दुनिया किसी के प्यार में।
उसकी पलकें जब जब मेरी तरफ उठती, मेरे ह्रदय में एकसाथ हजारों गुलाब खिल जाते। उसकी आंखों की खुबसूरती, उसमें समाया अपनापन, कमल से सुर्ख लाल उसके ओंठ - मुझे अपनी तरफ किसी तीव्र चुम्बकीय क्षेत्र धारण करने वाले चुम्बक की तरह अपनी ओर आकर्षित करतीं। आकांक्षा यही होती कि, जीवन कुछ पल के लिए ठहर जायें, कुछ पल के लिए मैं उसका हो जाऊं और कुछ पल में जीवन उसकी बांहों में उमड़कर, घुमड़कर समाप्त हो जाएं। प्रेम की पुनरावृत्ति इतनी तीव्र शक्ति के साथ मुझ पर होगी इसका मुझे कोई अंदाजा नहीं था - उससे मिलकर ऐसा लगा मानो जैसे वह अपने भीतर प्रेम को महासागर की तरह विशाल और आकाश की अनन्त श्रृंखलाओं में भरकर, मुझे उसमें डुबो दें रही थी। उससे मिलने की तड़प, उसे देखने की लालसा, उसे सुनने और उसके साथ कुछ पल बिताने की इच्छाएं मेरे भीतर बहुत तीव्रता से उठतीं, तड़पती और सागर की लहरों की तरह असफल प्रयासों के बाद मचलकर, घूंट के आंसू पीकर अशांत हो जातीं। मेरी नजरें उसे इतनी तड़प के साथ यहां वहां खोजती कि जैसे मरूस्थल में कोई प्यासा पथिक जल की तलाश में उन मरीचिकाओं का पीछा करते हुए थक और हारकर बैठ जाता है क्योंकि वहा जल होने का भ्रममात्र था। कुछ पल उसके साथ चलते हुए, मैंने महसूस किया कि जिंदगी कितनी खुबसूरत है और इसमें कितना आनन्द और प्रसन्नता है। उसका बार बार मेरा हाथ पकड़कर, सड़क पर आती जाती गाड़ियों से सावधान करते रहना, उसका मेरा ध्यान रखना- शून्य में अनन्त प्रसन्नताओं और सम्भावनाओं को जन्म दे रही थी। उसका मुझे कुछ ही क्षणों में सहज कर देना, मुझसे बात करतें हुए, मेरे दिल की तड़प और कसक को समझकर उन्हें सम्हालना उसे अच्छे से आता है। उससे बातें करके ह्रदय को अद्भुत सुख-चैन मिलता है - मुझसे वह कभी कभी सफेद झूठ बोलती और मैं मुस्कुराकर उसकी बातों पर भरोसा करता क्योंकि उसकी आंखों को मैं हमेशा मुस्कुराता हुआ देखना चाहता था।
प्रेम का संयोग इतना मादक और रसयुक्त हो सकता है, इसकी ऐसी कल्पना मैंने कभी नहीं की थी जिसे मैं महसूस कर रहा था। श्रृंगार को रसराज कहा गया है और यह प्रेम हमारे ह्रदयों पर इस प्रकार आच्छादित हो रहा था जैसे अमावस्या की काली रात घने जंगल को और अधिक ढककर उसके अंधकार में वृद्धि कर देती है। इस घने अंधकार में हम एक-दूसरे की तरफ खिंचते चलते जा रहे थें; साथ होने पर हम उचित-अनुचित का विचार तक नहीं कर पाते थे और साथ नहीं होने पर अनन्त चिंताएं हमें घेर लेती थी। मैंने अपने स्वभाव में, चलने, उठने, बैठने और पूरे व्यक्तित्व में एक बड़ा परिवर्तन महसूस किया और ह्रदय में बस उसे देखते रहने की इच्छाएं उठती रहतीं और घंटों तक मैंने उसके तस्वीरों को देखते हुए गुजारा। मन बार बार यही कहता कि स्वयं को इस धारा में बह जाने दूं, उसकी बांहों में शाम गुजारते हुए- जीवन कुछ चंद पलों में समाप्त क्यों नहीं हो जाता है। इस प्रेम, उसके सुख व दुख से- मैं सुखी व दुखी हो रहा था, उसकी प्रसन्नता मुझे बहुत प्रसन्न कर रही थी। उसे पलकों पर सजा लेने की इच्छा होती, उसके राहों में पुष्प बिछा देने की इच्छा होती, उसके दुःखों को मिटा देने की इच्छा होती- मैं सोचता हूं, प्रेम में कोई इतना विशेष कैसे हो सकता है? मैं क्यों उसके सिवा और कुछ नहीं सोच पाता था।
शुरुआत के दो हफ्ते, बहुत विचलन भरा रहा और अपनी ही भावनाओं को मैं समझने में असफल हो रहा था। लेकिन फिर मैंने इसपर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया। उम्र के जिस दहलीज पर आ खड़ा हुआ हूं: वहां प्रेम करने और पाने की इच्छा बहुत तीव्र है और इसमें स्वयं पर नियंत्रण स्थापित करना- उससे भी ज्यादा कठिन। इसी दहलीज पर कैरियर का बोझ भी है, परिवार और दोस्तों की उम्मीदें भी हैं जिस पर खरा उतरना चाहता हूं और कभी कभी जीवन इन अंतर्द्वंद्वों में फंसकर बहुत कठिन जान पड़ता है। उसके सुर्ख गुलाब की पंखुड़ियों की तरह गुलाबी होंठों को छोड़कर, कांटों का दामन पकड़ा बहुत दुष्कर और कठिन जान पड़ता है। बहरहाल, मैंने वे कांटे ही चुने और कर्तव्यपथ पर आगे बढ़ चला। जीवन में प्रत्येक परिस्थितियों का सामना हम कैसे करते हैं और उसे कैसे सम्हालते है - यह हम पर निर्भर करता है लेकिन बड़ा लक्ष्य बड़ी कुर्बानियां मांगता है। हम दोनों के अंतर्द्वंद्व और समस्याएं एक जैसी थी कि हम इस प्रेम में आगे नहीं बढ़ सकते हैं, हमारी अंतरात्मा हमें बहुत दोष की भावना से भर देती थी- क्योंकि हम इस प्रेम के साथ आगे नहीं बढ़ सकते थे, हमारी चुनौतियां अनगिनत थी। प्रेम शुरूआत में जहां दुनिया को स्वर्ग जैसी अनुभूति कराती है तो दूसरी तरफ ईर्ष्या, आधिपत्य, ईगो जैसे नकारात्मक विकारों को भी जन्म देती है और चीजें कठिन हो जाती है। हम दोनों ने निर्णय लिया कि हम अपनी भावनाओं पर नियंत्रण करेंगे लेकिन इसमें किसी एक का कमजोर होना- सबकुछ खराब कर देता और हम वहीं पहुंच जाते, जहां से यात्रा शुरू करते।
फिलहाल, हमने स्वयं पर नियंत्रण कर लिया है और एक अच्छे दोस्त बन गए हैं।
अरविंद कुमार।
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