जीवन को खंडित रूप में देखना।
सारा जीवन इसी पाश्चाताप में व्यतीत हो जाता है कि बात को बढ़ने से जब रोका जा सकता था तब हम रोकते नहीं और जब बात आगे बढ़ चुकी होती है तो हम उसके संत्रास व पीड़ा से ग्रसित हो उठते हैं। जीवन में समस्त दुःखों के कारण, हम स्वयं होते हैं। हम ऐसे मित्र बनाते हैं, जो हमारे पतन के लिए ज़िम्मेदार होते हैं। दोहरा जीवन - कभी कभार तो इसलिए भी हम जीते हैं क्योंकि हमें दूसरों को प्रसन्न करना होता है। जब स्वयं में आत्मविश्वास की कमी होती है और जीवन की व्यक्तिगत कठिनाइयों से लड़ पाने में हम खुद को सक्षम नहीं समझते तो हमारा क्षुकाव और निर्भरता दूसरे व्यक्ति की तरफ होने लगता है। इन निर्भरताओं में सबसे अधिक पीड़ादायक भावनात्मक निर्भरता है। जब हम दूसरे की खुशी से खुश और दुःखों से दुखी होने लगते हैं। हम जीवन के उन महान सत्यों और दुःखों को अपनाने से भागते हैं, जिनका होना सतप्रतिशत तय है। उदाहरणार्थ - मृत्यु। मौत एक अटल सत्य है लेकिन इसका गहरा दुख जो सगे सम्बन्धीयों को होता है; वे इसी दुख से भागते है और इसे अंगीकार नहीं करना चाहतें। जैसे - माता-पिता अपने बच्चों से परछाई की चिपके रहना चाहते हैं और उनके जीवन पर नियंत्रण स्थापित कर लेना चाहते हैं। जो कभी कभार पीढ़ी संघर्ष और मूल्यों की टकराहट के रूप में सामने आता है। किसी भी सजीव या निर्जीव वस्तु से अधिक भावनात्मक लगाव संताप को जन्म देगी। क्योंकि हम यह मान बैठते हैं कि जो कुछ अभी है, वह हमेशा के लिए है। यह संसार क्षणिक व अस्थाई है - यहां सबकुछ कुछ पल के लिए है। तथा सबकुछ समाप्त हो जाने वाला है।
हम जीते हैं क्योंकि मरने की हममें साहस नहीं है। साधारणतया आदमी की जिंदगी क्या है? कुछ टूटें फूटे सपने, अतीत का खंडहर, भविष्य की कल्पनाएं। आदमी का चले जाना क्या है? कुछ पक्का पता नहीं, कहा जा रहे हैं। साहिर का एक गीत है - ' ना कोई ज़्यादा ना कोई मंजिल ना रोशनी का सुराग, भटक रही है जिंदगी खलाओ में मेरी '। ऐसी ही मनुष्य की स्थिति है - सदा से। सत्य बहुत कड़वा है; सत्य के साथ खड़े होने पर भी हम सत्य के साथ खड़े ना हो पाएंगे। सिग्मंड फ्रायड ने कहा है कि- बिना झूठ के हम जीवन ही नहीं जी सकते हैं। झूठ एक सहारा है और झूठी मंजिलों के ताक में दौड़ते हैं। पद, प्रतिष्ठा, धन सम्पदा और उसके बाद संन्यास, मोक्ष, ईश्वर - सब भ्रम और झूठी कल्पनाएं हैं। जिंदगी तो केवल सत्य के साथ उपलब्ध होती है लेकिन जो सत्य जीवन से गुजर गया वह झूठ है। हमारे चारों तरफ सोये हुए लोगों की भीड़ है यदि यहां कोई जागा तो लोग उसके खिलाफ हो जाते हैं। जीसस को सूली पर चढ़ा दिया गया, मंसूर को दर्दनाक मौत दी गई, सुकरात को जहर का प्याला थमा दिया गया। वैर से वैर को, नफरत से नफ़रत को समाप्त नहीं किया जा सकता है- यह तो प्रेम से समाप्त किया जा सकता है।
यदि हम थोड़ा सोचे भी तो कौन हमें दुख देता है और कौन हमें सुख देता है - यह सब हमारे मन का हिसाब है। अभी घड़ी भर पहले जो बात सुख देती है, घड़ी भर बाद दुख देने लगेगी। हमारी व्याख्या, कैसे उस बात को हम रंग व रूप देते हैं - हमारे ऊपर निर्भर करता है। कोई भी हमें सुख व दुख नहीं देता है। प्रेम का संयोग सुख देता है तो इसी प्रेम का वियोग ह्रदय को दुख से भर देते हैं। यह संसार एक प्रतिध्वनि है, इसमें अपनी ही आवाजें रिवर्स मोड पर सुनाई देती है। जो हम फेंकते हैं, बोते हैं - वहीं काटते हैं। दूसरों को दुख देकर कभी भी सुख नहीं प्राप्त किया जा सकता है, दूसरों को पीड़ा पहुंचाकर कभी भी आनन्द की प्राप्ति नहीं हो सकती है। दूसरों के ह्रदयों में हमारे लिए शुभ इच्छाएं, आनन्द की कामनाएं - प्रसन्नता की तरफ ले जाती है। हमारा स्वर्ग अभी और यही है - यह संसार एक रैन-बसेरों है, यहां से चले जाना है। हमारे लगाव, रिश्ते सब क्षणिक है। हमसे पहले ना जाने कितने लोग चले गये- वैज्ञानिक कहते हैं कि हर आदमी दस दस आदमीयों के लाश के ऊपर बैठा है। हमारा यहा रहना पत्तियों पर विद्यमान ओश की बूंदों की तरह है। अब गिरे तब गिरे।
हमारा मन ही एकमात्र सवाल है; मन से जागना आत्मा को परमात्मा के पास ले जाना है।
अरविंद कुमार।
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