अंधकार से अंधकार की ओर।
हम सबका जीवन अंधकार में है। हम हर पल अंधेरे में और अज्ञानता में जी रहे होते हैं। हमारे ज्ञान का, हमारे सोचने, समझने और अभिव्यक्ति करने की एक सीमा होती है और इसी सीमा में बंधकर हम दूसरे लोगों से व्यवहार करते हैं - जिसका परिणाम अच्छा तो कभी कभी बहुत अच्छा बनकर सामने आता है। हमारे सीमा से ऊपर उनकी सीमा होती है जिनका ज्ञान हमसे ज्यादा होता है परन्तु जैसे ही हम ऐसे ज्ञान के प्रकाश से आलोकित होते हैं तो हमारा अहंकार आकर बीच में खड़ा हो जाता है और दुबारा से हम अंधकार में बंधकर रह जाते हैं। इन पलों में आवश्यक होता है कि हम विनम्र बनें और अपने विवेक से ऐसे सभी लोगों का सम्मान करते हुए उनके ज्ञान से अपने ज्ञान की सीमा को बढ़ाने का हर संभव प्रयास करें। किसी के अनुभवों से सीखना और उससे प्राप्त शिक्षाओं को जीवन में आत्मार्पित करना - हमें वास्तविक सुखों की अनुभूति कराएगी लेकिन यह सीखना हमें फिर अंधकार में ले जाएगी क्योंकि ज्ञान की दूसरी सीमा को तोड़ना, हमारे लिए चुनौती होगी और इस प्रक्रिया में प्रकाश के पल केवल भ्रम है।
जीवन में कभी भी वह एक सीधी रेखा नहीं आएगी जब सबकुछ सही चल रहा हो और आप उस रेखा पर सीधे चलते जाएंगे। जीवन की रेखा वक्र है और अनगिनत बार हमें नीचे और ऊपर होना पड़ता है। वास्तविक जीवन फिल्मों की तरह नहीं होता है जिसमें निर्देशक और लेखक सभी प्रकार की परिस्थितियां नायक के पक्ष में कर देते हैं और नादान लोग ऐसे फिल्मों को देखकर तालियां बजाते नहीं थकते। एक मनुष्य का जीवन विचलनों से भरा होता है, अंतर्द्वंद्व और खुद के साथ संघर्षों से भरा होता है। जो व्यक्ति अपने संस्कारों और मूल्यों से हटकर जीवन जी रहा है - वह भी विचलन के दुःखों से भरा हुआ है और जो संस्कारों व मूल्यों के साथ जी रहा है - वह भी विचलन का शिकार है। मनुष्य की प्रशंसा इसी में है कि वह सहज हो जायें और वह बनें जो अंतरात्मा की तरफ से निर्देश प्राप्त हो - ऐसा करने पर भी पूर्णता का अनुभव नहीं होगा। अधूरापन ना केवल जीवन का अनिवार्य हिस्सा है बल्कि हम सब हमेशा ऐसा ही महसूस भी करते हैं - पूर्णता में जीवन का रूक जाना है और इसे हासिल करने का प्रयास भी नहीं किया जाना चाहिए।
मैं मनुष्यों को गौर से देखता हूं और सुक्ष्म परीक्षण करने का प्रयास करता हूं। मैं उनमें कभी उन भावनाओं ( प्रेम, करूणा आदि ) में पाकर देवता के दर्शन करता हूं तो दूसरी ओर, उन भावनाओं ( क्रोध, द्वेष, नफ़रत, ईर्ष्या आदि) में पाकर एक भयंकर राक्षस को देखता हूं। मैं दुविधा में पड़ जाता हूं कि मनुष्य के व्यक्तित्व के किस पहलू को ध्यान में रखकर व्यवहार किया जाय। मनुष्य के भीतर विद्यमान उस राक्षस या देवता का सामना करते हुए - हम क्या बनें और किस स्थिति में हम रहें, हमारी तटस्थता परिस्थितियों को और ज्यादा गम्भीर ना बना दें। मैं इस सवाल पर विचार करता हूं कि मैं किस सीमा तक उस देवता की अराधना करता रहूं और स्वयं दुख सहते हुए - अच्छा बदलाव लाने का प्रयास करता रहूं। मेरी क्रियाविधि उस आत्मा के साथ होती है; जहां से यथार्थ समृद्धि की जड़ें निकलती है। मैं उस राक्षस से वार्तालाप करने से बचता हूं जो क्रोध, घृणा इत्यादि का सहारा लेकर नकारात्मक ऊर्जा की मेरे ऊपर बम्बार्डिंग कर देता है; मैं गौर से उसे सुनता और देखता हूं और निष्कर्ष निकालता हूं कि मनुष्य का शरीर स्वयं में क्या है? अभी कुछ क्षण पहले, जिसमें मैंने देवता के दर्शन किए- यह नकारात्मक शक्ति उसके खिलाफ क्यों खड़ी हो गई और यह स्थिति मुझे धर्मसंकट में डाल देती है कि मेरा व्यवहार क्या होना चाहिए और किस पक्ष में, मैं अपना निर्णय दूं और किसके साथ जाऊं। कभी-कभी मैं कुछ निर्णय उस व्यक्ति में निहित उस नकारात्मक ऊर्जा के विरूद्ध कुछ निर्णय लेता हूं और कुछ घंटे और दिन बाद, मैं उस देवता को स्मरण करके - अपने लिए गये निर्णय पर पाश्चाताप करता हूं। मैं उस समय संताप और द्वेष की भावना से भर जाता हूं; ऐसा इसलिए भी क्योंकि मेरे भीतर का अहंकार भी कुछ मात्रा में उस समय हावी हो गया था! हालांकि `मैं इस पर कार्य कर रहा हूं कि कैसे मैं अहंकार शून्य की अवस्था को प्राप्त कर सकता हूं।
अज्ञानता हमें यह बताती है कि हम बहुत कुछ जानते हैं किंतु ज्ञान व शिक्षा यह बताती है कि हम कितना कम जानते हैं। हमारा जानना हमें विनम्र और मौन की तरफ लेकर जाती है। शंकराचार्य का अद्वैतवाद - यह बताता है कि आत्मा और ब्रह्म में कोई अंतर नहीं है- आत्मा और ब्रह्म एक है। मनुष्य के भीतर ही परमात्मा है या यूं कहें कि मनुष्य ही परमात्मा है और यह सत है। अद्वैतवाद का सूत्र वाक्य है - अहं ब्रह्मास्मि। सच कहता हूं - वह आत्मा जब प्रेम, करूणा, ममता, परोपकार, सत्यनिष्ठा का रूप लेकर मनुष्य में प्रकट होती है; उन पलों में मनुष्य से बेहतर और कोई नजर नहीं आता। वह बहुत ही कीमती, खुबसूरत और ह्रदय को अद्भुत सुख-चैन से भर देता है - उन पलों में यही इच्छा होती है कि मनुष्य को ह्रदय में रखकर, श्रद्धाभाव से उसकी अराधना की जाय।
अरविंद कुमार।
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