दुखों का विरेचन (Catharsis) - 01
दुख के पलों में हम भागना चाहते हैं - कोई असहनीय पीड़ा जब आन पड़ती है तब हम लोगों से कटकर कमरा बंद करके अकेले होना चाहते हैं और इन्ही पलों में दुखी व्यक्ति आत्मघात भी कर लेता है। आनन्द, जो सुख और दुख से ऊपर की अवस्था है; उसमें हम प्रफुल्लित होकर प्रसन्नता को बांटना चाहते हैं। हमारी प्रसन्नता हमसे अकेले सम्हाली नहीं जाती है - उसे दो लोगों के साथ हमें बांटकर जो प्रसन्नता प्राप्त होती है; वह पिछली मिली प्रसन्नता की तुलना में चार गुना ज्यादा होता है। हम देते है वहीं है जो हमारे पास होता है। दुखों को सुखों की प्राप्ति हेतु या उन्हीं दुःखों पर और गहरे दुःखों की उपस्थिति करा देना ही दुःखों का विरेचन है।
संसार में दो प्रेमियों से ज्यादा दुखी कोई नजर नहीं आता है। रति मनुष्य का वह स्थायी भाव है जो अपने से ज्यादा किसी दूसरे व्यक्ति में सुख, प्रसन्नता और आनन्द का आभास कराता है; जहा एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को पाने की इच्छाएं करने लगता है। दो लोगों में पनपा नया प्रेम कुछ नकारात्मक मनोविकारों को जन्म देता है। प्रेमी एक दूसरे पर आधिपत्य कर लेना चाहते हैं, एक दूसरे को बांध लेना चाहते हैं; यही से ईर्ष्या की उत्पति होती है। दस में से नौ मौकों पर वे दुखी ही रहते हैं - कोई एक क्षण प्रसन्नता का उनके जीवन में आता है जब वे एक-दूसरे में सुख पा रहे होते हैं। प्रेम का यह दृश्यात्मक क्षुद्र रूप है। प्रेम का वास्तविक अर्थ है- स्वतंत्र छोड़ देना। परतंत्रता या आधिपत्य में प्रेम मुरझाने लगता है, जिससे भी प्रेम हो; उसे स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए क्योंकि स्वतंत्रता में ही प्रेम दिनों-दिन ऊर्ध्वाधर उन्नति करता है, प्रेम और अधिक गहरा होता है। वह मनुष्य जिसके लिए आपके भीतर प्रेम का उत्कर्ष हुआ है, वह स्वयं में एक स्वतंत्र मनुष्य है और किसी को अधिकार नहीं है कि वह किसी दूसरे मानव को परतंत्रता में रखें, बिना किसी अपेक्षा या उम्मीद के केवल देने का भाव मन में होना चाहिए।
प्रेमियों में प्रेम पैरों में बंधन की तरह नही होना चाहिए; वह खुले आसमान में चिड़िया की तरह होनी चाहिए। प्रेम में आकर, दो लोगों को ऐसा महसूस हो कि उनका जीवन पहले की तुलना और अधिक रसात्मक हो गया है, उसमें और अधिक आनन्द भर गया है- जिंदगी कुमुदिनी और चमेली की पुष्पों की तरह अधिक सुगंधित और आकर्षक हो जाए। इन्हीं दो प्रेमियों के जीवन में दुख के कुछ पल विशद रुप में आते हैं। जैसे- ईर्ष्या, वियोग से उठा दर्द, नाराजगी के पल और रिश्ता समाप्त होने या बिछड़ने की घटनाओं से उठा दर्द - यह दुख इतना पीड़ा से प्रेमियों को भर देता है कि उनका पूरा जीवन तिनके के दाने की तरह कमजोर पड़ जाता है। ऐसा जान पड़ता है जैसे शरीर का मांस कोई धारदार चाकू से हल्के हल्के काट रहा है, फेफड़ों में आक्सीजन जाता ही नही और आसपास का वातावरण जैसे जिंदा चबा जाने को दौड़ता है। दुख के यह पल बहुत भयानक होते हैं और समय ही इस दर्द से छुटकारा दिलाता है परंतु समय इन पलों में काटे नहीं कटता है - लेकिन इन दुःखों को सहना अनिवार्य होता है और प्रत्येक को ऐसे दुःखों से गुजरना चाहिए। इन दुःखों को सुख की प्राप्ति की तरफ मोड़ा जाता है, जैसे ही बादल छंटते है, प्रसन्नता का धूप चारों तरफ हमें नयी ऊर्जा व उत्साह से भर देता है। जीवन में जिस मनुष्य के लिए प्रेमी-प्रेमिका दर्द से छटपटा रहे थे; फिर उसके सामने से गुजर जाने पर भी शायद ही कोई फर्क पड़ता हो।
एरिक फ्रॉम अपनी पुस्तक 'द आर्ट ऑफ लविंग' में लिखते हैं कि पिता का प्यार लेन देन व स्वार्थ पर आधारित प्रेम होता है। जबकि वहीं माता का प्यार नि: स्वार्थ और भावनात्मक होता है। भारतीय माता-पिता और उनके बच्चों में पीढ़ी संघर्ष आमतौर पर सामान्य घटना है। माता-पिता अपने बच्चों के जीवन पर नियंत्रण स्थापित करना चाहते हैं, उनका अपने बच्चों के लिए प्रेम आधिपत्य व परतंत्रता को जन्म देता है जिसके कारण बच्चे अपने ही माता पिता से दूर भागते नजर आते हैं। एक 75 साल का पिता भी अपने 50 साल के पुत्र के जीवन में दख़ल देने से बाज नहीं आता है। यह संघर्ष सामान्यतः रूढ़िवादी और आधुनिक जीवनशैली पर भी आधारित होता है। आज के किशोरों में जहां दोस्त, सोशल मीडिया, पार्टी करना, देर रात तक जागना, खाने पीने के नये खाद्य पदार्थ, वस्त्रों और फैशनों की नयी प्रकार शामिल हो रहे हैं तो इसके बजाय माता पिता इसमें गुणात्मक परिवर्तन लायें, वे इसके पूर्णतः खिलाफ हो जाते हैं और बच्चों को गलत सिद्ध करने पर तुल जाते हैं। यह सवाल विचारणीय है कि प्रत्येक नई पीढ़ी के साथ कुछ नये परिवर्तन, नये परिस्थितियां भी जन्म लेती है लेकिन पुरानी पीढ़ी अपने पूर्वाग्रहों के चलते, स्वयं को सही सिद्ध करने के चलते - अपने सामने आए नये पीढ़ी के मूल्यों को अपनाने से नकार क्यों देती है? मजे की बात यह है कि उन्होंने भी अपने माता-पिता से कुछ अपने नये मांगों के लिए संघर्ष किया होगा और उनके माता-पिता अपने माता-पिता से। किसी माता-पिता को चाहिए कि उन्हें यदि अपने बच्चों के लिए असुरक्षा की भावना है या जो भी चिंताएं हैं, अपने बच्चों से खुलकर बात करें - उनके दोस्त बनने का प्रयास करें; पीढ़ी अंतराल को समाप्त करने का प्रयास करें। एक बच्चा या किशोर अपने जीवन में बहुत दुःखों व परेशानियों से गुजरता है। वह शरीर में हो रहे हार्मोन्स के कारण परिवर्तनों से परेशान होता है। ऐसे में यदि माता-पिता अपने बच्चों के दोस्त बनते हैं तो वह बच्चा अपने माता-पिता के और अधिक नजदीक होगा जिससे यह प्रेम सच्चे अर्थों में कुछ उन्नति लाएगा। अन्यथा माता-पिता मानसिक पीड़ा से ग्रसित होंगे और बच्चा स्वतंत्रता व ज्ञान के अभाव में स्वयं को दुखी करता जाएगा।
प्रेम अपने स्वतंत्रता में ही गहरा होता है; परतंत्रता में प्रेम मरने लगता है। किसी के लिए भी प्रेम हो- इसका उद्देश्य देना होना चाहिए, बिना किसी अपेक्षा या उम्मीद के। और आप पायेंगे यही प्रेम आपके जीवन को खुबसूरत बनाएगा, प्रसन्नता को अधिक सारगर्भित रुप में जीवन को रसात्मकता से भर देगा। जीवन में प्रेम से दुख मन के नकारात्मक मनोविकारों से पैदा होते हैं और इनका विरेचन और समाधान ज्ञान से, सुखों की झलक पाने या उन्हीं दुःखों पर दूसरे प्रकार के दुःखों को थोप देने से होता है।
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{ आलेख व्यक्तिगत अनुभवों और सामाजिक अनुसंधान पर आधारित है। कमेंट बाक्स में, अपने तर्क वितर्क करें }
अरविंद कुमार।
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