विकासात्मक नैतिक सिद्धांत : हर्बर्ट स्पेंसर
हम उन कर्मों को शुभ कहते है जो हमारे अपने तथा दूसरों के जीवन में सहायक होते है और हम उन कर्मों को अशुभ कहते है जो प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से एक व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह को मृत्यु की ओर ले जाता है।
हर्बर्ट स्पेंसर ने मनुष्य के दीर्घ जीवन को शुभ आचरण का लक्ष्य माना है। वे कम विकसित आचरण की अपेक्षा अधिक विकसित आचरण को उत्कृष्टतर मानते हैं, क्योंकि ऐसा आचरण मनुष्य के दीर्घ जीवन में अधिक सहायक होता है। मानव अपने कर्मों का फल शुभ अथवा अशुभ के रूप में पाता है। यदि किसी ने पहले अनैतिक कार्य किया तो उसे उसका फल अनैतिक मिलेगा। जो आचरण मनुष्य के विकास की प्रारंभिक अवस्था मे पाया जाता है वह कम विकसित और जो आचरण उसके विकास की परवर्ती अवस्था में उपलब्ध होता है वह अधिक विकसित आचरण है। विकासवादी मानदंड के अनुसार शुभ कर्म वातावरण के साथ मनुष्य के समायोजन में सहायता देते हैं और अशुभ कर्म उसके इस समायोजन में बाधा डालते है। विकास के प्रक्रम के फलस्वरूप धीरे धीरे आचरण के वे रूप समाप्त हो जाते है जो मनुष्य के समायोजन मे सहायक होते है जो मनुष्य के समायोजन मे बाधक होते है और वे रूप ही शेष रह जाते है जिनसे इस समायोजन मे सहायता मिलती है। जैसे - विकास के साथ साथ मनुष्यों में पारस्परिक सहयोग बढता है और संघर्ष कम होता जाता है क्योंकि सहयोग समायोजन में सहायक सिद्ध होता है जबकि संघर्ष इसमे बाधा डालते है। इसी प्रकार पारस्परिक सहानुभूति व्यक्ति तथा समाज दोनो के विकास मे पर्याप्त सहायता प्रदान करती है। इसके विपरीत पारस्परिक संघर्ष के कारण व्यक्ति और समाज दोनो के विकास मे बाधा डालती है। यही कारण है कि सामान्यतः समाज में संघर्ष को अनुचित और सहानुभूति को वांक्षनीय माना जाता है। अन्य सभी नैतिक नियमों तथा सद्गुणों की वांक्षनीयता का भी यही मूल आधार है।
हर्बर्ट स्पेंसर उन्नीसवीं शताब्दी के उन प्रमुख विचारकों मे से है जिन्होने डार्विन द्वारा प्रतिपादित विकासवाद के आधार पर ही समस्त सामाजिक तथा नैतिक नियमों की व्याख्या की है। स्पेंसर ने अपनी पुस्तक "डेटा आॅफ एथिक्स" में जिस नैतिक सिद्धांत का प्रतिपादन किया है उसे 'विकासात्मक सुखवाद' कहा जा सकता है क्योंकि वे विकासवाद तथा सुखवाद दोनो को आधार मानकर मानवीय आचरण और नैतिक नियमों का मूल्यांकन करते है। वे भी 'विकास' शब्द का प्रयोग 'वृद्धि' के अर्थ मे किया था और यह बताया था कि जब कोई जीव सरल एंव असंगठित अवस्था से अपेक्षाकृत जटिल तथा सुसंगठित अवस्था में प्रवेश करता है तभी यह कहा जा सकता है कि उसका विकास हुआ है। उनके इसी जीवशास्त्रीय मत के आधार पर विकास के बारे मे स्पेंसर ने कहा है कि सरलता से जटिलता की ओर, एकता से अनेकता की ओर तथा अव्यवस्था से व्यवस्था की ओर अग्रसर होने का प्रक्रम ही विकास है। ना केवल जीवों का बल्कि विचारो का भी विकास ऐसा ही होता है। सुखवादियों की भांति स्पेंसर ने भी सुख को स्वतःसाध्य शुभ और परम ध्येय मानते है।
मनुष्य का जीवन जितना अधिक सुखद या दुखद होता है उसे उतना ही शुभ या अशुभ कहा जा सकता है। सुखवाद के आधार पर ही जीवन की वांक्षनीयता की व्याख्या करते हुए कहते है कि जीवन सुख प्रदान करने अथवा ना प्रदान करने के कारण ही शुभ या अशुभ है। मूर के शब्दों में 'स्पेंसर का मुख्य सिद्धांत यह है कि सुख ही एक मात्र शुभ है और विकास की दिशा को समझना सुख को अधिक से अधिक प्राप्त करने का सर्वोच्च उपाय है। स्पेंसर के विचार में सुख द्वारा ही समस्त नैतिक नियमों का निर्माण और विकास निर्धारित होता है। जिन नैतिक नियमों के परिणाम स्वरूप व्यक्ति तथा समाज को सुख प्राप्त होता है उन्हें हम स्वीकार करते है और बनाए रखते है। वातावरण के साथ मनुष्य के समायोजन की प्रक्रिया विकास के प्रक्रम तथा जीवन की रक्षा एंव वृद्धि का लक्षण है। स्पेंसर का मत है कि जब तक मानव समाज विकास की अंतिम स्थिति तक नही पहुचता जो पूर्ण सामंजस्य की स्थिति है तब तक वह सापेक्ष नैतिकता के नियमों द्वारा शासित होता है। अपूर्ण विकास के कारण ही समाज के सदस्यों मे परस्पर विरोध उत्पन्न होता है जिसे समाप्त करने के लिए नैतिक नियमो की आवश्यकता पडती है। समाज के विकास के साथ साथ इन नैतिक नियमो की आवश्यकता कम होती जाती है और व्यक्ति तथा सामाजिक वातावरण में पूर्ण सामंजस्य की स्थिति में ये नैतिक नियम नितांत अनावश्यक हो जाते है। इस स्थिति में व्यक्तियों का पारस्परिक विरोध समाप्त हो जाता है और प्रत्येक व्यक्ति समाज के हित मे ही अपना हित देखने लगता है। ऐसी स्थिति मे मनुष्य कर्तव्य भावना तथा अन्य नैतिक नियमों से बाध्य होकर नही अपितु स्वतः केवल सामाजिक हित के लिए कार्य करता है और ऐसा करने से उसे आनन्द प्राप्त होता है। इसी कारण विकास की इस अंतिम स्थिति में उन नैतिक नियमो की आवश्यकता नही रह जाती जो समाज के अपूर्ण विकास की स्थिति मे आवश्यक माने जाते है। वस्तुतः स्पेंसर ने विकास की अंतिम स्थिति मे ऐसे आदर्श मानव समाज की कल्पना की है जो पूर्णतः पारस्परिक सहयोग एंव सद्भावना पर आधारित है और जिसमे किसी प्रकार का विरोध तथा संघर्ष विद्यमान नही है। इस आदर्श मानव समाज से सम्बंधित नैतिकता को ही उन्होंने निरपेक्ष नैतिकता की संज्ञा दी है।
स्पेंसर ने स्वंय स्वीकार किया है कि यह निरपेक्ष नैतिकता एक आदर्श मात्र है और इसका वर्तमान वास्तविक जगत से सम्बंधित नही है जो अब भी अपूर्ण विकास की स्थिति मे है। परंतु धीरे धीरे मानव का विकास हो रहा है और वह कभी ना कभी पूर्ण सामंजस्य की उस स्थिति तक पहुँचेगा जो विकास का अंतिम ध्येय है। स्पेंसर जीवन मे स्वार्थ और परोपकार दोनो को समान महत्व देते है। मनुष्य का विकास ही कुछ इस प्रकार हुआ है कि उसे अपने हित के साथ साथ समाज के हित का भी ध्यान रखना पड़ता है जिसमें वह जीवन व्यतीत करता है। विकास क्रम मे जैविक दृष्टि से प्रत्येक प्राणी के जीवन मे स्वार्थ का स्थान सबसे ऊपर है। इस स्वाभाविक स्वार्थमूलक प्रवृति के कारण ही वह प्रत्येक परिस्थिति मे आत्मरक्षा करता है और विश्व मे अपना अस्तित्व बनाए रखने तथा विकसित होने के लिए निरंतर प्रयास करता है। यदि मनुष्य मे यह स्वार्थमूलक प्रवृत्ति ना हो तो उसके लिए जीवित रहना और विकास करना असम्भव है। इसी कारण स्पेंसर मनुष्य की स्वाभाविक स्पेंसर मनुष्य की स्वाभाविक स्वार्थवृति को आवश्यक मानते है। वे आगे कहते है कि मनुष्य केवल स्वार्थी नही है वह दूसरो के लिए अपने सुख का त्याग करता है। जैसे माता-पिता अपने सुख की चिंता किए बिना संतान के समुचित पालन पोषण तथा सम्पूर्ण विकास के लिए निरंतर प्रयत्न रहते है। मनुष्य की भांति अन्य प्राणियों मे भी अपने संतान के लिए आत्मत्याग की स्वाभाविक प्रवृत्ति पाई जाती है। मनुष्य मे पाई जाने वाली उक्त परोपकारवृति उतनी ही स्वाभाविक और वांक्षनीय है जितनी उसकी स्वार्थवृति।
स्पेंसर का मत है की स्वार्थ और परोपकार दोनो ही मानवजाति के अनिवार्य अंग है और इनमे कोई वास्तविक विरोध नही है। मानव जाति के पूर्ण विकास के लिए मनुष्य के जीवन मे स्वार्थ और परोपकार दोनो का समुचित समन्वय बहुत आवश्यक है।
अरविंद कुमार ।
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