अस्तित्ववाद की सीमाएं।
धरती पर मनुष्य की उपस्थिति उसके स्वयं होने का प्रमाण है। अन्य मनुष्यों की उपस्थिति और भौतिक परिस्थितियां उसके स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त निर्बंधन आरोपित करते हैं। समस्त संसार के केंद्र में मनुष्य होना चाहिए या दूसरे शब्दों में, मनुष्य साध्य और सब कुछ साधन होना चाहिए। अस्तित्ववादी विचारकों में सोरेन कीर्केगार्द, जान पाल सार्त्र और कामू प्रमुख हुए जिनमें सार्त्र और कामू को साहित्य का नोबेल पुरस्कार भी मिला।
आप जो कुछ भी वर्तमान में है - आप अपने निर्णयों के परिणाम है। आप महान इसलिए भी नहीं बन सके क्योंकि आपने उचित समय उचित निर्णय नहीं लिया और सभी महान लोग इसलिए प्रसिद्ध हो पाये क्योंकि उन्होंने निर्णय लिया। मनुष्य स्वतंत्र है और उसकी स्वतंत्रता का परिक्षण इस बात से किया जा सकता है कि उसके पास चयन की स्वतंत्रता होती है। हर पल, हमारे सामने विकल्प होते हैं कि कौन सा विकल्प हम चुनते हैं - उसी से हमारा निर्माण होता है। भोजन करने और ना करने का विकल्प, शिक्षित होने या ना होने का विकल्प इत्यादि। यही संकल्प की स्वतंत्रता भी है जबकि नियतिवादी इसके विरोध में आ खड़े होते हैं क्योंकि उनका मानना होता है कि सब कुछ पहले से नियत है और मनुष्य कुछ भी नहीं कर पाता- वह कठपुतली की तरह केवल तमाशा करता है। मनुष्य अपने जीवन की कहानी स्वयं लिखता है और यह लिखना निर्णय करने से होता जाता है।
सार्त्र के अनुसार, निर्णय चाहे जितना भी समझदारी से लिया जाय, वह अंततः अपूर्ण होता है। क्योंकि एक निर्णय करने में अन्य विकल्पों को छोड़ देना अंतर्निहित है। हर विकल्प में खूबियों के साथ कमियां भी होती है और जैसे ही हम कोई विकल्प चुनते हैं तो उसमें निहित कमियां उभरकर हमें दिखने लगती है और खूबियां छिप जाती है - यह स्थिति हमें वेदना व दुख से भर देता है। इसके विलोम में खूबियां भी नजर आ सकती है। बारिश की बड़ी बड़ी बूंदें जब शांत सरोवर में टप टप गिरती है तो बड़ा बड़ा बुलबुला बनता हमें दिखाई देता है लेकिन उन बुलबुलों के नीचे फैला पूरा सरोवर का जल हम देख नहीं पाते- किसी एक विकल्प को चुनने में ऐसा ही होता है। दोनों विकल्पों कि तरफ हम नहीं जा सकते हैं - किसी एक विकल्प को चुनना ही होगा और इसलिए व्यक्ति व्यक्तित्व विभाजन का शिकार हो जाता है, वह उन विसंगतियों में फस जाता है जिससे गर्त में समाता चला जाता है। जीवन में कोई भी विकल्प चुनने का अर्थ यह है कि अन्य विकल्पों से दूरी बनाना तथा अधूरेपन को अपने व्यक्तित्व में शामिल करना। पूर्णता को प्राप्त कर लेना, यह एक मिथक है और अधूरापन ही जीवन का यथार्थ बनकर सामने आता है। और जीवन के हर स्तर पर अधूरापन महसूस होता ही रहेगा।
क्या सच में, हमारे अस्तित्व में कुछ अर्थ है- हमारे होने का कोई विशेष प्रयोजन है। जन्म और मृत्यु मनुष्य के नियंत्रण से बाहर है और इसके साथ साथ जैसा वह जीवन जीना चाहता है; वैसा जीवन वह बिल्कुल नहीं जी सकता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह अमीर है या गरीब, रूपों का राजा है या कुरूप - मनुष्य की इच्छाएं कभी भी शांत नहीं होती है तथा संतुष्ट होती नजर नहीं आती है। क्योंकि दूसरे मनुष्य का अस्तित्व उसके स्वतंत्रता में बाधक है और यही सबसे बड़ी विसंगति (अब्सर्ड) है। यह विसंगति लगभग लगातार बनी रहती है जबतक कोई कठोर निर्णय ना लिया जाय और ऐसा साहस सबमें नहीं होता है। बहुतों का जीवन विसंगतियों में ही गुजरता है क्योंकि "हम जो है" और " हमें जो होना चाहिए" - यह दूरी मिटती नजर नहीं आती और कोई मिटाना चाहें तो वह आसान नहीं होता। जैसे गौतम सिद्धार्थ ने इसी विसंगति से बचने हेतु एक निर्णय लिया और घर छोड़ा, ज्ञान की प्राप्ति हुई तथा बुद्ध कहलाए; परंतु विडम्बना यह है कि विसंगति दुबारा से शुरू हो जाती है।
अस्तित्ववाद की चर्चाओं में, यही विसंगतिबोध आगे चलकर आत्मनिर्वासन ( Self- Alienation) में परिणत हो जाता है जिसमें व्यक्ति जब अपनी अंतरात्मा के विरूद्ध कोई निर्णय लेता है तो वह स्वयं से कटता चलता जाता है। वह एक दिखावे और दूसरों को प्रसन्न या शोषित जीवन जी रहा होता है। इस अवस्था में, उस व्यक्ति का निर्णय कोई दूसरा व्यक्ति ले रहा होता है जिससे वेदना कम नहीं होती है बल्कि बढ़ती है और यही आत्मप्रवंचना है। अपने निर्णय लेने का अधिकार किसी दूसरे व्यक्ति को सौंप देने से व्यक्ति का वस्तुकरण हो जाता है क्योंकि एक वस्तु ही स्वयं के बारे में निर्णय नहीं ले पाता है। जो व्यक्ति स्वतंत्रतापूर्वक निर्णय लेगा उसे कठोर वेदना से गुजरना होगा और यही प्रामाणिकता है तथा इससे बचा नहीं जा सकता है। कीर्केगार्द ने वस्तुकरण का विरोध करते हुए व्यक्ति के आत्मनिष्ठता पर अधिक ध्यान दिया और बताया कि मनुष्य का वास्तविक होना उसके अपने स्वयं होने में है। लेकिन विज्ञान, तकनीकी आदि के विकास ने मनुष्य का महत्व कम कर दिया है। हम क्या है? और हमें क्या होना चाहिए - यह अंतर्द्वंद्व हमेशा चलती रहती है और यदि हम जो होना चाहते हैं उसके पक्ष में कोई निर्णय करते हैं तो बहुत कुछ छूटने का खतरा हमें दिखाई देता है - परंतु ऐसा निर्णय लेने के लिए बहुत साहस की जरूरत पड़ती है। और जैसे ही आप वह निर्णय लेते हो तो दुबारा से अंतर्द्वंद्व का सफर शुरू होता है।
अंतर्द्वंद्व प्रायः जीवनभर बना रहता है।
अरविंद कुमार।
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