ज्ञान मार्ग - अद्वैतवाद।
ब्रह्म और आत्मा एक है, यह दो नहीं है। ब्रह्म को हम देख नहीं सकते हैं लेकिन जिस ईश्वर की कल्पना हम करते हैं - असल में वह ईश्वर ब्रह्म का ही सगुण रूप है। आत्मा ब्रह्म का प्रतिबिम्ब है जो शरीर पा जाने के कारण अपने मूल स्वरुप को भूल गया है। और जगत ब्रह्म का आभास मात्र है! यही शंकराचार्य का अद्वैतवाद है जो केवल निर्गुण ब्रह्म को स्वीकार्य करता है।
यह जगत मिथ्या है- मिथ्या का अर्थ ना तो सत्य है और ना असत्य। सत्य वह होता है जिसका कभी खंडन ना किया जा सकें जैसे पारमार्थिक रूप से ब्रह्म या आत्मा है- आत्मा की उपस्थिति को हम सब महसूस कर सकते हैं। और असत्य वह होता है - जिसका कभी ज्ञान न हो, जैसे कोई त्रिभुजाकार वृत्त। मिथ्या एक अलग अवस्था है, जिसका कभी ज्ञान हो और कभी खंडन भी किया जा सकें। जैसे - रात के अंधेरे में अकस्मात आपने सांप देख लिया और आपका शरीर भय से कांपने लग गया लेकिन इतने में किसी ने पीछे से प्रकाश की लौ जलाई और आपने देखा कि वह सांप नहीं, एक रस्सी है। अब आप इसे क्या कहेंगे - यह ना तो सत्य है और ना ही असत्य। वैसे ही यह जगत है, जो व्यवहारिक रूप में दिखाई देता है लेकिन हम आभासिक रूप से यहां जी रहे होते हैं। जैसे, जगत में कोई भी व्यक्ति प्रसन्न नहीं है - चाहे वह कितना ही अमीर हो, खुबसूरत हो या किसी देश का प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति हो लेकिन हम यह मान लेते हैं कि वह प्रसन्न हैं और मैं नहीं प्रसन्न हूं। ऐसा मानना केवल और केवल आभासिक प्रतिक्रिया है और यह मानना कि मैं प्रसन्न नहीं हूं - इस जगत के भ्रम होने का प्रतीक है क्योंकि आपका प्रसन्न होना आपके मन की स्थिति की अवस्था है। यह किसी वस्तु या व्यक्ति की प्राप्ति से नहीं आयेगी, यदि ऐसा होता तो आखिर क्यों जिस वस्तु से कुछ देर पहले प्रसन्नता मिली थी दूसरे ही पल उससे विरक्ति या नफरत मन में भर जाती है?
यह संसार स्वप्न है और भ्रम है। प्रकाश की किरणें किसी वस्तु पर पड़ती है तो ही वह हमारी आंखों को दिखाई देता है। अंधकार सबकुछ हमारी आंखों के सामने शून्य कर देता है। ब्रह्माण्ड के अरबवें हिस्से का अरबवां और उस अरबवें हिस्से का अरबवां हिस्सा भी हमारी आंखे नहीं देख पाती है। व्यक्ति का अपनी आंखों से ब्रह्माण्ड को देखना संभव है किंतु बहुत कम स्तर पर, बहुत कम मात्रा में। जैसी कोई वस्तु हमारी आंखों के बिल्कुल पास सटा दी जाएं और उसका सुक्ष्म बिंदु ही हम देख पायेंगे। प्रकाश सबकुछ हमारी आंखों को दृश्यमान बनाता है और ना हो तो सबकुछ भ्रम हो जाता है - उस वस्तु का महत्व हमारे लिए शून्य हो जाता है। जैसे अंधेरे कमरे में यदि बहुत सी वस्तुएं रखी हो तो हमारी लिए उनका तब तक कोई महत्व नहीं है जबतक कि प्रकाश उन वस्तुओं पर ना पड़े। आज जो चीजें आपको सुख देती है; वहीं चीजें कल आपको दुख भी देंगी। अगर एक वस्तु या व्यक्ति से सुख अथवा दुख मिल रहा है तो हमेशा के लिए वह सुख या दुख स्थायी क्यों नहीं हो जाता है? यदि एक व्यक्ति हमें खुबसूरत लगता है तो दूसरे ही पलों में हमें उसकी खुबसूरती से नफ़रत क्यों हो जाती है? किसी से सुख मिलना या दुख मिलना- यह केवल एक भ्रम है, हम ऐसा चाह रहे होते हैं इसलिए वह अनुभूति हम कर पाते हैं। सूर्य की प्रकाश की किरणें जो हम तक पहुंचती है - वह 8 मिनट 22 सेकंड में पहुंचती है अर्थात हम सूर्य का प्रकाश का वर्तमान प्रकाश नहीं प्राप्त कर रहे हैं, वह अतीत का प्रकाश हमें मिल रहा होता है जिसका सीधा सा मतलब यह भी है कि यदि सूर्य अपने केंद्र से विलुप्त हो जाए तो इसका पता हमें 8 मिनट बाद चलेगा।
जैसे हम सपना देखते हैं और सपने में जीता हुआ जीवन हमें पूर्णतः सत्य प्रतीत होता है लेकिन जैसे ही आंखें खुलती हैं तो हमें याद आता है कि हम सपना देख रहे थे लेकिन वह जगत तो सत्य प्रतीत हो रहा था और आंखें खुली तो सबकुछ भ्रम हो गया। वैसे ही यह जगत भी एक भ्रम है, हम सबको ब्रह्म का ज्ञान नहीं है लेकिन जैसे ही ज्ञान होगा तो भ्रम से छुटकारा मिलेगा और सत्य का आभास होगा। प्रत्येक व्यक्ति के भीतर आत्मा है, जो उसे सद्गुण सिखाती है, उन्नति के नैतिक आदर्शों पर ले जाती है। मन एक तरफ जहां हमें गर्त में ले जाती है तो आत्मा सदैव अच्छी राह व सलाह देकर व्यक्ति को परमात्मा के नजदीक ले जाना चाहती है। जैसे ही आत्मा को 'अहं ब्रह्मास्मि' का ज्ञान होता है तो वह मोक्ष को प्राप्त होता है।
{ बहुत से आलोचक यह मानते हैं कि शंकराचार्य का अद्वैतवाद नागसेन द्वारा लिखित मिलिंद पन्हों के माध्यमिक शून्यवाद से पूर्णतः मेल खाता है और यह अमौलिक है। जबकि दूसरी तरफ यह भी तर्क दिया जाता है कि दो व्यक्तियों में अलग अलग समयों में मौलिक विचार आया होगा। }
अरविंद कुमार।
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