिक जीन पाल सार्त्र ने मनुष्य की चेतना में जीतने की इच्छा को रखा और इसी से सम्बंधित उसने मनुष्य के व्यवहारों का अध्ययन किया।
व्यक्ति अपने इंद्रियों पर नियंत्रण ज्ञान अर्जित करके कर सकता है और अपने इंद्रियों पर नियंत्रण अंतोगत्वा मन पर नियंत्रण होगा। सुपर ईगो की भी अपनी एक सीमा है और उस सीमा को अन्नत तक ज्ञान के माध्यम से बढ़ाया जा सकता है और ज्ञान सुपर ईगो को अधिक शक्तिशाली बनाएगा जिससे यह इंद्रियों पर नियंत्रण पर आसानी से कर सकेगा। जैसे यदि आप बिना सोचे विचारे चीनी का सेवन एक सीमा से अधिक करते हैं और यदि आपने कुछ घंटे चीनी का अध्ययन करने में बिताया और यह बकायदे रिसर्च किया कि चीनी शरीर के लिए कितना नुक़सानदायक है और कुछ दो चार केस स्टडी का अध्ययन किया तो यह सुपर ईगो को शक्तिशाली बनाना हुआ । अगली बार, जैसे ही आप चीनी का सेवन करने चलोगे तो यही सुपर ईगो उन सारी सूचनाओं को आपके ऊपर बम्बार्डिंग कर देगा और हो सकता हो; आप वह कृत्य करने से बचें । सुपर ईगो आपका नैतिक मन है और यह हमेशा अच्छी सूचनाओं को अपने पास रखता है। भगवान श्री कृष्ण के शब्दों में आत्मा आपको मुक्ति की तरफ ले जाना चाहती है और यह परमात्मा से साक्षात्कार कराना चाहती है। कृष्ण ने मन पर नियंत्रण करना का तरीका बार बार अभ्यास बताया है कि मन को एक काम पर लगा दो और जब जब वह भटके तो फिर उसे उठाकर वहीं लाओ। सिद्ध नाथ परम्परा इंद्रियों पर नियंत्रण करने की साधना पद्धति प्रस्तुत करता है। जिसमें हठयोग के द्वारा बहिर्मुखी और अंतर्मुखी अंत:साधना के तहत कुंडलिनी को शरीर के निचले भाग से मस्तिष्क के उच्च स्तर तक ले जाया जाता है जिसे षट्चक्रभेदन की पद्धति कहते हैं - यह सात चक्रों में बटा होता है और शरीर को अनेक कष्टों से गुजारकर मूलाधार चक्र से शून्य चक्र तक पहुंचा जाता है।
मनुष्य की मूल चेतना में क्या है और वह किन स्रोतों से प्रभावित होकर अपने कार्य करता है - यह तथ्य प्रश्नों के घेरे में है। लेकिन ज्यादातर स्थितियों में यह व्यक्तिनिष्ठ या अधिक व्यक्तिगत है। लेकिन फिर भी, मनुष्य इच्छाओं पर नियंत्रण करता जाता है और इसी से एक सभ्य समाज का निर्माण भी होता है।
अरविंद कुमार।
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