बेघास की उजली जमीन ।

कभी कभी मैं बहती धारा के विलोम में चलने का प्रयास करता हूं। उन धाराओं को अपनी बांहों में जकड़कर, मैं उन्हें पूरा तोड़ देना चाहता हूं। मैं स्वयं को भी तोड़ता हूं - एक सीमा से ज्यादा तोड़ता हूं और मैं उस राक्षस को असहाय अवस्था में देखना चाहता हूं। 

मैं अक्सर उन लोगों से बचने का प्रयास करता हूं, उनकी बातों पर यकीन करने से बचता हूं - जो जीवन को ऊपरी तौर पर जीना जानते हैं। जीवन को गहराई में जीना और महसूस करना किसी त्रासदी से कम नहीं है। उसके वायदों, उसके कसमों पर मुझे कभी भरोसा नहीं हुआ और शुरू में अंत जानते हुए - मैंने अंत किसी दूसरी दिशा में करने का प्रयास किया लेकिन अंत वैसा ही हुआ जैसा मैंने सोचा था, जैसा मुझे आरम्भ में पता था। मैं उसे देखता हूं - उसकी झुठी हंसी और मुस्कुराहटों में सिमटा हुआ दर्द; मैं महसूस करता हूं। उसका मुझे यूं दिखाना कि मैं तुम्हारे बगैर भी खुश हूं - इस बात का परिचायक है कि कितने दुःखों से वह छटपटा रही है। जी चाहता है, उस थकी हारी, पारजिता को - बांहों में भरकर, उसके माथे को चूम कर - यह कह दूं कि नहीं तुम अकेली नहीं हो, मैं हूं तुम्हारे साथ। मुझे पता है, उसने अपने मन और आत्मा की आवाज में से मन को ही सुना है।

उन रात के अंधेरों में कुछ दिन साथ मे चलते हुए, उसने मुझमें और मैंने उसमें एक दूसरे के लिए कुछ सच्चाईयां एक दूसरे की आंखों में देखी थीं। आह! कितनी कमजोर पड़ गई है; जिंदगी इतनी बेरहम क्यों हो जाती है कभी कभी? जिंदगी में क्यों हम अहंकार धारण करते हैं और क्यों उन खुशियों का गला हम स्वयं ही घोंट देते हैं - जहां से ह्रदय को अद्भुत सुख-चैन मिल रहा होता है। बात बहुत सी छोटी सी है लेकिन मौका पाते ही दिमाग पकड़ लेती है, मुझे मेहनत करना बहुत पसंद है और करते करते उसी में खो जाना बहुत पसंद है। मैंने उसमें हमेशा परमात्मा का दर्शन किया, जैसे हमेशा उसने मुझे अनगिनत कष्टों से बचाया और फिर उसका आंखों में सम्मान भरकर प्रस्तुत होना; मुझे याद आता है। आह! कितना आनंद और सुख था। उसने मुझे बहुत...

आखिर, मनुष्य क्यों नहीं उन वस्तुओं या चीजों का सम्मान करता है, कद्र करता है जो उसके पास होता है और जब वह छूट जाता है तो उसके चले जाने के ग़म में हम जीवन भर दुखी होते हैं। आज, मैं अचेतन की एक आवेगमयी इच्छा से लडता हूं। सुबह की निष्करूण, क्रूर प्रसन्नता का सुख सांझ तक धीरे-धीरे अनजाने ही एक अजीब अवसाद में बदलता चला जाता है। नहीं, वह मुझसे दूर नहीं गयी है, मैंने ही उसे दूर कर दिया स्वयं से। क्या करूं, मैं खुश जो रहने लग गया था। जैसे मैंने उसे पहाड़ की चोटी पर अकेला छोड़ दिया है और वह कितनी कमजोर पड़ गयी है। नहीं, अब उस हारी-थकी, टूटी प्रौढ़ा का सामना करने का साहस भी मुझमें नहीं है। और पता नही क्यों, उसके साथ होने से ज्यादा सुख उसके साथ ना होने में है। और अब वह 'वह' रह भी नहीं गयी है...! मैं थककर टूक टूक हो रहा हूं। पलभर कहीं बैठना चाहता हूं और कुछ पल सबकुछ बाहर का ही देखना चाहता हूं और मैं अपनी पुस्तकों से लदी मेज की ओर निगाह करता हूं, कुर्सी पर बैठता हूं और खो जाता हूं - एक नीरस दुनिया में। 

अरविंद कुमार। 

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