खुरदरापन -2
जीवन की सम्पदा कठिन है। मैं उन गर्तों का अन्वेषण करता हूं जहां कंटीली झाड़ियों के अलावा कुछ नहीं मिलता है। प्रेम पुष्पित पल्लवित होता है - स्वतंत्रता और मुक्ति के आकाश में। जीवन का युद्ध स्वयं में एक महायुद्ध है और इस रण से भागे हुए भगौड़ो को समाज साधु या सन्त कहकर सम्बोधित करता है। सोचता हूं और विचार करता हूं कि जो तन प्यार में उपजता हैं, प्यार में पलता है, वहीं तन प्यार पाकर खिल भी जाता है। मैं बिस्तर में पड़कर, सुबह-शाम की लालिमा प्रकाश नहीं - दोपहर की सफेद बादलों को देखता हूं और मोजे के आकार में कटे उन असंख्य मेघदूतों को देखता हूं; जो जीवन को बदबू से भर दे रहे हैं। मैं समतल दर्पण में अपना चेहरा देखता हूं और माथे पर उभरे लकीरों को देखता हूं - जो मेरे जीवन में आये उन तूफानों के प्रतीक हैं जिनसे जीवन एक धूलकण की भांति पवनों की गोद में अपने अस्तित्व के लिए भीख मांगता नजर आया।
घर छोड़ते समय मां ने आंखों में आंसू भरकर और अपने ऊपर बीते उन सैकड़ों दुःखों के निचोड़ को जैसे आंसुओं में पिरो दिया हो और मुझसे मां ने कहा था कि, बेटा सम्हाल लेना। मैंने उस समय इन तीन शब्दों की गहराई को नहीं समझा था और आज जितना समझता जाता हूं - जीवन कंटीली तारों में फंसता जाता है। मैंने उसे मुझे छोड़कर बहुत तेजी से जाते हुए देखा, ऐसा लगा जैसे ऐसा वह हमेशा से करना चाहती थी - मैं आंखों में आंसू भरकर उसे देखता रह गया। मैं अपनी खुशियों के लिए आज उस पर निर्भर हो गया हूं। मैं कुछ चंद खुशियों के लिए उसके सम्मुख भिखारी बन गया और कई बार मेरे माफी मांगने पर भी उसपर कोई असर ना हुआ। मैं अपने दो मनों के बारे में याद करता हूं और इस भ्रम में पड़ जाता हूं कि क्या वह मैं ही हूं जिसने अनेक कठोर निर्णय लिए हैं और आज मैं इतना उत्तेजित ना होकर, रूई के समान हल्का और मुलायम हो गया हूं। प्रेम अपनी गुलाबी मादकता के साथ प्रेमियों पर हावी होती है और संसार की कड़वी और रसहीन वस्तुओं में मिठास भर देती है। दो प्रेमियों से ज्यादा दुखी संसार में दूसरा कोई नहीं है। क्योंकि आधिपत्य, अहंकार, घृणा और ईर्ष्या का जो दौर यहां चलता है - वह जिंदगियों को घुटनों के बल मोड़कर समर्पण की अवस्था में ले आता है।
मैं सौंदर्य और गुलाबी पुष्पों से जीवन की तिक्तताओं में मिठास भरने का प्रयास करता हूं और इनसे हटकर उन घर्षणों के बारे में विचार करता हूं जिसमें कठोरता तो थी लेकिन मिठास का दूर दूर तक नामोनिशान ना था। लेकिन एक भयानक युद्ध के बाद ही तो हमें मिठास ग्रहण करना चाहिए या किसी कायर की भांति पुष्पों का आस्वादन करना चाहिए। जीवन की प्रामाणिकता, जीवन की तिक्तताओं में ही है। मैं प्रेम की आकांक्षा रखकर नफरतों से नहीं भाग सकता हूं, जीत की इच्छा रखकर हार से कहा तक भागूंगा। प्रेम में कुछ भी वैयक्तिक नहीं रहता है, सबकुछ दो लोगों में एकसमान रूप से आदान-प्रदान होता है। एक का सुख दूसरे को सुखी तथा दूसरे का दुख पहले को दुखी करता है। व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता उसके लिए कितना घातक है- इसका पहला साक्षात्कार प्रेम में पड़ जाने से होता है। वैयक्तिकता, सापेक्ष और निरपेक्ष लाभ, प्राइवेसी की बातें सबकुछ लोकलुभावन और भ्रम बनकर प्रकट होती हैं।
क्या यही जीवन की अंतिम परिणति है? क्या मुझे इन्हीं ऊपरमुखी और अधोमुखी धक्कों के सहारे चलना होगा?
अरविंद कुमार।
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