प्रेम की अवधारणात्मक समझ।
प्रेम में संयोग और वियोग के दो पल आते हैं जब प्रेमी एक-दूसरे के सबसे नजदीक रहकर उपजे हुए आनन्द से भाव विभोर होते हैं तो दूसरी स्थिति में वेदनाएं सहते हैं। यह दोनों स्थितियां जब अपने चरम सत्ता को प्राप्त करती हैं तो विनाशकारी हो जाती हैं। प्रेम एक ऐसी भाव है जिसकी व्यंजना हॅंसकर भी की जाती है और रोकर भी; जिसके व्यंजक दीर्घ नि:श्वास और अश्रु भी होते हैं तथा हर्षपुलक और उछल-कूद भी। इसके विस्तृत शासन के भीतर आनन्दात्मक और दुखात्मक दोनों प्रकार के मनोविकार आ जाते हैं। कोई और ऐसा भाव नहीं है जो आलम्बन के रहने पर तो एक प्रकार की मनोवृत्तियां और चेष्टाएं उत्पन्न करें और ना रहने पर बिल्कुल दूसरे प्रकार की।
जीवन की स्थिति समय में है और समय प्रवाह है। प्रवाह में साधु-असाधु, प्रिय-अप्रिय सभी कुछ आता है। प्रवाह का यह क्रम ही सृष्टि और प्रकृति की नित्यता है। जीवन के प्रवाह में एक समय असाधु, अप्रिय अनुभव आया इसलिए उस प्रवाह से विरक्त होकर जीवन की तृषा को तृप्त ना करना केवल हठ है। समस्या किसी मनुष्य के साथ होने में नहीं है; समस्या किसी भी मनुष्य के साथ होने में है। मनुष्यों से लगाव दुख पैदा करता है और बिना लगाव व जुड़ाव की स्थिति उससे भी ज्यादा दुख पैदा करती है। लेकिन प्रत्येक स्थिति में मध्यम मार्ग का विकल्प देखा जा सकता है, जैसे रोग में पथ्य अरूचिकर होने पर भी उपयोगिता के विचार से ग्रहण किया जाता है। मनुष्य वस्तुओं और व्यक्तियों को अपना बतलाकर अपने अहंकार की पुष्टि करता है - अहंकार तब संतुष्ट होता है; जब आधिपत्य पूर्णरूपेण होकर एक प्राधिकार का निर्माण कर देती है। प्रेमी एक दूसरे पर आधिपत्य (possession) कर लेना चाहते हैं। ईर्ष्या या असूया का उत्पन्न होना - आधिपत्य की कमजोर कड़ी को इंगित करता है, यह एक दुखात्मक और नकारात्मक मनोविकार है।
प्रेम मंदिर और कारागार दोनों के दर्शन कराता है। मंदिर का अर्थ है- जब आना है तब आओ और जब जाना है तब जाओ। प्रेम में जब परमात्मा के दर्शन होने लगे तो यहीं प्रेम मंदिर है और यदि भीतर के राक्षस का दर्शन होने लगे तो कारागृह है। हम एक सीढ़ी पर यात्रा करते हैं जिसका एक सिरा परमात्मा के पास है तो दूसरा सिरा पशु के पास है। सामान्यत: प्रेम लोगों को पशु के दर्शन कराता है और लोग प्रेम से डरने लगे हैं। प्रेम जब आधिपत्य बनता है, परिग्रह बनता है - प्रेम ना रहा। प्रेम करने के माध्यम से यदि आप किसी के मालिक बनना चाहों तो दूसरे को आपने गुलाम बना दिया और यह उत्क्रमित होकर आप तक पहुंचती है। एक व्यक्ति स्वयं में एक व्यक्ति हैं, जो पूर्ण रूप से स्वतंत्र है - जिससे भी प्रेम हो उसे मुक्त करना और यह मुक्ति आप तक पहुंचेगी। संसार एक दर्पण है, जिसमें हमें अपना ही चेहरा हजार हजार रूपों में दिखाई देता है - जो हम देते हैं वहीं वापस लौटकर आता है। अगर आधिपत्य करने की इच्छा होगी तो ईर्ष्या जन्मेगा - क्योंकि प्रेमी-प्रेमिका स्वतंत्रता की इच्छा करने लग जाते हैं। स्त्री-पुरुष यदि दूसरे स्त्री-पुरुष से हंसकर बात कर लें तो प्राण कम्पित हो जाते हैं - यह एक मानसिक ग्रंथि भी है और एक दूसरे की संवेदनशीलता को मारना भी है। सामान्यत: एक स्त्री के सौन्दर्य की अनुभूति करना सभी स्त्रीयों के सौंदर्य की प्रशंसा करना हुआ और एक पुरूष के प्रति आकर्षण सभी पुरूषों के प्रति आकर्षण को प्रदर्शित करता है। प्रेम में आने से पहले जीवन जितना सुखी था और आने के बाद इस सुख में ऊर्ध्वाधर उन्नति होनी चाहिए; सुख और आनन्द के पल अधिक से अधिक बढ़ने चाहिए - जो स्वतंत्रता स्थापित करने से ही आती है। प्रेम से पंख नहीं कटना चाहिए - यह पंखों को गति देने वाला होना चाहिए।
मेघाच्छादित आकाश शुष्क जमीन को प्रफुल्लित करते हैं, पक्षियों का कलरव शाम की थकान दूर करने का एक प्रयास होता है; नीड़ का निर्माण विपदाओं का सामना करते हुए करना होता है। पुरूष का प्रेम जितना तीव्रता से ऊपर उठता है, उतनी ही तीव्रता से वह नीचे भी गिरता है। स्त्री का प्रेम ऊपर उठता है तथा दीर्घकालिक स्थिति को प्राप्त करती है। प्रेम की उच्चतम शिखर पर एक पुरूष बच्चा बन जाना चाहता है तो वहीं स्त्री मां बन जाना चाहती है; यह उनकी नियति में है। प्रत्येक पुरूष चाहता है कि उसकी प्रेमिका मां बन जाएं और प्रायः स्त्रियां ऐसा बन जाती है। आस्कर वाइल्ड ने अपने संस्मरणों में लिखा कि धन्यभाग है वे लोग जिन्हें उनकी पसंद की स्त्री नहीं मिली। पसंद एक तात्कालिक उद्वेग होता है जो गहराई में तथ्यों की पड़ताल नहीं कर पाता है। हरित तृण की नोकों पर ओस की बूंदें मोती सदृश प्रतीत होती हैं; रात के अंधेरें में रस्सा सर्प जान पड़ता है।लेकिन क्या ये बूंदें मोती है? जो जीवन में अमृत घोलेंगी और क्या ये रस्सा सर्प है? जो शरीर के नसों में विष का संचार करेंगी?
जिससे प्रेम करिए - उसे स्वतंत्र छोड़िए। प्रेम खिलता है - स्वतंत्रता और मुक्ति के आकाश में। आधिपत्य और ईर्ष्या को बिल्कुल खड़े ना होने दें। कोई अपेक्षा ना करें; हो सकें तो देना - निस्वार्थ भाव से। इस प्रकार प्रेम मंदिर बनेगा और प्रेम अधिक से अधिक गहरा होता जाएगा।
अरविंद कुमार।
( कमेंट बाक्स में, अपने तर्क वितर्क करें)
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