संकल्प की शक्ति - Solemn Vow
अक्सर बागीचे में टहलते हुए - यह देखकर हैरानी होती है कि अलग अलग पौधों में अलग अलग रंगों के फूल व फल आये हैं। सारा आकाश, सूर्य, ब्राह्मड की अनन्त तरंगों, हवाओं, जल का वाष्पीकृत रूप आदि छोड़कर उस छोटे से बीज की संकल्प शक्ति इतनी ज्यादा है कि वह अपने इच्छानुसार धरती से अपने पसंद का रंग व स्वभाव चुन लेता है। हर बीज की अपनी इच्छा हैं - गुलाब गुलाब बन जाता है और चमेली चमेली बन जाता है; एक ही मिट्टी में से दोनों अपनी ऊर्जा व पोषण प्राप्त करते हैं।
जिंदगी में अनन्त सम्भावनाएं हैं और उन सम्भावनाओं में से हम वहीं चुन लेते हैं जो हम चुनना चाहते हैं। हमारे आस पास अनन्त विचारों का प्रवाह है और हम उन्हीं विचारों को अपने पास ले आते हैं जो हम लाना चाहते हैं। इसी दुनिया में कोई जीसस, कोई बुद्ध तो कोई कृष्ण बन जाता है और हम कुछ भी नहीं बन पाते हैं और कुछ ना बनकर ही मिट जाते हैं। और जिस दुनिया से ऊर्जाएं खींची जाती है - वह आसमान, तारे, सूर्य, हवाएं सब एक हैं फिर इसी दुनिया में लोग अलग अलग क्यों हो जाते हैं? आखिर आदमी के व्यक्तित्व अलग अलग क्यों हो जाते हैं? मनुष्य के शरीर में सात केंद्र है और इसी केंद्र से ऊर्जाएं संचालित होती है। क्रोध का केंद्र क्रोध को, काम का केंद्र काम को आकर्षित करता है। पहला और सातवां केंद्र - शक्ति के संग्रहालय है। दूसरा केंद्र - शक्ति को बाहर फेंकने का केंद्र है, यह सेक्स के द्वारा फेंका जाता है। छठा केंद्र कपाल पर है जो बिल्कुल सेक्स के अपोजिट है और शक्तियां भीतर आती है। यह आज्ञा केन्द्र है। तीसरा, चौथा व पांचवां अंतर्मन के केंद्र है। सातवे केंद्र से परमात्मा की प्राप्ति होती है।
संकल्प का अर्थ क्या है? संकल्प का अर्थ है कि - अगर कुछ भी करना हो तो समग्र शक्ति उसमें समायोजित हो जानी चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि आधा मन कह रहा है कि यह करो और आधा मन कह रहा है कि यह मत करों। मन टुकड़ों मे नही बंटा होना चाहिए। हम अंदर से बटे हुए हैं - हम यह नहीं तय कर पाते हैं कि ना कहना है अथवा हां; हम दोनों तरफ जाना चाहते हैं। हमारे भीतर सैकड़ों संकल्प एक साथ चल रहे होते हैं और यह बंटा हुआ और कमजोर संकल्प होता है। जिसको आप प्रेम करते हैं उसी को आप घृणा करते हैं। एक दम से जो अभी मित्र हैं वह शत्रु हो सकता है। प्रेम के नीचे ही घृणा बैठी हुई है - वह प्रतीक्षा करती है कि प्रेम हट जाएं तो एकदम से मैं ऊपर आ जाऊं। इसलिए दुश्मन से उतना खतरा नहीं होता है जितना कि मित्रों से खतरा होता है क्योंकि दुश्मन अब आगे मित्र हो सकता है लेकिन मित्र दुश्मन बन सकता है। जिससे आप श्रद्धा करते हैं उसी से आप के मन में अश्रद्धा पैदा हो जाएगी। हम भीतर कुछ और हैं और बाहर कुछ और हैं, हर समय हम कुछ और हो रहे होते हैं। हमारा आंतरिक मन कलह से भरा हुआ है।
जब आप किसी का हाथ अपने हाथ में लेकर यह कह रहे होते हैं कि मैं आपसे बहुत प्यार करता हूं तो झांककर देखना मन कह रहा होगा कि क्यों झूठी बातें बोल रहे हो? हम हमेशा इनर कांट्राडिक्सन से भरे हुए हैं, ऐसे संकल्प नहीं आ सकता है। संकल्प का अर्थ है - एक मन। आज प्रेम है तो कल घृणा होगी, मत बनाओ मित्र - इसमें दुश्मनी हैं। रोज मैं जो कर रहा हूं, वह करूं तो- हमेशा हमेशा के लिए। संकल्प पहला बुनियादी सूत्र है जो प्रयोग करने से आएगा। और यही व्यक्तित्व में चार चांद लगाएगा।
अरविंद कुमार।
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