खुरदरापन ।

कितनी शुष्कता और रूखापन था, उन घर्षण पैदा करती हुई कंक्रीट से बनी उच्श्रृंखल मार्गों पर। मैंने अनायास ही एक कंकड़ को पैरों से दे मारा था और उसी कंकड़ को अगले दिन पैरों में चुभता हुआ पाया मैंने। मैं पाषाण की तरह कठोर बनना चाहता हूं जिस पर प्रकृति की विपदाओं और मनुष्यों के तीखे भावनाओं का कोई प्रभाव ना पड़े।

मैं उन्हीं रेखाचित्रों को बारम्बार, ज़हन में उतारता हूं। कितना खुरदरापन है, जीवन के इन दोहरावें में। मैं उस अधिक सौंदर्य पैदा करती - रसात्मक स्थल का अन्वेषण करता हूं और पाता हूं कि छिछली जमीन की मुरझाई हुई पत्थर ना ही पीड़ा पैदा करती है और ना ही स्थायी आनन्द पैदा करती है। मेरा स्वयं मेरा सबसे बड़ा दुश्मन है। मैं कभी कभार उसके कंधे पर सिर रख देना चाहता हूं; उसके वक्षों की उष्णता से अपने ह्रदय में उबल रही अशांत तप्त ज्वर को शीतलता दे देना चाहता हूं। उसकी मुस्कान, आंखों की नाराज़गी, अंगड़ाई लेती उसकी बांहे, जुल्फों की करिश्माई खुशबू, ओठों की रक्त जैसे लालिमा, उसका मेरे हाथों की उंगलियों के साथ खेलना - ह्रदय में एकाएक प्रसन्नता की बाढ़ ला दे रही है। मैं बाढ़ आने के बाद की विभत्स और भयानक प्रलय देखकर सहम जाता हूं और गहरी वेदना मस्तिष्क को जकड़ लेती है। एक तरफ आनन्द है और दूसरी तरफ विषाद के पल - जो एक-दूसरे के पूरक हैं।

जीवन विरोधों का संगम है - सांझ और सुबह, सुख और दुख, रात और दिन, प्रेम और नफ़रत, पैदा होना और मृत्यु । ये सब साथ साथ चलते हैं। जीवन में कुल मिलाकर कुछ क्षण आते हैं - जब जीवन का सम्पूर्ण आनन्द सिमटकर कुछ सेकंडों में अवतरित हो जाता है। और पूरे जीवन में कुल ऐसे 15 से 20 क्षण आते हैं। मैं इन पलों में रहते हुए भी इनके चले जाने के दुख से भर जाता हूं। मैं कुछ लक्ष्य अपने सामने रखकर बहुत तीव्र गति से उसे पाने के लिए दौड़ता हूं और अचानक ही, एक रूकावट मेरे रास्ते में आ जाती है और इसी रूकावट में ही, मैं सुख और दुख तलाशने लगता हूं। उस लक्ष्य तक पहुंचने में मेरी दृढ़ता इतनी लचीली क्यों हो जाती है? क्यों अचानक ही, सबकुछ निरर्थक जान पड़ता है?

अरविंद कुमार।

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