शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति मानसिक दुःखों को जन्म देते हैं।

खाली पेट और खाली जेब दुनिया की बेहतरीन पाठ पढ़ाते हैं। इन दोनों स्थितियों को धारण करके, यदि हम बाजार का एक चक्कर लगायें तो हमें इस बात का ज्ञान होगा कि हम क्या हैं? हमारी वास्तविकता क्या है? और आवश्यकताएं हमें कितना कमजोर बनाती हैं। 

मनुष्य की चार मूलभूत आवश्यकताएं हैं - भूख, प्यास, नींद और सेक्स, इनके बगैर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। आदिम अवस्था में हमारे पूर्वजों की सबसे बड़ी आवश्यकताएं यही चार थी। निवास का स्थान उतना बड़ी जरूरत नहीं थी क्योंकि कहीं भी कंदराओं व गुफाओं में वे रह लेते थे। स्थूल शरीर की मूलभूत आवश्यकताएं जब तक पूरी नहीं हो जाती है; मनुष्य की जीवन इसी परिधि पर चक्कर लगाता रहता है। पुरापाषाणकाल से लेकर प्राचीन विकसित सभ्यताओं के उदय तक उदरपूर्ति एक प्रमुख विषय रहा और आज भी यही एक प्रमुख विषय है। ध्यातव्य है कि, पशु की भी यही चार मूलभूत आवश्यकताएं हैं। जानवर और मनुष्य में अंतर यही है कि हम इन शारीरिक आवश्यकताओं का उपभोग करते हुए विचार कर सकते हैं जबकि जानवर नहीं। हम यह विचार कर सकते हैं कि क्या खाएं? कितना खाएं और कब कब खाएं - शरीर पर भोजन का क्या प्रभाव होता है? ऐसे हजारों सवालों से हम स्वयं को घेर सकते हैं।

यदि आप उस भिखारी की कल्पना करें, जिसने चंद सिक्कों के लिए आपके सामने हाथ फैलाया होगा और आपने उसे नजरंदाज कर दिया होगा- तनिक एक पल रूककर उसके स्थिति पर विचार नहीं किया होगा। परंतु यह जान लेना जरूरी है - किसी के सामने हाथ फैलाना, जीवन का बहुत कठिन कार्य है; इसमें आत्मसम्मान, आत्मगौरव की कुर्बानी देनी पड़ती है। जो कि वह भिखारी करता है। शरीर की आवश्यकताएं व्यक्ति को बहुत निचले स्तर पर ले जाती है - वहां किसी भी प्रकार के मानवीय मूल्यों की कोई अहमियत नहीं होती है। भूखा व्यक्ति सबसे ज़्यादा लाचार और दया के योग्य होता है। इन्हीं परिस्थितियों में, आदमी अपराध की तरफ भी कदम बढ़ाता है। शरीर की जरूरतें जब तक पूरी नहीं होती हैं मनुष्य एक सभ्य समाज का सभ्य नागरिक नहीं बन सकता है और इस स्थिति में शिक्षा, शरीर व आत्मा की उन्नति, आध्यात्म, इंसानियत की कल्पनाएं सब गौण या सेकेंडरी हो जाती है। अनाथालय, वृद्धा आश्रम आदि सब शरीर की जरूरतों को ही पूरा कर रहे हैं। इन ज़रूरतों में सेक्स की इच्छा तब तक नहीं होगी जब तक भूख, प्यास व नींद पूरी ना हो तथा कुछ संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित ना हो। कुछ विचारक सेक्स को उच्च प्राथमिकता देते हैं और वे इसे शरीर की मूलभूत जरूरतों से जोड़कर नहीं देखते है। इन ज़रूरतों का पूरा ना हो पाने की स्थिति में, आदमी का भूख व प्यास से मरना तथा जनन की प्रक्रिया (सेक्स के अभाव में) से वंचित रहने के कारण अपने संतति को आगे ना बढ़ा पाना शामिल है। सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने प्राण को संलेखना पद्धति से त्यागा जिसमें वे भूख से मरे। 

शरीर की जरूरतें जैसे ही पूरी होती है - कुछ राशन कुछ महीनों के लिए एकत्रित हो जाता है और आय का साधन स्थायी हो जाता है तो आदमी परिवार, दोस्त, समाज, पति-पत्नी आदि के बीच रहते हुए- वह मानसिक दुःखों की तरफ पलायन करता है। और यह स्थिति बहुत घातक व खतरनाक हो जाती है। व्यक्ति में मनोविकार बहुत तीव्रता से अपना घर बना लेते हैं जो इसे सुख व दुख का अहसास कराते हैं। व्यक्ति में सम्मान पाने, जीतने, आत्मगौरव, पद प्रतिष्ठा, सम्पत्ति का मालिक बनने जैसी की असंख्य इच्छाएं अकस्मात ही जन्म लेती रहती है। इंसान आत्मा परमात्मा, कला विज्ञान, नैतिकता की शिक्षाएं, कविताएं - कहानियां जैसे अनुसंधान तभी कर पाता है जब उसका पेट भरा होता है। अजंता और एलोरा की गुफाओं में बने चित्र - पेट भरने की उच्च संकेत देते हैं। प्रेम पाने व करने की इच्छा, पहचाने जाने की इच्छा, कुछ अलग कर देने की इच्छा व्यक्ति में जन्म लेती रहती है और इन इच्छाओं का पूरा होना और दूसरी इच्छा को जन्म देता है और फिर गहरा मानसिक अवसाद के पल आते हैं। जिसमें झुंझलाहट, घबराहट, चिड़चिड़ापन, क्रोध से व्यक्ति ग्रसित हो जाता है। संसाधनों से सम्पन्न होना- व्यक्ति की मूलभूत शारीरिक व मन से उत्पन्न जरूरतों को एक तरफ पूरा तो करते हैं लेकिन दूसरी तरफ उससे मानसिक शांति छीन लेते हैं और मानसिक अवसाद की तरफ लेकर चलते जाते हैं। 

बहुत से लोग सम्मान ना मिलने के कारण स्वयं का अपमान होता देख नौकरियों से इस्तीफ़ा देते हुए देखे जा सकते हैं। व्यक्ति का किसी विशेष व्यक्ति से प्रेम ना मिलने के कारण उसमें ईर्ष्या, आत्मग्लानि व कुंठा जैसे भाव उसके मन में भर जाते हैं। प्रेमी या प्रेमिका से अलग होने या बिछड़ने की स्थिति में जो कुछ खो जाने का दर्द होता है- उसकी मार असहनीय होती है। भरत ने 14 वर्ष भाई वियोग का मानसिक दर्द सहा और वो भी तब जब समस्त अयोध्या के एकमात्र कार्यवाहक शासक थे। गौतम सिद्धार्थ युवराज थे और अगले शासक होने वाले थे किन्तु मानसिक शांति के लिए; उन्होने सत्ता का त्याग कर दिया। यह सब स्थितियां व्यक्ति को असीम मानसिक दुख देते हैं जिनकी पीड़ा असहनीय होती है और यह हेडेक, एंजाइटी, माइग्रेन जैसे लक्षण भी दिखाता है। 

स्पष्टतः दोनों स्थितियों में; व्यक्ति को आत्मसंयम, आत्मसंतुष्टि व मध्यम मार्ग अपनाने की जरुरत होती है। और यह भी जान लेना चाहिए कि प्रसन्नता किसी व्यक्ति, वस्तु या पद, प्रतिष्ठा, सम्पत्ति को पा लेने से नहीं मिलती है। संसार में कोई भी इंसान प्रसन्न नहीं है क्योंकि प्रसन्नता मन की स्थिति है - यह मस्तिष्क व मन की शांति तथा आत्मा की उन्नति से प्राप्ति होती है। 

✍️ अरविंद कुमार। 

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