मेरा दुश्मन - ll

आज एक बार फिर, उसने मुझे हरा दिया। मैं अगर थोड़ा सा भी कमजोर पड़ता हूं तो वह मुझे गिराकर मेरे सीने पर तांडव करने लग जाता है। मैं लगातार इससे संघर्ष कर रहा हूं। सात दिन के लम्बे संघर्ष के बाद, आज जैसे अहसान करके उसने मुझे हराया या उसने मुझपर दया करके हार मान ली - मैं इस बारे में कुछ नहीं कह सकता। सौभाग्य की बात यह है कि उसका मुझे हराना मेरे हित में ही है लेकिन मैं उसे अभी भी पास में बैठा देख रहा हूं, वह तनिक भी कमजोर नहीं लग रहा है बल्कि घायल शेर की तरह मुझे घूर रहा है और मानो दुबारा इस ताक में हैं कि कब मौका मिले और वह दुबारा कब मुझे परास्त कर दें। मैं अक्सर सोचता हूं कि जब वह सो रहा हो तो उसकी गर्दन पकड़कर मरोड़ दूं और हमेशा के लिए उसे मार डालूं लेकिन मेरे ऐसा ख्याल करने मात्र से ही, वह सबकुछ जान जाता है और मुझ पर अटठाहस करता है - हर वक्त मुझे चुनौती देता है। वह पिछले सात दिनों से एक बड़ी ग़लती कर रहा था और मैंने बार बार उसे समझाया कि ऐसा मत करो लेकिन जैसे किसी पागल हाथी की तरह वह मेरी पवित्र भावनाओं को, मेरे शरीर को खिंचता हुआ, रगड़ता हुआ ले के चला जाता है। और मैं असहाय होकर, अपने सिर को अपने दोनों घुटनों में रखकर - उससे दया की भीख मांगता हूं लेकिन वह राक्षस, मुझपर तनिक भी दया नही करता है।

जीवन में कुछ पल ऐसे आते हैं - जब मैं उस पर तनिक भर नियंत्रण कर पाता हूं और थोड़ा दंड भी दे लेता हूं। उदाहरण के लिए - कुछ महीने पहले, मैंने उसे 7 दिन तक भूखा रखा था और स्वादिष्ट भोजन के प्रति, उसके लालसा को मैंने जड़ से मिटाने की कोशिश की - ऐसा मैं हमेशा उसे आटोफैजी के लाभों को बताकर उसपर नियंत्रण कर रहा था लेकिन जैसे भयानक तूफ़ान आने के पहले एक शांति नजर आती है, उसका उन सात दिनों तक शांत रहना बिलकुल एक भयानक आंधी आने का पर्यायवाची था। और एक दिन अचानक वह उठा, बिल्कुल भयंकर राक्षस की तरह - मुझे उसने यूं मसल दिया जैसे मैं रास्ते में जाता कोई चींटी हूं। और पता नहीं क्या क्या उसने खाकर अपनी उदरपूर्ति की, मैं तो देख भी नहीं सकता था। मेरे रास्ते का वह सबसे बड़ा कांटा है जो हमेशा असहनीय पीड़ा देता है। जब भी वह कोई ग़लती करता है - तो मैं उसे तथ्यों के साथ प्रामाणिक स्रोत देता हूं कि वह मत करों, भयानक दुख प्राप्त होगा लेकिन वह हमेशा मुझे यूं नजरांदाज कर देता है जैसे मैं कोई रास्ते पर उगा हुआ कांटों का फूल हूं और कोई पथिक यूं ही बिना ध्यान दिए गुजर जाए। वह हमेशा अपने तर्कों से मुझे झूठा साबित करने का प्रयास करता है लेकिन मैं हमेशा सत्य होता हूं। वह मेरी बातों को माने ताकि बाद में बड़ा दुख ना झेलना पड़े, इसके लिए मैं उसे भयानक एंजाइटी और माइग्रेन जैसी स्थितियां उस पर थोप देता हूं। और सच बताऊं, वह दर्द से कराहता भी है लेकिन उस कमबख्त ने पता नहीं क्या क्या नया तरीका निकल लिया है जैसे आज कल वह मेडिटेशन, प्राणायाम करता है और कभी कभी उसे बिल्कुल सरदर्द नहीं होता है। मैं तो हैरान रह जाता हूं - इतना ताकतवर और चालाक यह कैसे हो सकता है।

बहरहाल, एक बार फिर मैंने उस पर नियंत्रण कर लिया है; अब पता नहीं - मैंने उसपर नियंत्रण किया है अथवा वह शांत होकर कुछ पल के लिए बैठ गया है, मुझे नहीं पता। लेकिन मैंने उसे सभी प्रकार के प्रामाणिक तथ्यों से सत्य को समझाकर उसके सामने रख दिया है और ऐसा लग रहा है जैसे वह मान गया है और मुझे कुछ पल प्रसन्नता के मुझे देगा‌‌। ऐसा नहीं है कि, उसने मुझे सुख नहीं पहुंचाया है लेकिन उससे कुछ भी पाने के लिए, उसके साथ बहुत संघर्ष करना पड़ता है। हजारों बार, उससे खून की लडाई लड़नी पड़ती है और मुझे वह इतनी बार परास्त करता है जिसकी कोई सीमा नहीं है लेकिन मेरा संघर्ष उससे नित और प्रतिदिन चल रहा है। उम्मीद करता हूं, एक दिन वह पूरी तरह मेरे नियंत्रण में होगा - इसमें ईश्वर मेरी सहायता करें। 

अरविंद कुमार।

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