अकेलेपन का दंश।
अब्राहम मैस्लो के आवश्यकता सोपान क्रम पर, यदि आप निगाह डालेंगे तो सबसे ऊपर आत्म - साक्षात्कार जैसा शब्द नजर आता है। जिसकी व्याख्या मैस्लो, कर्ट गोल्डस्टीन, कार्ल रोजर्स ने अपने अपने शब्दों में की। जिसका एक सामान्य अर्थ यह समझा जा सकता है कि अपनी क्षमता का पूर्ण प्रयोग करके (शारीरिक और मानसिक) वास्तविक बन जाना है।
जीवन की यह अवस्था मानसिक रूप से व्यक्ति को इतना ऊपर पहुंचा देती है कि वह समाज और लोगों से कटता और अलग होता जाता है क्योंकि उसके मस्तिष्क के स्तर के लोगों का मिलन जल्दी नहीं हो पाता है। रूचिकर बात ये है कि, इस अवस्था पे आकर भी वह वहीं बनना चाहता है जो एक सामान्य मनुष्य समाज में नजर आता है। वस्तुत: लोगों का यह मानना होता है कि इस व्यक्ति को कोई समस्या नहीं हो सकती है जबकि समस्याओं का एक चक्रव्यूह वहां नजर आता है। यह अवस्था जो असामान्य हो जाने की है, बहुत पीड़ादायक हो जाती है। जैसे अकेलापन महसूस करने पर - घबराहट और डर का भाव मस्तिष्क को जकड़ लेता है। शहरों में अकेलेपन को महसूस करना बहुत आम बात है - लोग सुबह से शाम तक दौड़े जा रहे हैं और किसी के पास इतनी फुर्सत नहीं कि वह दो पल शांति का बिता पाए। यदि हम ध्यान से, अपने भीतर के चल रहे भावों को देखें तो हम घबरा जाते हैं क्योंकि अंदर ऐसा कुछ भी नहीं है जो खो जाने से है। मन के भाव, हमारे विचारों को भी प्रभावित करते हैं - सोचने और समझने की शक्ति को संकीर्ण कर देते हैं। जैसे - क्रोध में पड़कर व्यक्ति ज्यादातर निर्णय लेता है लेकिन कुछ ही देर बाद वह उन निर्णयों पर पाश्चाताप कर रहा होता है; क्रोध के उन पलों में, उसके पास भविष्य में होने वाले नुकसानों के लिए तथा सवालों के लिए भरपूर जवाब होता है। उसी प्रकार से व्यक्ति का अधिक प्रसन्नता में निर्णय लेना भी उसे दुख की तरफ ढकेल रहा होता है। जब आप अधिक प्रसन्न हो या क्रोध से भरे हो तो निर्णय लेने से बचें - निर्णय लेने कि स्थिति को स्थगित करें और मस्तिष्क को शांत करके निर्णय लें।
अकेलेपन से ऊपर की अवस्था को एकांत (Solitude) कहते हैं। एकांत में हमारा मिलन स्वयं से होता है, हम स्वयं को अधिक हर स्थितियों में अच्छा पा रहे होते हैं। यहां मनुष्य भीड़ में भी आनंदित रहता है और एक यात्रा 'आत्म साक्षात्कार ' - Self Actualization में शुरू होती है। लेकिन यह अवस्था समाज से कटकर Asocial हो जाने की है जो समाज की उन्नति के लिए अच्छा नहीं होगा। ऐसा व्यक्ति सामाजिक समस्याओं - शहरीकरण, आतंकवाद, जनसंख्या आदि विषयों पर कोई रूचि नहीं ले सकता है। जैसे समाज का प्रबुद्ध, बुद्धिजीवी वर्ग लोकतंत्र की आलोचनात्मक व्याख्या करते हैं और अपना वोट देने नहीं जाते हैं क्योंकि उन्हें केवल सिर नजर आते हैं और सिरों में क्या है, इस पर लोगों का ध्यान नहीं जाता है। प्रबुद्ध होने की मांग यह होती है - विचार करना, सोचना। और यह सबसे कठिन कार्य है जो हमें समाज से काटकर अकेलेपन की तरफ ले जाती है। जैसे आप ही सुबह से रात तक जो कुछ भी खाते पीते हैं कितनी बार विचार करते हैं कि इससे शरीर पर क्या असर होगा - प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा की कितनी मात्रा शरीर में जा रही है। विटामिन और खनिज शरीर में अपना रोल कैसे निभाते हैं और बीमारियां कैसे शरीर को जकड़ लेती है। यकीन करिए, अगर आप इस पर विचार करेंगे और महीनों लगाकर आपको ज्ञान अर्जित करना होगा। हमारा भोजन ही हमारा हर प्रकार से पोषण करता है।
जिंदगी में सुख और दुख जैसा कुछ भी नहीं है; पाप और पुण्य कपोली और मिथक कल्पनाएं हैं। प्रारम्भिक अवस्था में, जो प्यार आपको सुख का अनुभव कराती है, संसार में स्वर्ग नजर आता है तो वहीं प्यार, अपनी दूसरी अवस्था में - घृणा और नफ़रत का रुप लेकर आपको भयानक दुख में भी ले जाती है। जीवन के सुख ही जीवन के दुख है और दुखों से सुख नहीं आता है बल्कि कुछ नये परत आंखों पर से हट जाते हैं जो कुछ और भी है...!
✍️ अरविंद कुमार।
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