जड़ता में शून्य ।
अकस्मात ही, उंगलियों पर नजर जाती है और ध्यान आता है कि नाखून बड़े हो गये है; और यह भी ध्यान आता है कि उसने एक बार कहा था,'तुम्हारी उंगलियों में बडे़ नाखून अच्छे लगते हैं।' मैं शीघ्र ही, अपने नाखून काट लेता हूं। उसका मेरे प्रति मेरी चीजों का अच्छा लगना, इस बात का द्योतक था कि मुझे अच्छा महसूस कराना था। तालाब किनारे उगी उस अनजानी घास के तिनके को, अनायास ही मैंने उखाड़ लिया था; मेरा उससे कोई प्रयोजन नहीं था। चारों तरफ फैले लोगों का समूह, कौतूहल पैदा करती भीड़ - मुझे उस घास की याद दिलाती है और मैं एक बार वहां लौट जाना चाहता हूं; उसी चित्त और यादों के साथ। लेकिन क्या करूं जैसे वापस लौटना होता ही नहीं है। मनुष्यों से भरे जगत में - मैं कैसा और किस प्रकार का मनुष्य बनूं? यह सवाल मेरे मस्तिष्क को वेदना से भर देती है - चिंताएं सर्प के विष के समान सम्पूर्ण शरीर में रूधिर के साथ मिलकर, प्राणों को नीला कर दे रही हैं। कहीं पर हमेशा के लिए रस क्यों नहीं मिल जाता है? मैं उसके खुबसूरत और मुलायम ओठों की तरफ जाना चाहता हूं! आखिर, क्यों मैं अपने कामक्रीड़ा पर नियंत्रण करूं?
आजकल, वह पूरी तरह मेरे नियंत्रण में है: जैसे कोई छोटा सा 5 या 6 साल का बच्चा अपने कठोर अध्यापक के समक्ष चुपचाप व इनोसेंट बन बैठा रहता है। वह मुझसे कभी कभी प्रार्थना भी करता है लेकिन मैं भी आजकल प्रार्थनाएं परमात्मा से करता हूं, मैं मजबूत बनकर उसे हराए जा रहा हूं। चिलचिलाती गर्मी में थके और प्यासे व्यक्ति को जैसे अचानक ही वृक्ष की छाया और शीतल जल मिल गया हो; ऐसा सुख वह मुझे दे रहा है। वह भीड़ जैसे मुझे गटक जाना चाहती है, उसमें लिबिडो भी सहानुभूति नहीं पैदा कर पाता है। पौधे पर लगा गुलाब मुझे आकर्षित करता है, मैं उसे तोड़कर अपने साथ रखना चाहता हूं लेकिन उसके मुरझाने पर, मैं कैसे उसके प्रति वहीं प्रेम जारी रख पाऊंगा जो शुरूआत में थी। मैं अनुभूतिपरक विषयों में रस लेना चाहता हूं और लेता भी हूं; जीवन में रंग बिखेरती रंगोलियों में, अकस्मात ही उनके द्वारा गंदी किए जाने वाले फर्श का चित्र - आंखों में तैर जाता है। आखिर, दोनों पहलू एक समान सुख क्यों नही पैदा करते हैं?
उसके सीने में एक ज्वालामुखी है, जो कभी नहीं भड़केगा। वह मुझसे बहुत प्यार और सम्मान से बात करती है, वह मेरे सामने अपने हृदय में बहुत श्रद्धा लेकर प्रस्तुत होती है- जो कभी कभी मुझे हीनता से भर देती है; ऐसा इसलिए भी क्योंकि कभी कभार उसके वक्ष की उष्णता ह्रदय में असंख्य आकर्षणों और महत्वाकांक्षाओं को एक साथ जन्म देती है। मैं दरख्तों की टहनियों पर टंगे उन मान्यताओं, विचारों और परम्पराओं का सुक्ष्म परीक्षण करता हूं। आखिर, क्यों महिलाएं अपने चेहरे से नकाबों और घूंघटों को हमेशा के लिए हटा नहीं देती हैं। यह पत्थर का बहुत बड़ा ढेर है और लोग आंखें मुंदकर पत्थर मारते हैं...लोग फूल चढ़ा रहे हैं मान्यताओं पर...आदमी को बार बार नोची-छिछड़ी को दांतों से नोंच-नोंचकर फेंक रहे हैं...लोग नंगी औरत के कोमल शरीर को खुरदुरे जूट के रस्सों से जकड़कर बांध रहे हैं...आखिर क्यों? तुम रूककर कुछ पूछ नहीं सकती थी, तुम्हें इतना भी ख्याल नहीं कि मैं तुम्हारे लिए कड़ी धूप में और गर्म जमीनों पर चलकर अपने पैरों में फफोले लेकर तड़प रहा था। पार्क की वह मुरझाई हुई घास, मुझे कब्रिस्तान की याद दिलाती है; जहां से प्रत्येक व्यक्ति गुजरता है, अपने यथार्थ और जीवन की अंतिम परिणति से साक्षात्कार करता है परंतु उसका अहंकार उसमें यूकेलिप्टस की वृक्ष की तरह तना खड़ा रहता है और कब्रिस्तान में पड़ी अस्थि पंजर मनुष्य की बेवफाई और मुर्खता पर ठहाके मारकर हंसता रहता है। मैं सिर्फ चुभन, टीस और प्रतारणा को पसीने और गर्द से लथपथ हो रहा हूं - आखिकार उसके जुल्फों की खुशबू नासापुटों से होकर पूरे शरीर में अनन्त प्रसन्नताओं को क्यों जन्म दे रही थीं और मैंने उसकी कमजोरी को अपनी नियति मानकर क्यों नहीं हमेशा मुलायम व्यवहार किया, उसकी मनःस्थिति को जानते हुए भी, मैंने उसके विलोम में क्यों अनन्त सवालों की श्रृंखलाएं खड़ी कर दीं?
अरविंद कुमार। B40
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