बौद्ध नैतिक दर्शन

आचरण की शुद्धि तथा दुख से मुक्ति के लिए गौतम बुद्ध ने मनुष्य को जिस मार्ग का अनुसरण करने की शिक्षा दी है उसे अष्टांग मार्ग कहते है। इस मार्ग का वर्णन उन्होंने चार आर्यसत्यों के माध्यम से किया है। प्रथम आर्य सत्य ये है कि सभी प्राणियों का जीवन दुखमय है। जन्म, वृद्धावस्था, रोग, मृत्यु, इच्छित वस्तु की प्राप्ति ना हो पाना, प्राप्त सुख का नष्ट हो जाना, अप्रिय वस्तुओं व प्रिय वस्तुओं से वियोग आदि सभी दुखपूर्ण है। समस्त प्राणियों को दुख हमेशा घेरे रहते है। इस प्रकार संसार मे दुख की व्यापकता निर्विवाद है। दूसरा सत्य यह है कि यह व्यापक दुख अकारण नही है इसका कारण अवश्य है। महात्मा बुद्ध ने दुख के कारणों की 12 श्रृंखलाएं बताई जिनमें अविद्या को इसका प्रथम और मूल कारण बताया है।बौद्ध दार्शनिकों के अनुसार, अविद्या का अर्थ है आत्मा के स्वरूप और चार आर्य सत्यों को ठीक से ना जानना। तीसरा आर्यसत्य यह है कि दुख का निरोध अथवा विनाश सम्भव है। बुद्ध यह मानते थे कि मनुष्य दुख से तो मुक्ति प्राप्त कर सकता है। यदि दुख के समस्त कारणों को समझकर उनका निराकरण कर दिया जाय तो वह स्वतः नष्ट हो जाएगा। अन्य सभी वस्तुओं की भाँति दुख भी नश्वर है। और उचित उपायों द्वारा इसे नष्ट करके मनुष्य इससे मुक्ति पार कर सकता है। इस प्रकार मनुष्य के लिए सदैव दुख भोगते रहना अनिवार्य है। चौथा और अंतिम आर्यसत्य यह है कि दुख के विनाश का मार्ग है। इस आर्य सत्य का विशेष महत्व है क्योंकि इसमे दुख निरोध का उपाय महात्मा बुद्ध ने बताया है। आइए इसे समझें -

दुख निरोध के मार्ग को अष्टांग मार्ग कहा गया है। बुद्ध का अथन है कि अष्टांग मार्ग मे बताए गए आचरण सम्बन्धी निम्नलिखित आठ नियमों का पालन करके ही मनुष्य अपने आचरण तथा विचारों को पवित्र बना सकता है और अंततः दुख से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। 
1. सम्यक ज्ञान - बुद्ध द्वारा बताए गये चार आर्य सत्यों को भलीभांति समझना। 2. सम्यक संकल्प - हिंसा, द्वेष, लोभ, मोह, क्रोध आदि समस्त दुर्गुणों का परित्याग करके अपने आचरण को सदैव पवित्र रखने का संकल्प। 3. सम्यक वचन- कभी भी झूठ ना बोलना, किसी की चुगली ना करना तथा किसी को कटु वचन ना कहना। 4. सम्यक कर्मांत - हिंसा, वासना, तृप्ति आदि से सम्बंधित समस्त दुष्कर्मों का परित्याग करते हुए सदैव शुभ कर्म करना। 5. सम्यक आजीव - केवल उचित और न्यायपूर्ण उपायों द्वारा ही जीविकोपार्जन करना। ऐसे कोई भी कर्म नही करना चाहिए जो नैतिकता के विरूद्ध हो। 6. सम्यक व्यायाम - मन में उत्पन्न होने वाली समस्त दुर्भावनाओं का दमन करके उनके स्थान पर सद्भावनाओं तथा अच्छे विचारों को उत्पन्न करने का प्रयास करना। 7. सम्यक स्मृति - यह स्मरण रखना कि मन मन है, शरीर शरीर है। वस्तुओं के वास्तविक स्वरूप का स्मरण रखना अन्यथा हम शरीर वासना जैसी वस्तुओं को नित्य एंव मूल्यवान समझकर उनके प्रति आसक्ति का अनुभव करने लगेंगें। 8. सम्यक समाधि - हर्ष, विषाद, राग द्वेष सभी प्रकार के सांसारिक द्वंद्वों से मुक्त होकर चित्त की पूर्ण एकाग्रता को प्राप्त करना। मानव जीवन के लिए यह अष्टांग मार्ग का बहुत महत्व है क्योंकि इसमे अतिशय, भोगवाद तथा अत्यधिक कठोर संयासवाद इन दोनो अतिवादी दृष्टिकोणों का परित्याग करके मुक्ति के लिए मनुष्य को संतुलित मध्यम मार्ग का अनुसरण करने का उपदेश दिया गया है। वस्तुतः दुख से मनुष्य की मुक्ति के लिए गौतम बुद्ध उस कठोर संयासवाद को उचित नही मानते जिसका समर्थन जैन दर्शन ने किया है। उनका विचार है कि मुक्ति के लिए कठोर संयासवाद भी उसी प्रकार त्याज्य है जिस प्रकार अतिशय भोगवाद। मनुष्य को इन दोनो के बीच का मार्ग अपनाते हुए न तो भोग-विलास में अत्यधिक लिप्त होना चाहिए और न कठोर तपस्या द्वारा शरीर को अत्यधिक कष्ट देना चाहिए। अरस्तू ने भी मनुष्य के कल्याण के लिए इसी संतुलित मध्यम मार्ग का समर्थन किया है। संतुलित मध्यम मार्ग ही मानव कल्याण के लिए सर्वोत्तम मार्ग है।

भारतीय नैतिक दर्शन - 1

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